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क्या कृषि कानूनों को निकट भविष्य में रद्द करने का प्रस्ताव है? सवाल के जवाब में संसद में सरकार ने दिया ये जवाब

कृषि कानूनों Farm laws के विरोध में संयुक्त किसान मोर्चा ने जंतर-मंतर पर किसान संसदfarmer parliament शुरु कर दी है। संसद के अंदर लोकसभा और राज्यसभा में भी सवाल जवाब चल रहे हैं। एक बार फिर समझिए पूरा मामला क्या है, विरोध कहां और किस बात पर है, सरकार के तर्क क्या हैं?

Arvind ShuklaArvind Shukla   31 July 2021 9:32 AM GMT

क्या कृषि कानूनों को निकट भविष्य में रद्द करने का प्रस्ताव है? सवाल के जवाब में संसद में सरकार ने दिया ये जवाब

दिल्ली में किसानों का आंदोलन 8 महीने से जारी है। फोटो- अमित पांडेय

तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर 8 महीने से आंदोलन कर रहे किसान संगठनों ने संसद के मानसून सत्र में फिर अपनी आवाज़ बुलंद किया है। संसद के अंदर भी दोनों सदनों में कृषि कानून और किसान आंदोलन का मुद्दा उठ रहा है। सवाल किए जा रहे हैं। पंजाब और यूपी के चुनावों को देखते हुए विपक्ष हमलावर है। बंगाल चुनाव में बीजेपी की हार को किसान नेता अपनी जीत भी बता रहे हैं। राकेश टिकैत कह चुके हैं कि बंगाल वाली 'दवाई' यूपी चुनाव में भी देंगे। हरियाणा के किसान नेता गुरुनाम सिंह चढ़ूनी पंजाब चुनाव में आरपार की लड़ाई चाहते हैं। ऐसे में संसद का ये सत्र काफी महत्वपूर्ण हो गया है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने मानसून सत्र में संसद कूच का ऐलान किया था। तय कार्यक्रम के अनुसार 22 जुलाई से संयुक्त किसान मोर्चा की अगुवाई में अब 200 किसान रोज दिल्ली में प्रदर्शन करेंगे। संसद के बाहर तो अनुमति नहीं मिली लेकिन जंतर मंतर पर मिली परमिशन के बाद वहां वो अपनी संसद शुरु कर दी है। ये संसद 13 अगस्त तक चलेगी। किसान संसद के पहले ही दिन किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि किसान संसद, भारत सरकार द्वारा बनाए गए तीनों कृषि कानूनों का निरस्त करने का प्रस्ताव करके भेजेगी।

सदन में उठे सवालों के जवाब में सरकार ने नए कृषि कानूनों को वापस लेने से किसी प्रकार की योजना से इनकार किया है। संसद में कृषि कानूनों के संदर्भ से किसानों से बातचीत, कृषि कानूनों का उद्देश्य, एमएसपी, एमएसपी पर खरीद आदि को लेकर सवाल किए गए थे।

20 जुलाई को मनीष तिवारी और बैन्नी बेहनन के सवाल के जवाब कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री की तरफ से लिखित में बताया गया कि सरकार और किसान नेताओं के बीच 11 बार की वार्ता हुई है। सरकार का कहन है कि वो किसानों से कानून के प्रावधानों (क्लॉज) पर चर्चा के लिए निरंतर आग्रह करती रही लेकिन किसान यूनियन केवल कृषि कानूनों की वापसी पर ही अड़ी रहीं।

क्या सरकार या सरकार उपरोक्त तीन कृषि कानूनों को निरस्त करना चाहती है? इस सवाल के जवाब में कृषि मंत्री ने सदन को बताया, "किसान यूनियन के साथ सभी दौर की चर्चा में उक्त कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग पर जोर देने के बजाए किसान यूनियन को कृषि अधिनियमों के खंडों (क्लॉज) पर चर्चा करनी चाहिए। ताकि किसानों की संसस्याओं का समाधान हो सके।"

