सरदार सरोवर बांध में पहले अपने घर और खेत खो दिए और अब अवैध रूप से मछली पकड़ना बना परेशानी का सबब

एक दशक पहले मध्यप्रदेश के बड़वानी के परंपरागत मछुआरे समुदाय ने सरदार सरोवर बांध के पानी में अपने घर और खेत को खो दिया था। लेकिन आज वह नई चुनौतियों को सामना कर रहे हैं। कुछ ‘बाहरी लोग’ बांध के जलाशय में अवैध रूप से मछली पकड़ने की गतिविधियों में लगे हैं। एफआईआर दर्ज की जा चुकी है।

Pratyaksh SrivastavaPratyaksh Srivastava   20 Aug 2021 1:42 PM GMT

सरदार सरोवर बांध में पहले अपने घर और खेत खो दिए और अब अवैध रूप से मछली पकड़ना बना परेशानी का सबब

 बड़वानी जिले के बांध के बैकवाटर में मछली पकड़ने वाले मछुआरों के लगभग 1500 परिवार इस व्यवसाय पर निर्भर हैं। सभी फोटो: अरेंजमेंट

जितेन्द्र मांझी एक मछुआरे हैं। नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध के बैकवाटर में मछली पकड़ने के लिए रोजाना लगभग दो किलोमीटर पैदल चलकर आते हैं। मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले के बिजासन गांव में पहले उनका एक घर था लेकिन आज वह आंगनवाड़ी केंद्र में अस्थाई रूप से रह रहे हैं। अपनी जमीन से अलग करने, अपनी पढ़ाई पूरी न कर पाने और मछली पकड़ने वाले समुदाय के पारंपरिक व्यवसाय को बर्बाद करने के लिए वह बांध परियोजना को दोषी ठहराते हैं।

30 साल के जितेंद्र को 10वीं कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। वह गांव कनेक्शन से कहते हैं, "हमने साल 2008 में अपने गांव को बांध के बैकवाटर में डूबते देखा था। नर्मदा नदी की बजाय अब हम बहुत गहरे जल स्तर वाले बांध के जलाशय में मछली पकड़ने के लिए मजबूर हैं। उससे भी बुरी बात यह है कि बाहरी लोग अवैध रूप से जलाशय में मछली पकड़ने के लिए आने लगे हैं। इससे हमारी आमदनी पर असर पड़ता है।"

जब जितेन्द्र स्कूल में थे तब उनके पिता अकेले ही नदी में मछली पकड़ने जाया करते थे। लेकिन नदी पर बांध और जलाशय बनने के बाद पानी का स्तर कई गुना बढ़ गया। जितेंद्र के पिता के लिए अब जलाशय में अकेले नाव लेकर जाना और मछली पकड़ना मुश्किल हो गया था। बड़वानी जिले के बांध के बैकवाटर में मछली पकड़ने वाले मछुआरों के लगभग 1500 परिवार इस व्यवसाय पर निर्भर हैं।

जलाशय में मछली पकड़ना, राज्य मत्स्यपालन विभाग द्वारा नियंत्रित किया जाता है। मछुआरे स्थानीय समितियों या समूहों से जुड़े होते हैं।

जितेन्द्र बताते हैं, "मेरे पिता अकेले यह काम नहीं कर सकते थे। और इसमें खतरा भी था। तब मुझे पढ़ाई छोड़कर मछली पकड़ने में अपने पिता की मदद के लिए आगे आना पड़ा"। वह आगे कहते हैं, "तब से जिंदगी एक बड़ा संघर्ष बन गई है। अब नई मुश्किल आ गई है। बाहरी लोग हमारे क्षेत्र में घुसकर, जलाशय में अवैध रूप से मछली पकड़ रहे हैं।"

इससे स्थानीय परंपरागत मछुआरे समुदाय और बाहरी मछुआरों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई है।

पारंपरिक मछुआरे बनाम बाहरी लोग

नर्मदा बचाओ आंदोलन के लिए काम करने वाले एक कार्यकर्ता रहमत ने गांव कनेक्शन को बताया, "इस महीने की शुरुआत में, पांच अगस्त को स्थानीय ग्रामीणों ने मेघनाथ घाट के पास जलाशय में एक नाव को देखा। यह मछली पकड़ने वाली एक बाहरी व्यापारियों की नाव थी।" वह आगे बताते हैं, "जब हमनें नाव पर सवार मज़दूरों से पूछ्ताछ की तो उन्होंने बताया कि वे उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और मध्यप्रदेश के एक व्यापारी के लिए काम करते हैं।"

