खरगौन: सूखे और कर्ज़ से परेशान 37 साल के किसान ने की आत्महत्या, प्रशासन ने कहा- कर्ज़ नहीं वजह

मध्य प्रदेश में 37 साल के एक किसान ने खेत के किनारे लगे नीम के पेड़ पर फांसी लगा ली। परिजनों के मुताबिक कम बारिश होने से वहां फसलें बर्बाद हो गईं वो पहले से कर्ज़ में डूबे थे, इसलिए परेशान रहते थे। हालांकि एमपी सरकार ने अलग तर्क दिया है।

Shyam DangiShyam Dangi   17 Sep 2021 4:48 PM GMT

पंधानिया (मध्य प्रदेश)। सूखा से फसलें खराब होने, बैंकों और साहूकारों के बढ़ते कर्ज से परेशान मध्य प्रदेश में 37 साल के युवा किसान ने आत्महत्या कर ली।

जितेंद्र पाटीदार के पास 18 एकड़ जमीन है, जिसमें 10 एकड़ में कपास और 3 एकड़ में हरी मिर्ची और बाकी में मूंगफली लगा रखी थी। लेकिन कम बारिश के चलते फसलें सूख रही हैं। 10 सितंबर की शाम को जितेंद्र ने अपने ही खेत के किनारे लगे नीम के पेड़ से फांसी लगा ली। प्रदेश सरकार के मुताबिक आत्महत्या की वजह कर्ज़ या आर्थिक संकट नहीं है। और कपास की फसल भी सामान्य है। मौसम विभाग के आंकडों के मुताबिक खरगौन में इस वर्ष सामान्य से 26 फीसदी कम बारिश हुई है।

बिना पानी कपास और मिर्च की फसल खराब होने परेशान जितेंद्र ने फांसी लगाने से पहले अपने चाचा भगवान पाटीदार (48) को फोन किया था कि वो जान देने जा रहा है। भगवान पाटीदार उस मनहूस घड़ी को याद कर कहते हैं, "जितेन्द्र के पास तकरीबन 16 एकड़ जमीन थी। जो उनके, पत्नी, मां और दादी के नाम थी। सभी का विभिन्न बैंकों, सोसायटी और साहूकारों का लगभग 10 लाख से अधिक कर्जा था। लेकिन पिछले साल भी कपास, मिर्ची और दूसरी फसलें बर्बाद हो गई थी। इस वर्ष भी उन्होंने लगभग 10 एकड़ में कपास लगा रखा था। लेकिन बारिश न होने से फसल खराब हो गई। जिससे वो काफी परेशान था।"

मध्य प्रदेश में खरगौन जिले का पंधानिया गांव, फसलों के लिए सिंचाई दो दूर लोग पीने के पानी के लिए लंबा सफर करते हैं। फोटो श्याम दांगी

खरगोन जिला मुख्यालय से महज 20 किलोमीटर दूर स्थित गांव पंधानिया के एक जवान किसान की आत्महत्या की खबर से खरगौन जिला प्रशासन से लेकर भोपाल तक हड़कंप मच गया है। प्रशासन की टीमों ने मौके का दौरा किया। जिसके बाद 11 सितंबर को एसडीएम सतेंद्र सिंह ने मीडिया को जारी बयान में कहा, "किसान की आत्महत्या मामले में प्राथमिक रिपोर्ट आ गई है। जो बिंदु सामने आए हैं उससे ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि उसने कर्ज़ के बोझ में आकर आत्महत्या की है।"

एसडीम ने आगे कहा, "रिकॉर्ड में उनके पास 10 एकड़ कपास थी। कपास की फसल मौके पर सामान्य पाई गई है। बारिश कम होने से मिर्च और मूंगफली की जरुर अच्छी नहीं है। उसके ऊपर सहकारी सोसायटी का अल्पकालीन लोन मात्र 90 हजार 671 रुपए का कर्ज़ है।"


भगवान पाटीदार कहते हैं, "जमीन में घर में पत्नी, दादी, मां के नाम भी है। सबने कर्ज़ लिया है। कुल कर्ज़ 10 लाख के आसपास होगा।"