लोकसभा में सरकार का जवाब

20 जुलाई को ही लोकसभा में मनोज तिवारी, एडवोकेट अदूर प्रकाश, संगम लाल गुप्ता, सप्तगिरी शंकर उलाका, प्रद्युत बोरदोलोई और डॉ. अमर सिंह ने कृषि कानूनों के निरस्त/रद्द करने के प्रस्ताव और किसान आंदोलनों को समाप्त किए जाने को लेकर अब तक किए गए सरकार से प्रयासों के बारे में सवाल पूछे।

क्या सरकार के पास निकट भविष्य में कृषि कानूनों को रद्द करने/ निरस्त करने का कोई प्रस्ताव है? इस सवाल के जवाब में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने सरकार की तरफ से विस्तृत पक्ष रखा। साथ ही एक कृषि कानूनों की खूबियों को गिनाया।

"नए कृषि कानून कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवधन और सरलीकरण) अधिनियम, 2020, कृषक (सशक्तितकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार अधिनियम 2020 और आवश्यक वस्तु (संसोधन) अधिनियम 2020 का आशय एक ऐसी परिस्थितिकी विकसित करना है,जिसमें किसान उत्पादों की बिक्री से संबंधित स्वतंत्र विकल्प अपना सकें ताकि उत्पादों की की बिक्री के लिए प्रतिस्पर्धात्मक वैकल्पिक चैनलों के माध्यम से किसानों को उचित मूल्य मिल सके।" तोमर अपने जवाब में कहा है।

उन्होंने आगे कहा कि इन कृषि अधिनियमों से व्यापार क्षेत्र में व्यापारियों, प्रोसेसर, निर्यातकों, किसान उत्पादक संगठनों, कृषि सहकारिता समितियों आदि द्वारा किसानों से सीधी खरीद की जा सकती है। ताकि किसानों को आय बढ़ाने के लिए आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) कम होने और विपणन लागत में कमी होने के कारण किसानों को बेहतर मूल्य मिल सके।

कृषि कानूनों से आय के नए रास्ते खुलेंगे, कृषि कानूनों से कृषि-गेट, शीत भंडार गृह (कोल्ड स्टोरेज), वेयर हाउस साइलो आदि के एपीएमसी यार्ड के बाहर स्थापित होने से किसानों के लिए नए अवसर, विकल्प और रोजगार के साधन मिलेंगे।

सदन में सरकार ने तीनों कृषि कानूनों की खूबियों को रखा और ये भी बताया कैसे तीनों कृषि कानून आम किसानों के लिए लाभकारी हैं ऐसे प्रावधानों के बीच उन्हें वापस लेने का कोई प्रस्ताव नहीं है। सरकार ने सदन में किसान यूनियन के साथ हुई 11 दौर की वार्ता का भी हवाला दिया।

कृषि मंत्री ने अपने बयान में कहा कि सरकार ने किसानों के हितों को प्राथमिकता देते हुए 9 दिसंबर 2020 के पत्र द्वारा किसान संघ को संबोधित करते हुए बिंदुवार समझाया गया कि किसानों द्वारा व्यक्त कि कई चिंताओं को सरकार द्वारा कैसे ध्यान में रखा जा रहा है। सरकार ने किसानों संघों से मिलकर एक छोटा समूह बनाने का भी विचार रखा था, जो समयवार तरीके से कृषि कानूनों पर खंड वार (प्वाइंट टू प्वाइंट) विचार कर सकता है। लेकिन किसान सहमत नहीं हुए, सिवाए उनके निरस्त करने की मांग के।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने जवाब में कहा, "सरकार किसान संघों से वार्ता को हमेशा तैयार है। और इस मुद्दे को हल करने के लिए हमेशा तैयार रहेगी।"

