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इको-फ्रेंडली कोटिंग की मदद से रोक सकते हैं वायरस का संक्रमण

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गांधीनगर ने एंटीवायरल कोटिंग को तैयार किया है, जिसकी मदद से सतह से होने वाले वायरल संक्रमण को रोका जा सकता है। इसे किसी भी प्रकार की सतह पर आसानी से लगाया जा सकता है।

India Science WireIndia Science Wire   14 July 2021 7:31 AM GMT

इको-फ्रेंडली कोटिंग की मदद से रोक सकते हैं वायरस का संक्रमण

फोटो: सीडीसी

वायरल संक्रमण खासतौर पर सर्दी, फ्लू, खसरा और चिकनपॉक्स जैसी कई बीमारियों का कारण बनते हैं। कभी-कभी ये वायरल संक्रमण संभावित रूप से डीहाइड्रेशन, निमोनिया जैसी बीमारियों का भी कारण भी बन सकते हैं। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी एंटीवायरल कोटिंग तैयार की है, जिसकी मदद से सतह से होने वाले वायरल संक्रमण को रोका जा सकता है।

हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गांधीनगर ने एंटीवायरल कोटिंग को तैयार किया है, जिसकी मदद से सतह से होने वाले वायरल संक्रमण को रोका जा सकता है। इसे किसी भी प्रकार की सतह पर आसानी से लगाया जा सकता है। यह कोटिंग गैर-रोगजनक वायरस पर अत्यधिक प्रभावी है और पर्यावरण के अनुकूल और पारदर्शी है।

यह नॉन टॉक्सिक सरफेस कोटिंग किसी भी आंतरिक और बाहरी वस्तुओं जैसे कांच की खिड़कियों, लकड़ी और प्लास्टिक के फर्नीचर, वाहनों, ऑटोमोबाइल, दरवाजे के हैंडल, अन्य हैंडल आदि पर आसानी से लगाई जा सकती है। कोरोनावायरस के विरूद्ध इस कोटिंग का परीक्षण अभी तक नहीं किया गया है।

शोधकर्ताओं की टीम ने अपनी शोध में पाया कि इस कोटिंग को कई बार धोने के बाद भी इसकी एंटी-वायरल क्षमता में कोई परिवर्तन नही हुआ। इस कोटिंग से बार-बार संपर्क में आने वाली सतहों से वायरल के संचरण को रोका जा सकता है।

एंटी-वायरल कोटिंग का प्रतिकात्मक तस्वीर

शोध में इस एंटी-वायरल कोटिंग ने संतोषजनक परिणाम दिए हैं। इस कोटिंग के निर्माण में सुरक्षित तत्वों का प्रयोग किया गया है जो प्रकृति में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, जिससे यह पर्यावरण के अनुकूल भी हो जाता है। जबकि गैर-स्टोइकोमेट्रिक अनाकार टाइटेनियम ऑक्साइड के गैर-विषैले और आवश्यक तत्व, जो पृथ्वी की पपड़ी में उच्च उपस्थिति रखते हैं, इस कोटिंग को संश्लेषित करने में उपयोग किए जाते हैं जो इसे टिकाऊ और एंटी-वायरल बनाते हैं। कमरे के तापमान पर स्केलेबल रेडियो फ़्रीक्वेंसी मैग्नेट्रोन स्पटरिंग फ़ैब्रिकेशन तकनीक इसकी लागत-प्रभावशीलता में परिणत होती है। इसके अलावा, यह लगभग 45 नैनोमीटर मोटा है जो सभी प्रकार की सतहों पर आसानी से मिश्रित हो सकता है।

शोध से जुड़ी प्रोफेसर एमिला पांडा ने कहा कि इस कोटिंग द्वारा दिखाए गए समग्र परिणाम आशाजनक हैं। पारदर्शी, कोस्ट-इफेक्टिव और पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण, यह आने वाले दिनों में व्यावसायीकरण के लिए काफी बड़ी क्षमता रखता है। टीम फिलहाल इस कोटिंग का विभिन्न वायरल और बैक्टीरिया स्ट्रेन्स पर परीक्षण करने की प्रक्रिया में है।

बाजार में अन्य कई एंटी वायरल कोटिंग मौजूद हैं जिनका प्रयोग वायरस को निष्क्रिय करने के लिए किया जाता हैं। यह एंटी वायरल कोटिंग तांबे या चांदी के आयनों को मुख्य तत्व के रूप में उपयोग करती हैं। तांबा एक टॉक्सिक पदार्थ है और गैर-पारदर्शी भी है, जिससे बंद जगहों पर इसका प्रयोग चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

इस नए एंटी-वायरल कोटिंग को बनाने वाली शोधकर्ताओं की टीम में मटिरियल्स इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर एमिला पांडा, सहायक प्रोफेसर अभय राज सिंह गौतम, बायोलॉजिकल इंजीनियरिंग विभाग से प्रोफेसर विरुपक्षी सोपिना और शोध छात्रों में निशाबेन एम पटेल और रवि तेजा मित्तिरेड्डी शामिल है।

टीम ने इस एंटी-वायरल सतह कोटिंग और इसकी कोटिंग प्रक्रिया के लिए एक भारतीय पेटेंट भी दायर किया है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय शोध जर्नल एल्सेवियर के जर्नल ऑफ अलॉयज एंड कंपाउंड्स में प्रकाशित किया गया है।

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