जब गांव वाले नाव पर मौजूद मज़दूरों का सामना कर रहे थे, उस समय जितेंद्र भी मौके पर मौजूद थे। उनके अनुसार मानसून में मछली पकड़ने पर हर साल प्रतिबंध लगता है। इसके बावजूद नाव में मौजूद ये बाहरी लोग जलाशय में अवैध रूप से मछली पकड़ रहे थे और कुछ दिनों तक ऐसा करते रहे। जलाशय में मछली पकड़ना, राज्य मत्स्यपालन विभाग द्वारा नियंत्रित किया जाता है। मछुआरे स्थानीय समितियों या समूहों से जुड़े होते हैं। मछुआरों के इन समूहों के बीच नदी के उन हिस्सों को बांटा गया है जहां वे मछली पकड़ सकते हैं। और यह राज्य मत्स्यपालन विभाग द्वारा अनुमोदित है।

मछुआरों के इन समूहों के बीच नदी के उन हिस्सों को बांटा गया है जहां वे मछली पकड़ सकते हैं। और यह राज्य मत्स्यपालन विभाग द्वारा अनुमोदित है।

जितेंद्र बताते हैं, "सात अगस्त की रात को पिछोड़ी गांव में (मेघनाथ घाट से 15 किलोमीटर दूर) बाहरी लोग प्रतिबंध के बावजूद पानी से मछली पकड़ते हुए पाए गए" उन्होंने कहा "हमने इसके बारे में मत्स्य विभाग को सूचित किया और अधिकारियों ने हमारी शिकायत दर्ज की और स्थानीय पुलिस स्टेशन को प्राथमिक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए एक पत्र भी भेजा।"

गांव कनेक्शन ने मध्य प्रदेश के मत्स्य विभाग की सहायक निदेशक सपना मंडलोई से बात की। उन्होंने पुष्टि की कि 16 जून से 15 अगस्त तक राज्य में मछली पकड़ने पर प्रतिबंध है (क्योंकि ये मछली प्रजनन का मौसम है) और इस दौरान दस मजदूर जलाशय में मछली पकड़ते पाए गए थे।

मंडलोई ने गांव कनेक्शन को बताया, "ये लोग प्रतिबंध के बावजूद रात में मछलियां पकड़ रहे थे। यह कानून जुर्म है।" वह कहती हैं, "ग्रामीण और नर्मदा आंदोलन बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता इसे लेकर चिंतित हैं। उन्हें डर है कि अगर बाहरी लोग आकर जलाशयों में मछली पकड़ने लगे तो स्थानीय मछुआरा समुदाय की आजीविका का क्या होगा"


सहायक निदेशक ने यह भी बताया कि उनके विभाग ने बडवानी थाने को पत्र लिखकर, आरोपी पर कानून की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज करने को कहा है।

'जब से सरदार सरोवर बांध परियोजना शुरू हुई, तब से उनकी आमदनी घटी है'

मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में मछुआरा समुदायों का आरोप है कि जब से सरदार सरोवर बांध परियोजना की शुरूआत हुई है तब से उनकी आमदनी घटी है। अब चाहे वो मछली पकड़ना हो या फिर खेती करना। पहले मछुआरों ने जलमग्न के चलते अपने गांवों को खो दिया फिर अपने खेतों को भी छोड़ना पड़ा। ये खेत उनकी अतिरिक्त आय का एक जरिया थे और अब उन्हें बाहरी लोगों से मछली पकड़ने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।


44 साल के बच्चा राम पेशे से एक मछुआरे हैं। वह बडवानी जिले के पिछोड़ी गांव में रहते हैं। उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया, "पहले हमारे पास खेती करने का विकल्प था। नदी के किनारे अपनी रेतीली जमीन पर हम तरबूज और खरबूज उगा लेते था। लेकिन अब सब कुछ खत्म हो गया है।"

वह आगे बताते हैं, "मछलियां सर्दियों में ज्यादा हरकत में नहीं रहतीं इसलिए उन्हें पकड़ना मुश्किल होता है। पहले हम सर्दी के मौसम में खरबूजे की खेती करते थे। जिससे हर साल एक लाख रुपये की आमदनी होती थी। लेकिन अब ऐसी किसी आमदनी को कोई जरिया नहीं है। जितना भी कमाते हैं उसमें मुश्किल हमारे परिवार का पेट भर पाता है।" राम के परिवार में उनकी पत्नी और तीन बेटे हैं और वे सभी उसकी कमाई पर निर्भर हैं।

