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सैकड़ों मौतों का गवाह बना बक्सर का गंगा घाट

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में बक्सर में गंगा घाट पर पिछले दिनों काफी संख्या में शवों का अंतिम संस्कार किया गया। इतना ही नहीं, जो लोग दाह संस्कार का खर्च (15,000 रुपये) नहीं उठा सकते थे, उन्होंने 700 रुपये में दफनाने का विकल्प चुना, जिससे घाट पर कई अस्थायी कब्रें बना दी गईं। हालांकि अब प्रशासन ने घाट पर दफनाने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है।

Sumit YadavSumit Yadav   15 May 2021 10:58 AM GMT

उन्नाव (उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का बक्सर गांव चंद्रिका देवी मंदिर के लिए जाना जाता है, लेकिन कुछ समय से यहां बहने वाली पवित्र नदी गंगा के घाटों पर विकट हालात दिखाई दे रहे हैं।

आज (13 मई) सुबह 10:30 बजे का वक्त है और शवों की एक कतार देखने को मिलती है, जो अंतिम संस्कार के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्हें जलाया जाएगा या दफनाया जाएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनके परिजनों के पास कितना पैसा है।

अपने पड़ोसी के परिवार के बुजुर्ग व्यक्ति का अंतिम संस्कार करने आए उन्नाव के भगवंतनगर के चंद्रमा ने गांव कनेक्शन को बताया, "एक शव का अंतिम संस्कार करने में 12 से 15 हजार रुपये तक खर्च हो सकते हैं। इसका खर्च नहीं उठा सकते हैं, 6 से 7 सौ रुपये में दफनाया जा सकता है।"

घाट के किनारे जहां तक नजर जाती है वहां दूर तक जमीन पर लाल रंग के कपड़े दिखते हैं। ये और कुछ नहीं, हाल ही में दफन किए गए लोगों की अस्थायी कब्रे हैं, जो थोड़ी-थोड़ी दूर पर बनाई गई हैं। इनमें से कुछ को कुत्तों ने खोदने की कोशिश भी की है। चंद्रमा बताते हैं, "इनमें ज्यादातर गरीब मजदूर हैं, जिनकी मौत हो गई और परिवार के पास दाह संस्कार के लिए पैसे नहीं थे।"

बक्सर घाट पर आम दिनों में एक दिन में 25 अंतिम संस्कार होते हैं। फोटो: सुमित यादव

"बक्सर के गंगा घाट पर आम दिनों में लगभग 25 शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बाद से यह संख्या कई गुना बढ़ गई। पिछले हफ्ते तक इस घाट पर एक दिन में 300 से 400 शव लाए गए। हालांकि अब यह संख्या 100 से 150 तक आ गई है। आज भी लगभग 150 शव लाए गए हैं," बक्सर के निवासी वंशु ने गांव कनेक्शन को बताया।

नदी के किनारे शायद ही कोई जगह हो, जहां मृतकों को दफनाया न गया हो। आशंका है कि गंगा का जलस्तर बढ़ने पर ये शव नदी में जा सकते हैं। पिछले कुछ दिनों जहां बिहार के बक्सर जिले के चौसा गांव में मौजूद गंगा में कई शव दिखे तो उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में भी कई स्थानों पर कई शव देखे गए। ऐसी आशंका है कि इसकी मौत कोरोना से हुई होगी।

घाट पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर कब्र हैं, कुछ कब्रों को तो कुत्तों ने खोद भी दिया है। फोटो: सुमित यादव

वंशु ने आगे कहा, "हमारे पास जगह खत्म हो गई है। ऐसे में नदी के दूसरी तरफ के घाटों का इस्तेमाल शवों को दफनाने और जलाने के लिए किया जा रहा है।"

इतना ही नहीं यहां से करीब 100 किलोमीटर दूर कानपुर देहात के गांवों से भी लोग मृतकों को ला रहे हैं। उनमें से कई का दावा है कि अब तक उनके गांवों में कोई कोरोना टेस्ट नहीं किया गया। इसलिए उन्हें यह नहीं मालूम कि मरने वाला कोरोना से मरा या किसी अन्य बीमारी से।