कर्ज़ के मामले में किसानों की स्थिति क्या है, 10 सितंबर को ही आए राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ के आंकड़े बखूबी बताते हैं। भारत में हर किसान परिवार पर औसतन 74, 121 रुपए का कर्ज़ है। साल 2012-13 के मुताबिक 2018-19 यानि पांच वर्षों में भारत में किसानों पर खर्ज़ 57 फीसदी बढ़ गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2012-13 में किसान परिवारों पर औसत कर्ज 47,000 रुपए था। जो 2018-19 में बढ़कर 74, 121 रुपए हो गया। देश में अनुमानित कृषक परिवारों की संख्या 9.3 करोड हैं।

किसान जितेंद्र पाटीदार (मृतक) की कपास की फसल। (वीडियो से)

किसान कर रहे सूखा घोषित करने की मांग

प्रशासनिक अधिकारियों से फसल सामान्य बताने से परिजन ही नहीं कई गांवों के किसान नाराज हैं। पंधानिया गांव के किसान हरीश पाटीदार (49)/कहते हैं, ''अफसरों को यह फसल अगर सामान्य लग रही है तो वह ही फसल को बेचकर किसानों को उनकी लागत दे दें। सामान्यतौर पर इतने दिनों (ढाई महीने) के कपास की बढ़वार 4 से 5 फीट तक हो जाती है। लेकिन पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण पौधे की बढ़वार दो तीन फीट भी नहीं हो पाई। कुछ पौधे तो आधा फीट नहीं बढ़ पाए है। बावजूद अफसरों को यह दिखाई नहीं दिया है।''

मध्य प्रदेश में खरगौन, बढ़वानी जिलों को हरी मिर्च का गढ़ कहा जाता है। पिछले साल मिर्च की फसल भीषण रोग लगा था, इस कई जगहों पर सूखे ने फसल चौपट की है। जबकि जहां सिंचाई की व्यवस्था अच्छी है, वहां पैदावार बढ़िया है लेकिन मार्कट में रेट 3 से 7 रुपए किलो के हैं, जबकि मिर्च पैदा करने में कम से कम 8 रुपए किलो की लागत आती है, जिसमें 3-4 रुपए किलो की सिर्फ तोड़ाई होती है। डीजल महंगा होने से किसानों से बाहर की मंडियों में भी लागत के अनुसार भाव नहीं मिल रहे। हरी मिर्च की खेती में औसतन 80 हजार से 1.5 लाख प्रति एकड़ की लागत आती है।

खरगोन के वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी पर्वत सिंह बडोले भी मृतक किसान जितेंद्र पाटीदार की मिर्ची की फसल का निरीक्षण करने पहुंचे थे। उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया, "कम बारिश के कारण मिर्ची के पौधों की बढ़वार नहीं हो पाई थी। पौधों में कोई मिर्ची नहीं लगी थी। पिछले साल भी क्षेत्र में वायरस के प्रकोप के कारण किसानों की मिर्ची ख़राब हो गई थी।" गांव कनेक्शन ने मिर्च के मुद्द् पर विस्तृत खबर की है, यहां पढ़ें-

जितेंद्र के परिवार में पत्नी सारिका पाटीदार (35 वर्ष), बेटा प्रांचल पाटीदार (15 वर्ष), बेटा गौतम पाटीदार (13 वर्ष), माँ चंदूबाई और दादी गेंदा बाई हैं। जितेंद्र के पास करीब 16 एकड़ जमीन है। जिसमें उन्होंने कपास (लगभग 10 एकड़), मिर्ची (लगभग 3 एकड़) और मूंगफली और अन्य फसलें लगा रखी थीं। पंधानिया और यहां के गांवों के किसानों की स्थिति को समझने के लिए जब गांव कनेक्शन की टीम पहुंची तो भयावह स्थिति सामने आई।

ये भी पढ़ें- हरी मिर्च का काला बाजार: खाने वाले खरीद रहे 40-80 रुपए किलो, थोक भाव 15-20 रुपए, किसान को मिल रहे 3-7 रुपए

