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दिहाड़ी मजदूरी, सब्जी बेचने और मनरेगा में मजदूरी करने को मजबूर हैं मध्य प्रदेश के गोंड कलाकार

कोविड-19 महामारी के दौरान मध्य प्रदेश में सैकड़ों कलाकारों के हालात ठीक नहीं। उनके पास कोई काम नहीं है तो उनके लिए अपने परिवार का पेट भरना मुश्किल हो रहा है।

Pankaja SrinivasanPankaja Srinivasan   23 Jun 2021 12:03 PM GMT

दिहाड़ी मजदूरी, सब्जी बेचने और मनरेगा में मजदूरी करने को मजबूर हैं मध्य प्रदेश के गोंड कलाकार

अपने परिवार का पेट पालने के लिए श्याम मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की सड़कों पर सब्जी बेचते हुए घूमते हैं।

सारा दिन ठेले पर सब्जी बेचने के बाद थके-हारे संतोष अभी घर लौटे हैं। भोर होने से पहले उनके दिन की शुरुआत हो जाती है। तड़के सुबह वह ऑटो रिक्शा किराये पर लेकर आसपास के गांवों और मंडी में जाकर सब्जी खरीदते हैं। उन्हें अपने ठेले पर रख, भोपाल की गलियों में बेचने के लिए निकल पड़ते हैं।

गोंड आदिवासी समुदाय के 45 वर्षीय श्याम गांव कनेक्शन को बताते है, "एक दिन में, मैं लगभग चार-पांच किलोमीटर की दूरी तय करता हूं। कई बार ऐसा होता है कि खाने के लिए सिर्फ बिस्किट होता है जिसे चाय के साथ खा लेता हूं।"

संतोष हमेशा से सब्जी नहीं बेचते थे। महामारी की दूसरी लहर आने से कुछ महीने पहले तक उनकी पहचान एक गोंड कलाकार के तौर पर थी। उनकी कलाकृतियां देश-विदेश के संग्रहालयों और कला के पारखी लोगों के घरों की दीवारों पर टंगी हुई हैं। अपने काम का हुनर दिखाने के लिए उन्हें बुलाया जाता था। उनकी कलाकृतियों ने कई कला प्रदर्शनियों की शोभा बढ़ाई है।

श्याम अपने परिवार जिसमें उसकी पत्नी और दो बेटियां हैं, का पेट भरने लिए मध्य प्रदेश की राजधानी की गलियों में सब्जी बेचते घूम रहे हैं। वह कहते हैं,"कलाकृतियां बनाना अब उनके लिए बाद की चीज़ है"

लोक और आदिवासी कला का एक रूप है गोंड कलाकृतियां, जिसे भारत की सबसे बड़ी जनजाति गोंड ने कायम रखा हुआ है। गोंड जनजाति मुख्य रूप से मध्य प्रदेश से है।

लगभग 500 किलोमीटर की दूरी पर एक और गोंड कलाकार सुनील टेकाम और उसकी पत्नी आशनाहर सुबह मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम)में मजदूरी करने के लिए घर से निकल पड़ते हैं। मध्यप्रदेश में अपने गांव के पास डिंडौरी जिले में गड्ढा खोदने का काम करते हैं। यह आदिवासी दंपत्ति पाटनगढ़ में रहता है जोगोंड कला के सबसे मशहूर पेशेवर कलाकार स्वर्गीय जंगगढ़ सिंह श्याम का घर है। जिन्होंने गोंड कला को विश्व भर में लोकप्रिय कर दिया था। लेकिन यह महामारी कला के सरपरस्तों को इस कला से ही दूर ले गई। इन आदिवासी कलाकारों के पास दिहाड़ी मजदूरी करने, सब्जी बेचने या शारीरिक श्रम करने के अलावा अब कोई विकल्प नहीं बचा है।

टेकाम गांव कनेक्शन को बताते है,"हमारे पास अपनी कोई जमीन नहीं है। हम कच्चे (मिट्टी और फूस की छत वाले) मकान में रहते हैं। मैं और मेरी पत्नी दोनों दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। हफ्ते में, दोनों मिलकर लगभग एक हजार रुपए कमा लेते हैं।"