न तो पूरा मुआवजा मिला और न ही उनका पुनर्वास किया गया

सामाजिक कार्यकर्ता रहमत ने गांव कनेक्शन को बताया कि एक तरफ उनकी जमीन और आजीविका का नुकसान तो हुआ ही है। वहीं नर्मदा तट पर रहने वाले अन्य ग्रामीणों के साथ-साथ मछली पकड़ने वाले समुदाय को अभी तक न तो पूरा मुआवजा दिया गया है और न ही उनका पुनर्वास किया गया है।

वह कहते हैं, ये लोग टिन शेड के नीचे बनाए गए एक अस्थाई आवास में रह रहे हैं। और उनमें से कुछ को सामुदायिक केन्द्रों और गांव के अन्य सरकारी इमारतों में बसा दिया गया था।

नर्मदा नदी पर बिजासन और पिछोड़ी गांवों की एक गूगल मैप फोटो।

पिछले तीन सालों से जितेन्द्र मांझी एक आंगनवाड़ी केंद्र में रह रहे। जितेंद्र के परिवार के लिए यह अस्थाई आवास है। जब तक कि उन्हें वादे के अनुसार नया घर नहीं मिल जाता।

जितेंद्र गांव कनेक्शन को बताते हैं, "हमसे कहा गया था कि एक नया घर बनाने के लिए पांच लाख अस्सी हजार रुपये और जमीन दी जाएगी। लेकिन अभी तक कुछ नहीं मिला है" वह कहते हैं, "मैं अपने परिवार के साथ एक आंगनवाड़ी केंद्र में रह रहा हुं।"

वह कहते हैं, "इंजीनियरों ने 2017 में सही आकलन नहीं किया था। उनके अनुसार हमारा गांव डूब क्षेत्र (बैकवाटर से डूबा हुआ क्षेत्र) में नहीं आता है। लेकिन 2019 में जब पानी हमारी जमीनों पर भरने लगा तो अधिकारी हमें सुरक्षित इलाकों में ले गए। तब हमें यहां रहने की जगह दी गई थी। लेकिन अभी तक कोई स्थाई समाधान नहीं हुआ है।"

'मुझ पर गलत आरोप लगाये गए हैं'

गांव कनेक्शन ने नलछा (मध्यप्रदेश का एक कस्बा) के मछली व्यापारी अनिल आर्य से संपर्क किया। जिन्होंने इस महीने की शुरुआत में मजदूरों को उत्तर प्रदेश से, बडवानी बांध के बैकवाटर में मछली पकड़ने के लिए भेजा था। उन्होंने कहा कि वे केवल अपनी नावों को नदी के रास्ते से गुजरात ले जा रहा थे। स्थानीय मछुआरों ने उन पर गलत आरोप लगाया है।


आर्य ने गांव कनेक्शन का बताया, "मैं भोपाल से अपनी नाव बनवाता हूं। ट्रक से गुजरात भेजने में लगभग एक लाख रुपये का खर्च आता है। जबकि उन्हें नदी के रास्ते से ले जाने में मेरा खर्च आधा हो जाता है।" वह कहते हैं, " ढुलाई के खर्च को बचाने के लिए मैंने मजदूरों को नदी के रास्ते से जाने के लिए कहा था। वे मछली नहीं पकड़ रहे थे।"

व्यापारी ने आरोप लगाया कि दो स्थानीय मछुआरे नाव को अपने क्षेत्र से गुज़रने देने के लिए उनसे बीस हजार रुपये की मांग कर रहे थे। उन्होंने कहा, "जब मैने मना किया तो उन्होंने मेरे खिलाफ़ गांव वालों को इक्ट्ठा कर लिया। मैं कोर्ट में केस लडुंगा।"

मत्स्य विभाग द्वारा स्थानीय पुलिस थाने को लिखा गया पत्र।

रहमत के अनुसार, बाहरी लोगों को जलाशयों में मछली पकड़ने की सभी गतिविधियों को रोक दिया गया है लेकिन माहौल में अभी भी तनाव बना हुआ है। गांव वालों ने इंतजार करो और देखो की रणनीति अपनाई हुई है।

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