इस बीच, बक्सर घाट पर पुजारी, दाह संस्कार के बाद सफाई करने वाले लोग, नाविक (जो परिजनों को नदी में राख में विसर्जित करने के लिए ले जाते है) सब काम में जुटे हैं, क्योंकि यहां से करीब 95 किमी दूर राज्य की राजधानी लखनऊ से भी बक्सर घाट पर शवों के आना का सिलसिला जारी है।

गांवों की ओर बढ़ते कोरोना महामारी के कदम

इस साल आई कोविड-19 की दूसरी लहर में इस वायरस अपना रुख ग्रामीण भारत की ओर किया है और इसे अपनी जद में ले लिया है। इन दिनों गांवों के लोग बुखार, सर्दी और खांसी की चपेट में हैं, जो कोरोना के शुरुआती लक्षण हैं। इनसे लोग मर भी रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का दावा है कि ग्रामीण भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या को कम आंका गया और उन्हें कम महत्व दिया गया है।

पड़ोसी के परिवार के बुजुर्ग सदस्य के अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहे चंद्रमा ने कहा, "गाँव में हालात बहुत खराब है।" उन्होंने आगे कहा, "गांवों में लोग अभी भी सर्दी, खांसी और बुखार से पीड़ित हैं। गांव में झोलाछाप डॉक्टर हैं, जिनकी दवाएं कभी काम करती हैं, कभी नहीं। गांवों में संक्रमण अधिक है, लेकिन बीमारों के इलाज के लिए कोई चिकित्सा सुविधा नहीं है।"

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में पिछले एक हफ्ते में कोरोना संक्रमण और मौतों के आंकड़ों में कमी आयी है।

अपने परिवार के एक बुजुर्ग व्यक्ति का अंतिम संस्कार करने आए कानपुर देहात जिले के संतोष कुमार ने कहा, "मीडिया में आप जो कुछ भी देखते हैं, वह जमीन हकीकत की तुलना में कुछ भी नहीं है। डॉक्टर वृद्ध लोगों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। अस्पताल उन सभी को भर्ती करने के लिए तैयार नहीं हैं, जिन्हें तत्काल चिकित्सा की आवश्यकता है। कोविड- 19 के मामलों की आधिकारिक संख्या हकीकत में कहीं ज्यादा है।"

आंकड़ों से पेश की जाती नई तस्वीर

राज्य सरकार द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो हफ्तों में उत्तर प्रदेश में सामने आए नए मामलों की संख्या में कमी आई है, लेकिन कोविड-19 के कारण मृत्यु की दर अधिक बनी हुई है।

लगभग 20 दिन पहले 23 अप्रैल को उत्तर प्रदेश में रोजाना दर्ज किए गए मामलों की संख्या 37,238 थी, जिसमें राज्य भर में कोरोना से 196 लोगों की मौत हुई थी। 13 मई को कोरोना के 17,775 मामले आए और 281 लोगों की मौत हुई, वहीं 14 मई को 15647 नए मामले दर्ज किए गए, जबकि 311 लोगों की मौत हो गई।

ग्रामीण क्षेत्रों में वायरस के प्रसार की स्पष्ट तस्वीर प्राप्त करने के लिए, 5 मई को उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने सभी 97,409 राजस्व गांवों में कोरोना लक्षणों के लिए लोगों की जांच करने और चिकित्सा किट वितरित करने के लिए एक घर-घर जाकर ग्रामीण सर्वेक्षण शुरू किया।

उत्तर प्रदेश सरकार ने गाँवों में घर-घर कोरोना की जानकारी इकट्ठा करने के लिए पांच दिवसीय कार्यक्रम भी चलाया था।

इस बीच, बक्सर घाट के विचलित करने वाले दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उन्नाव प्रशासन हरकत में आ गया है। 13 मई को जिला प्रशासन ने घाट पर अस्थायी कब्रों से कपड़ों को हटाकर घाट की सफाई करवाई और ठीक तरह से अंतिम संस्कार करने के निर्देश दिए।