जंतर-मंतर पर किसान संसद farmer parliament के पहले दिन किसान नेता। फोटो- अमित पांडे

तीन कृषि कानून What is there in farm laws

सरल शब्दों में जानिए तीन कृषि कानून three farm laws, जो अध्यादेश के रुप में आए थे, उनमें ऐसा क्या है जिसका किसान संगठन विरोध कर रहे हैं और सरकार उन्हें कृषि अर्थव्यवस्था में अमूलचूल परिवर्तन लाने वाला बता रही है। कोरोना की पहली लहर के बाद सरकार कृषि कानूनों को अध्यादेश के रुप में जून 2020 में लेकर आई थी, जिन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद विपक्ष के भारी हंगामे के बीच दोनों सदनों में पास कराया गया और वो कानून बनकर लागू हुए। किसान संगठनों के हंगामे, पंजाब से दिल्ली तक प्रदर्शन और खून-खराबे के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन पर रोक लगाई। सरकार से किसानों की वार्ता अब तक असफल रही है। फिलहाल सरकार और किसान की वार्ता कोई तारीख तय नहीं है।

खेती, उत्पादन और बाजार से जुड़े तीनों कृषि कानूनों को जानिए और विरोध के मूल कारण को समझिए.

1.कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवधन और सरलीकरण) अधिनियम, 2020 Farmers' Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020

ये कानून मंडियों के बाहर कृषि उपज की खरीद फरोख्त का कानूनी हक देता है। मंडियों में टैक्स लगता है बाहर टैक्स नहीं लगेगा। किसानों का कहना है कि इस कानून से मंडियां (APMC) खत्म हो जाएंगी। सरकार धीरे-धीरे न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी भी बंद कर सकती है।

सरकार का मोटा मोटा तर्क है कि ये कानून किसान किसानों को लाभाकरी कीमतों की सुविधा के लिए व्यापार क्षेत्र में इलेक्ट्रानिक्स व्यापार प्रणाली को बढ़ावा देकर भी व्यापार में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता को बढ़ावा देता है। मंडी के बाहर कानूनी खरीद से किसानों को ज्यादा विकल्प मिलते हैं। उनका घर से मंडी तक सामान लाने-ले जाने का किराया बचेगा। खेती से खरीद बिक्री हो सकेगी। कृषि समितियां और एफपीओ भी भी व्यापार का हक मिला है। सरकार ने पिछले तीन सीजन दो बार गेहूं और 1 सीजन के धान खरीद के एमएसपी के आंकड़े जारी करते हुए कहा कि एमएसपी पर खरीद जारी है, जारी थी और जारी रहेगी। कृषि कानूनों का न्यूनतम समर्थन मूल्य से कोई वास्ता नहीं है।

2.कृषक (सशक्तितकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार अधिनियम 2020 (The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement of Price Assurance and Farm Services act 2020)

ये कानून किसानों को कानूनी समझौता खेती, फसल की बुवाई से पहले रेट तय करने, किसी बड़ी कंपनी से करार, समझौता, एग्रीमेंट करने का प्रावधान देता है। किसानों का तर्क है इस कानून की आंड में बड़ी कंपनियां कॉरपोरेट कृषि सेक्टर पर अघोषित कब्जा कर लेंगे। किसानों की जमीनें भी कंपनियों के यहां गिरवीं हो जाएंगी, उन्हें डर है कॉट्रैक्ट फॉर्मिंग के क्लाज, जिसमें किसानों को कोर्ट जाने तक की अनुमति नहीं है, किसान के हित को असुरक्षित करते हैं। एसडीएम, जिसे- विवाद के दौरान समझौते का अधिकार दिया गया है वो किसानों के लिए स्वतंत्रता और किसान हितों की रक्षा नहीं कर पाएगा।