वह आगे कहते हैं, "अगर मैं ज्यादा थका नहीं होता तो रोज थोड़ी-बहुत चित्रकारी कर लेता हूं।"

50 प्रतिशत गोंड कलाकार महिलाएं हैं।

कलाकारों की रंगहीन जिंदगी

लोक और आदिवासी कला का एक रूप है गोंड कलाकृतियां, जिसे भारत की सबसे बड़ी जनजाति गोंड ने कायम रखा हुआ है। गोंड जनजाति मुख्य रूप से मध्य प्रदेश से है। लेकिन आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के कई हिस्सों में भी पाई जा सकती हैं। गोंड कलाकारों का काम उनकी लोककथाओ, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ा है।

महामारी ने इन आदिवासी कलाकारों को अपने परिवार और बच्चों को पालने के लिए संघर्ष करने और कला से हटकर कुछ और काम पकड़ने के लिए मजबूर कर दिया है। राज्य की राजधानी भोपाल में बड़ी संख्या में गोंड कलाकार रहते हैं। गोंड कलाकारों के साथ मिलकर काम करने वाले दुष्यंत डांगी गांव कनेक्शन को बताते हैं, "इनमें से ज्यादातर कलाकार गरीबी में दिन काट रहे हैं। वे अशिक्षित हैं। उनका शोषण होता है और उनकी स्थिति काफी दयनीय है।" महामारी ने उन्हें और गरीबी बना दिया है।

चिंतित कलाकार संतोष यादव गांव कनेक्शन से कहते हैं, "मेरे दिमाग में सिर्फ बकाया बिलों और कर्ज चुकाने की चिंता और विचार भरे पड़े हैं। ऐसे मैं कैसे चित्रकारी कर सकता हूं।"

श्याम अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ भोपाल में किराये के मकान में रहते हैं। उनकी एक बेटी बारहवीं कक्षा में पढ़ती है तो दूसरी आठवीं में। उनकी 42 वर्षीय पत्नी सियादेवी काम के दौरान अक्सर उनके साथ होती है।

45 वर्षीय गोंड कलाकार कहते हैं, "मैने कबाड़खाने से पांच हजार रुपये में यह ठेला खरीदा था और अब जीवन-यापन के लिए इस पर सब्जी बेचता हूं।" उन्हें हर महीने पांच हजार रुपये मकान का किराया देना है, बेटियों के स्कूल की फीस भरनी है और जीने के लिए भोजन भी जुटाना है।


श्याम अफसोस जताते हुए कहते हैं, "बैंक में मेरे पास कोई पैसा नहीं है। हम सब्जी बेचकर एक दिन में मुश्किल से दो सौ या तीन सौ रुपये ही कमा पाते हैं। उसी से घर चलाना होता है।"

वे बताते हैं, "कला से जुड़े किसी भी काम को करने के लिए हर किसी को समय चाहिए होता है, सोचने के लिए शांत वातावरण की जरूरत होती है। फिलहाल तो मैं सिर्फ अपने बकाया बिलों के बारे में ही सोच सकता हूं। लॉकडाउन से पहले मैने आठ हजार रुपये के रंग उधारी में खरीदे थे, उन्हें भी चुकाना अभी बाकी है।"

गोंड कलाकार बने मनरेगा मजदूर

गोंड कलाकार सुनील टेकाम, उनकी 25 वर्षीय पत्नी आशना, उनकी मां छिंदा बाई, चार साल की बेटी और डेढ़ साल का बेटा एक साथ डिंडौरी जिले के पाटनगढ़ में रहते हैं।

मनरेगा के जरिए मिलने वाले किसी भी काम को करने के लिए कलाकार और उसकी पत्नी सुबह करीब पांच बजे घर से निकल पड़ते हैं। ईंटों से चिनायी करना, सफेदी करना या फिर गड्ढा खोदना- ये काम कुछ भी हो सकता है।