12 मई की रात प्रेस को जारी एक बयान में उन्नाव के जिला मजिस्ट्रेट रविंद्र कुमार ने कहा, "यह हमारे संज्ञान में आया कि कुछ शवों को बक्सर घाट में दफनाया गया है। यह घाट रायबरेली, फतेहपुर और उन्नाव जैसे कई जिलों से करीब है। इसलिए इन सभी जिलों के लोग मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए यहां आते हैं। जब हमें पता चला कि लोगों ने शवों को रेत में दफना दिया है, तो हमने एक टीम भेजी और निर्देश जारी किए गए कि ऐसा दोबारा न किया जाए।"

यह पूछे जाने पर कि क्या ये शव आसपास के कोरोना रोगियों के हैं, जिला मजिस्ट्रेट ने कहा कि उन्हें अब तक जो जानकारी मिली है, उससे इसके संकेत नहीं मिलते हैं।

हालांकि इस पूरे मामले पर संज्ञान लेते हुए एक वार फिर जिला मजिस्ट्रेट रवींद्र कुमार और उन्नाव एसपी आनंद कुलकर्णी ने शुक्रवार 14 मई को घाट का दौरा किया। जिलाधिकारी रविंद्र कुमार ने घाट का निरीक्षण कर वहां मौजूद राजस्व व पुलिस कर्मियों को निर्देश दिया कि किसी को भी शव दफनाने न दिया जाए।

15 मई को जारी एक बयान में जिलाधिकारी रविंद्र कुमार ने उप जिलाधिकारियों को निर्देश दिए कि जिले की किसी भी तहसील के अंतर्गत स्थित निर्धारित घाटों पर शव को किसी भी हालत में नदी में न प्रवाहित किया जाए। अगर लोगों को लकड़ी की समस्या हो रही हो तो ऐसे लोगों को लकड़ी देना सुनिश्चित किया जाए।

जिलाधिकारी ने बताया कि निगरानी समितियों एवं रैपिड रिस्पांस टीम यह सुनिश्चित करें कि ग्रामीण क्षेत्रों में जहां (खेतों या अन्य जगह) पर परंपरागत रूप से शव दफनाये जाते है वही पर पर्याप्त गहराई में इन्हें दफनाया जाए, जिससे शव जमीन से बाहर न निकले और यह भी सुनिश्चित किया जाए कि इन स्थलों पर कोई जानवर आदि न जाने पाए। उन्होंने सख्त निर्देश देते हुए कहा कि इन स्थलों की निरंतर निगरानी सुनिश्चित करते हुए आवश्यकतानुसार पुलिस बल एवं कर्मचारियों की ड्यूटी लगायी गयी है।

वहीं बक्सर घाट के सिलसिले में जिलाधिकारी रविंद्र कुमार ने कहा, " किसी को भी शव दफनाने की अनुमति नहीं दी गई है। घाट पर गरीब लोगों के अंतिम संस्कार के लिए प्रशासन द्वारा लकड़ी की व्यवस्था की गई है, जिन लोगों की कोरोना से मौत हुई है, उनका अलग स्थान पर सुरक्षित तरीके से कोविड नियमों के तहत अंतिम संस्कार किया जाए।"

इस बीच बक्सर घाट के मामले पर इस क्षेत्र से विधायक एवं विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित ने 14 मई को प्रेस को जारी एक बयान में कहा कि उन्नाव के ताजे मामले को मुख्यमंत्री योगी ने स्वयं गंभीरता से लिया है। जिला प्रशासन सक्रिय है। सुनिश्चित किया गया है कि कोई भी व्यक्ति गरीबी या अभाव के कारण शव को गंगा में प्रवाहित न करें। अंतिम संस्कार का व्यय सरकार उठाएगी। दीक्षित ने अपील की है कि हम सब महामारी के इस हमले में कोरोना शिष्टाचार, मास्क और शारीरिक दूरी के अनुशासन का पालन करें। अफवाहों से सजग रहें।

उधर, बक्सर घाट पर नदी के किनारे एक कब्र खोदने वाले ने नाम न छापने की शर्त पर गांव कनेक्शन को बताया, "कभी-कभी इतने शवों को दफनाया जाता है कि हम गहरी खुदाई नहीं कर पाते हैं। ऐसे में हमने देखा है कि कुछ कब्रों को कुत्ते भी खोदने की कोशिश करते हैं।"

खबर को अंग्रेजी में यहां पढ़ें

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