ढाई-तीन महीने की फसल की हालत दिखाते मृतक किसान के चाचा भगवान पाटीदार

कुछ सालों से खेती यानी सिर्फ घाटा-किसान

पंधानिया और आसपास के दर्जनों दूसरे गांवों में पिछले 3 सालों से खेती महज घाटे का सौदा बनकर रह गई। किसान हरीश पाटीदार (49वर्ष ) बताते हैं, '' बीते कुछ सालों से कपास, मिर्च की खेती में लगातार नुकसान उठाना पड़ हैं। यहां तक लागत भी नहीं निकल पा रही है। 2019-20 में किसानों की कपास की फसल थ्रिप्स, वायरस, इल्ली, माहु समेत रोगों की चपेट में आकर ख़राब हो गई। वहीं इस वर्ष किसानों की फसल पानी नहीं गिरने के कारण ख़राब हो गई।"

हरीश के मुताबिक इस बार कपास किसानों ने 3-3 बार बीज लाकर बोया है। बावजूद इसके उसमें बेहद कम डिंडे (कपास का गुच्छा) निकले हैं।

वो आगे कहते हैं, "यह स्थिति सिर्फ जितेंद्र की फसल की नहीं है। बल्कि पंधानियां और उसके आसपास के 20 अधिक गांवों के किसानों की यही स्थिति है। बारिश नहीं होने के कारण कपास के पौधों का विकास हुआ ही नहीं। जबकि अब तक फसल का पौधा 5 फीट की हाइट (उंचाई) ले चुका होता और पौधों में 20-25 डिंडे आते हैं, जबकि यहां 2-3 डिंडे ही हैं।"

20 से अधिक गांवों में सूखे की स्थिति

पंधानियां के पड़ोसी गांव छाल्पा के किसान पवन पटेल (35) बताते हैं, ''कुछ सालों तक यही स्थिति रही तो निमाड़ का यह क्षेत्र मध्य प्रदेश का विदर्भ बन जाएगा। किसानों पर लगातार कर्ज बढ़ रहा है वहीं फसल का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। हमारे आसपास के 20 से अधिक गांवों में सूखे की स्थिति है।"

मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों ने अतिवृष्टि से इस वर्ष अगस्त में भीषण बाढ़ का सामान किया वहीं कई इलाके कम बारिश की चपेट मे हैं। भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार जून से 15 सितंबर तक खरगौन जिले में 652.4 मिलीमीटर की औसत बारिश के मुकाबले 482.1 मिलीमीटर बारिश हुई है जो सामान्य से 26 फीसदी कम है। खरगौन के पड़ोसी जिलों इंदौर, धार, बड़वानी में कम बारिश हुई है।

मौसम विभाग के मुताबिक खरगौन में 26 फीसदी कम हुई बारिश।

किसान गोपाल पाटीदार (36 वर्ष ) अपने आसपास के सूखाग्रस्त गांवों के नाम गिनाते हैं। उनके मुताबिक खरगौन के दूसरे हिस्सें हालात ठीक हैं लेकिन इधर के इलाके के पंधानिया, छाल्पा, पोखर, अघवन, अकावल्या, टेमरनी, रामपुरा, रजूर, जल ज्योति, गोपालपुरा, आसनगांव, मोथापुरा, लिक्खी, रमनगांव, सुरवा, सिंगुन, खेड़ी, गुजारी, मेनगांव, लोहड़ी आदि गांवों में सूखे की स्थिति है।

वो आगे कहते हैं, "अभी तक इन गांवों में सूखे स्थिति को देखने के लिए अफसरों ने गांवों का दौरा करना भी उचित नहीं समझा है। जबकि क्षेत्र के अधिकतर गांवों में पीने के पानी तक की समस्या है। लोगों को 8 किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है।''

किसान की आत्महत्या के बाद सूखे और बारिश की स्थिति के बारे में बात करते हुए एसडीएम ने मीडिया से कहा था, " खरगौन में पिछले साल के मुकाबले कम बारिश हुई है। जिले में अब तक 700 मिली. बारिश होनी चाहिए थी लेकिन हुई सिर्फ 400 मिलीमीटर है। पिछले 15 दिनों में रुक-रुक कर हुई बारिश से फसलों को फायदा हुआ है। अगर अगले एक हफ्ते में बारिश हो जाती है तो सूखे की स्थिति नहीं आएगी।"

खेती कैसे लाभ का धंधा बनेगी?