कुछ घंटों बाद वे दोनों घर आते हैं। आशना दिन के लिए खाना बनाती है और एक बार फिर से दोनों पास के एक निर्माण स्थल पर काम करने के लिए निकल जाते हैं। वे वहां एक घर की चारदीवारी की चिनाई का काम कर रहे हैं।

टेकाम बताते हैं, "मेरी मां बच्चों की देखभाल करती है। जबकि मैं और मेरी पत्नी काम पर जाते हैं।" वे आगे कहते हैं,"हम दोनों मिलकर, हफ्ते में लगभग हजार रुपये कमा लेते हैं। लेकिन ये काम मिलने पर निर्भर करता है।"

हालांकि इस महामारी ने टेकाम को एक कलाकार से दिहाड़ी मजदूर बना दिया है फिर भी वह बड़े उत्साह से अपने बचपन को याद करते हैं कि कैसे जंगलों के किनारे उनका बचपन बीता। वह बताते है, "जंगल की बगल में खेत हुआ करते थे। फसल के दौरान किसान पेड़ की चोटी पर मचान बना लेते थे और वहीं से अपनी खेतों की निगरानी किया करते थे ताकि कोई जंगली जानवर उनकी फसल बर्बाद न कर दें।"

टेकाम मुस्कुराते हुए कहते हैं, "ये वो दृश्य हैं जो मेरे दिमाग में घूमते रहते है और इनमें रंग भरना मुझे अच्छा लगता है। वास्तव में इनसे मैंने 10 से 12 कलाकृतियां बनाई हैंऔर वह सभी बिक गईं।" बाकी कलाकृतियां भी उनकी कल्पना से ही निकली है। दादा-दादी ने पशु-पक्षियों, पेड़ों और मछलियों की जो शानदार कहानी उन्हे सुनाई थी उन्हीं से जुड़ी कल्पना में रंग भरे हैं।

जब टेकाम की शादी हुई तो उन्होंने प्रकृति को रंगने की यह कला अपनी पत्नी को भी सिखा दी। उनकी पत्नी आशना बताती है, "आमतौर पर मैं देर रात को कलाकृतियां बनाती हूं। जब बच्चे सो रहे होते हैं" हालांकि वह भी गोंड समुदाय से आती हैं, लेकिन शादी के बाद ही उन्होंने इस कला को सीखा। वह कहती हैं "मैंने यह कला अपने पति से सीखी है और मुझे पेड़ों की चित्रकारी करना अच्छा लगता है"


आजीविका की तलाश में

23 वर्षीय रमन सिंह व्यम एक युवा और संघर्षशील गोंड कलाकार हैं। उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया, "पिछले दो महीनों से हमारे पास कोई ऑर्डर नहीं आया है।"

रमन जब तीसरी कक्षा में पढ़ता थे, तब अपने पिता मान सिंह व्यम के साथ भोपाल आ गए थे। रमन, उनकी बहन और मां बुधवारिया व्यम तीनों ही गोंड कलाकार हैं। मानसिंह भोपाल के नेशनल म्यूजियम, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में सुरक्षाकर्मी के तौर पर काम करते थे। लेकिन पिछले साल पहले लॉकडाउन में उनकी नौकरी चली गई।

रमन कहते हैं, "अब हमारे पास आमदनी का कोई निश्चित जरिया नहीं है। मैं, मेरी बहन और मां ऑर्डर पर पेंटिंग तैयार करते हैं। मैं एसएससी सीजीएल परीक्षा (सरकारी सेवा में भर्ती होने के लिए) की तैयारी करना चाहता हूं। लेकिन पैसे की तंगी के चलते तैयारी करना छोड़ फिर से पेंटिंग करना शुरू कर दिया है।"

गोंड कलाकृति बनाती एक महिला कलाकार।

संतोष श्याम, सुनील टेकाम और रमन व्यम उन सैकड़ों कलाकारों में से तीन हैं जो तमाम बाधाओं के बावजूद अद्भुत कलाकृतियां बना रहे हैं। इस महामारी ने उन्हें दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करने के लिए मजबूर कर दिया है। ये अपने परिवार का पेट भरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मदद के लिए आगे आए हाथ