सरकार का तर्क है कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ने से हाई क्वालिटी का उत्पादन हो सकेगा। उच्च मूल्य वाले कृषि उत्पादन और प्रसंस्कृरण तथा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। जिस अनुपात में जोत कम हो रही हैं, कृषि पर जोखिम बढ़ रहे हैं इस कानून के जरिए किसान अपने सिर पर बिना कोई जोखिम लिए खेती कर पाएंगे, क्योंकि जोखिम प्रोसेसर का होगा। किसान बुवाई से पहले फसल का रेट तय कर पाएंगे।

सरकार के इन तर्क के विरोध में किसान नेता, मध्य प्रदेश और कई दूसरे राज्यों में कंट्रैक्ट फॉर्मिग में करार के बाद बासमती चावल, प्याज और दूसरी फसलों के भुगतान न करने को लेकर सरकार से सवाल भी करते हैं।

3.आवश्यक वस्तु (संसोधन) अधिनियम 2020 The Essential Commodities (Amendment) act 2020

इस कानून को लेकर संसद के मानसून सत्र में कृषि मंत्री ने कहा कि ये कानून ग्रामीण इलाकों में नए रोजगार के अवसर खोलेगा। नए शीतगृह, वेयर हाउस, कोल्ड चेन (शीत आपूर्ति श्रृंखला) में बुनियादी निवेश होगा। किसान के घर के गांव, खेत के पास कोल्ड स्टोरेज खुलने से वो वहां अपनी सब्जी स्टोर कर सकेगा और सही समय पर मार्केट पहुंचाकर अच्छा मुनाफा कमा सकेगा।

किसान संगठनों और कृषि कानूनों का विरोध कर रहे वर्ग का कहना है कि ये कानून में संसोधन असीमित भंडारण और कालाबाजारी को बढावा देगा। अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू जैसी दैनिक उपयोग की वस्तुएं जो आवश्यक वस्तु (संसोधन) अधिनियम 1955 के अंतर्गत सरकार की निगरानी में थीं उन्हें सरकार ने मुक्त करके बड़ीं कंपनियों को मौका दिया है, वो असिमित भंडारण करेंगे और जब किसान के खेत और घर में फसल नहीं बचेगी और दोगुनी कीमत पर बेचेंगे, इसमें न सिर्फ किसान और बल्कि उपभोक्ता दोनों का नुकसान है। जबकि सरकार का कहना है कि सरकार निगरानी का काम करती रहेगी, जैसा दलहन और प्याज की कीमतों पर बढ़ने पर किया गया है।



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किसानों का विरोध

कोरोना की पहली लहर के बीच सरकार 5 जून को कृषि अध्यादेश लेकर आए थी। इससे बाद पंजाब में इनका विरोध शुरु हो गया था। सितंबर 2020 में कानूनों को दोनों सदनों में भारी हंगामे के बीच पास कराया गया। जिसके बाद सदन के बाहर प्रदर्शनों Farmers protest का सिलसिला और तेज हुआ। पंजाब में महीनों रेल सेवा बंद रही। 25 नवंबर 2020 पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों ने दिल्ली कूच किया। जिन्हें हरियाणा में जगह-जगह रोका गया। बल प्रयोग हुआ, पुलिस और किसानों से झड़प हुई। यूपी के भी किसान संगठनों ने दिल्ली कूच किया। मध्य प्रदेश, राजस्थान समेत कई और राज्यों के किसानों ने भी दिल्ली किया था। आखिरकार किसान दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचे और 26 नवंबर 2020 से दिल्ली के सिंघु, टीकरी, गाजीपुर, शाहजहांपुर बॉर्डर और पलवल में किसान डेरा डाले बैठे हुए हैं। इस दौरान किसानों से 11 दौर की वार्ता हो चुकी है, 26 जनवरी को लाल किले की हिंसा हो चुकी हैं। सैकड़ों किसानों की आंदोलन में जान जा चुकी है। हरियाणा और पंजाब में किसान यूनियन लगातार प्रदर्शन भी कर रही हैं।

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