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने बयानों में ''खेती को लाभ का धंधा'' बनाने की बात कहते रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत अलग ही नज़र आ रही है। किसान गोपाल कहते हैं, '' आसपास के इन 20 गांवों में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। यहां से नर्मदा महज 35 किलोमीटर पड़ती है लेकिन ऐसी किसी परियोजना पर जमीनी पर काम नहीं हुआ, जिसके कारण हर साल सूखे का सामना करना पड़ रहा है। वहीं कुछ परियोजना शुरू भी हुई तो वे धरातल पर आई नहीं पाई। नतीजतन, क्षेत्र के हालात ज्यों के त्यों बने हुए हैं।"

मध्य प्रदेश सरकार ने साल 2030 तक 2.5 लाख कुएं और 5 लाख तालाब बनाने लक्ष्य निर्धारित किया था। लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक क्षेत्र में ऐसी किसी योजना पर काम नहीं हो पा रहा है।

कपास की खेती में खर्च और आमदनी

पंधानिया गांव के किसान सुनील पाटीदार (25 वर्ष) बताते हैं ''कपास और मिर्ची की खेती की लागत हर बढ़ती जा रही है। 2वहीं मौसम की मार के कारण पर्याप्त उत्पादन नहीं मिल पा रहा है। कपास की खेती में एक एकड़ में खर्च 25 से 30 हजार रुपए तक बैठ रहा है। जबकि पिछले दो तीन सालों से किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही है। इस साल किसानों ने तीन-तीन बार कपास की बुआई की है। जिसके कारण खर्च तीन गुना अधिक बढ़ गया है।" मिर्च की खेती में औसतन प्रति एकड़ 80 हजार से 1.5 लाख का खर्च आता है।

इसी गांव के किसान पवन पटेल (35वर्ष)के मुताबिक इलाके में पानी की किल्लत हमेशा रहती है इसलिए ज्यादातर लोग ड्रिप इरीगेशन का इस्तेमाल करते हैं। ड्रिप पर सरकार सब्सिडी देती है लेकिन किसान के भी प्रति एकड़ करीब 70 हजार रुपए लग जाते हैं, लेकिन ये ड्रिप 3 साल में खराब हो जाती हैं।

किसान पवन पटेल (35) का कहते हैं, "तीन साल बाद ड्रिप इरीगेशन का दूसरा सेटअप लगाना पड़ता है। जिसके कारण खेती की लागत और बढ़ जाती है। इस साल बारिश नहीं होने के कारण कपास की 3-3 बार बिजाई करना पड़ी। जिसे और बीज और बिजाई का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा।"

बहुत सारे किसानों को सब्सिडी भी नहीं मिल पाती है। या एक बार मिल जाती है तो दोबारा मिलना मुश्किल हो जाता है।

पवन कहते हैं, "फसल अच्छी हो तो प्रति एकड़ 8 से 10 कुंतल कपास पैदा हो सकती है, इस स्थिति में एक एकड़ से 45,000 से 53,000 की फसल बिक जाती है। लेकिन पिछले दो तीन साल से प्रति एकड़ 2 से 3 क्विंटल का औसत उत्पादन हो पा रहा है। वहीं कई किसानों की फसल तो पूरी तरह से चौपट हो जा रही है। ऐसी स्थिति में खेती का खर्च बढ़ गया है। वहीं आमदानी कम हो गई है।"

एक एकड़ कपास में खर्च -

खेत की तैयारी -1500

बीज -1500

बिजाई -3000

निराई गुड़ाई -3000

दवाईयां -5000-6000 हजार (हर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करते हैं। )

कटाई और भंडारण -3000 हजार।

कुल खर्च - 17,000 रुपये (औसतन)

इस साल बीज और बिजाई का अतिरिक्त खर्च -4500 रुपये

फसल का कुल खर्च -21, 500 रुपये

ड्रिप का एक साल का अनुमानित खर्च -20, 000 रुपये (ड्रिप ख़राब होने की स्थिति में।)

ड्रिप इरिगेशन सेटअप एकबार -70 हजार रुपये

नोट- कपास का खर्च खरगौन के किसान सुनील और आसपास के लोगों के बताए अनुसार है। जो जलवायु, मिट्टी और पानी की उपल्बधता के अनुसार बदल सकते हैं।

ये भी पढे- आधे किसान परिवारों पर कर्ज़ का बोझ, पांच साल में औसत लोन 47000 से बढ़कर 74121 हुआ

ये भी पढ़े- किसानों के सामने आत्महत्या का सबसे मुख्य कारण है कर्ज : देविंदर शर्मा


Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.