सरकार की तरफ से किसी प्रकार की सहायता अभी तक इन कलाकारों को नहीं मिली है। उनकी इस दयनीय स्थिति को देख, डांगी ने जीवन-यापन के लिए संघर्ष कर रहे इन कलाकारों की मदद के लिए इस साल जनवरी में एक वेबसाइट www.tribalartindia की शुरुआत की।

जब देश में महामारी आई तो डांगी ने अपने कुछ दोस्तों के साथ इन संघर्षशील गोंड कलाकारों की कलाकृतियों को फेसबुक पर डाला। वह बताते हैं, "कलाकृतियों को लोगों ने हाथों-हाथ खरीद लिया। और हम तब हमने महसूस किया कि इन्हें बेचने के लिए एक सुव्यवस्थित और निरंतर तरीका चाहिए। इस तरह से संतोष, टेकाम, आशना और व्यम जैसे कलाकारों की मदद के लिए ट्राइबलआर्टइंडिया.कॉम की शुरुआत हुई"

लगभग 50 प्रतिशत गोंड कलाकार महिलाएं हैं।वह कहते हैं, "गोंड समुदाय में लगभग हर कोई चित्रकारी करता है। लेकिन वे अपने आपको कलाकार नहीं मानते। क्योंकि उनके लिए यह उनकी संस्कृति की देन और उसी का एक हिस्सा है। लेकिन वे सभी चित्रकारी करते हैं। कई घरों में आमतौर पर पुरुष कलाकृति की रूपरेखा तैयार करते हैं और उनमे रंग भरने वाला मेहनत का काम महिलाएं करती है।"

अभी हाल ही में पाटनगढ़ से लौटकर आए डांगी बताते हैं, "वहां के कलाकारों की स्थिति भोपाल से बेहतर नहीं है। टेकाम एक बेहतरीन कलाकार हैं, ने मुझसे विनती करते हुए कहा था- और कुछ नहीं तो मुझे पुताई (दीवार को रंगना) का काम ही दिला दीजिए।"


उन्होंने उम्मीद जताई कि नई वेबसाइट से कलाकारों को भी मदद मिलेगी। डांगी ने समझाया,"हम ऐसे कलाकारों की मदद करते हैं जो तकनीक के बारे में कुछ नहीं जानते। जिन्हें नहीं पता कि अपने काम को कैसे लोगों तक पहुंचाया जाए या फिर वो इतने गरीब है कि किसी से मदद के लिए संपर्क भी नहीं कर सकते। हम उनकी कलाकृतियां उनसे लेकर वेबसाइट पर अपलोड करते हैं। और जब आर्डर आते हैं तो खरीदारों तक कोरियर से पहुंचाते हैं।"

अब कलाकार अपनी मदद के लिए डांगी को ढूंढते हैं।"चीजें बदल रही है।वेबसाइट की शुरुआत के बाद से, पिछले कुछ महीनों में हम आठ से दस कलाकारों की छोटी-बड़ी, लगभग 200 कलाकृतियों को बेचने में कामयाब रहे हैं" वे बताते हैं "अधिकांश कलाकृतियां जबानी तौर पर बिकी हैं।"

इस समय में, अक्सर आश्चर्य चकित करने वाली कलाकृतियां बनाने वाले गोंड कलाकारों के मेहनती हाथ आज ठेला ढकेलने, सीमेंट मिलाने और कुदाल चलाने में लगे हैं। संतोष श्याम कहते हैं,"हमारे इस काम के लिए कल्पना, रचनात्मकता और विचारों की जरूरत होती है। अब इंतजार करना पड़ेगा। मेरा सारा ध्यान ठेले पर रखी सब्जी पर लगा रहता कि आज इनमें से कितनी सब्जी बेच पाऊंगा जिससे मेरे परिवार का पेट भर सके"

आप भी वेबसाइट www.tribalartindia.com पर जाकर गोंड कलाकारों का समर्थन कर सकते हैं और अगर आप चाहें तो उनकी पेंटिंग भी खरीद सकते हैं।

खबर को अंग्रेजी में पढ़ें

अनुवाद- संघप्रिया मौर्य

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