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कर्नाटक: कोरोना संकट में लोगों का सहारा बने किरण, हर दिन पहुंचाते हैं जरूरी सामान

Piyush Kant PradhanPiyush Kant Pradhan   31 May 2020 6:56 AM GMT

बैंगलूरू (कर्नाटक)। कोरोना संकट में बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो लोगों की मदद के लिए आगे आए हैं, उन्हीं में से एक किरण भी हैं। जो हर दिन कई किमी स्कूटी चलाकर लोगों तक जरूरी सामान पहुंचाते हैं।

इस लॉकडाउन में दिहाड़ी मजदूरी करके कमाने खाने वालों के सामने पेट भरने का संकट आ गया है। इन रोज कमाने खाने वाले लोगों में प्रवासी मजदूर, सेक्स वर्कर, ठेला खोमचा चलाने वाले लोग शामिल हैं। इस संकट में दिव्यांग ट्रांसमैन किरण इनके लिए मसीहा साबित हो रहे हैं। अपने तीन साथियों के साथ किरण पिछले दो महीने के बंदी में लोगों को मदद पहुँचा रहे हैं। इनका पूरा नाम भानोत उषाकिरण है लेकिन अपने को किरण कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं।

किरण बताते हैं, "हम सुबह के 9 बजे अपने एक्टिवा से अपने साथियों के साथ राशन लेकर निकल जाते हैं। और पूरा दिन इसका वितरण करते रहते हैं। जहां कहीं भी हमें सूचना मिलती है कि कुछ लोग ऐसे हैं जिनके पास खाने को कुछ नहीं है, वहां हम पहुंच जाते हैं।"


किरण आगे कहते हैं, "शुरुआत के कुछ दिनों में तो यह पता लगा पाना मुश्किल था कि कहां लोग फंसे हुए हैं, लेकिन कुछ दिन बाद हमें फ़ोन आने लगे कि यहां पर इतने लोग हैं जिनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है उसके बाद स्कूटी पर लेकर सामान पहुंचा देते थे।

किरण महाराष्ट्र के प्रवासी मजदूर के एक समूह को पिछले 45 दिन से राशन उपलब्ध करवा रहे हैं। वो कहते हैं, "मुझे एक दिन एक फ़ोन आया कि महाराष्ट्र के कुछ मजदूर हैं जिनके पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा है उनके छोटे बच्चे दूध के लिए रो रहे हैं। उसके बाद जब हम वहां पहुंचे तो वाकई स्थिति भयंकर थी। परिस्थितियों को भांपते हुए हमने उनसे वादा किया कि अब आप लोगों को राशन की दिक्कत नहीं होगी। जब भी राशन और दूध खत्म हो आप हमें फ़ोन करेंगे।"

किरण के लिए इस वादे को निभा पाना आसान नहीं था लेकिन उन्होंने खुद लोगों से मदद मांगकर उन तक राशन पहुंचाया।

दाएं पैर में पोलियों से 75 प्रतिशत दिव्यांग हैं किरण

किरण कहते हैं, "मैं महिला अंगों के साथ पैदा हुआ था और लड़की था। तीन साल की उम्र में, मुझे पोलियो हो गया था और निचले अंगों में लकवा मार गया था।"

किरण एक गरीब परिवार से हैं, पहले केआंध्रप्रदेश और अब के तेलंगाना राज्य में एक जनजाति समुदाय पाई जाती है जिसका नाम लम्बानि है। इसी जनजति समुदाय से किरण भी आते हैं। यह जनजति आर्थिक रूप से काफ़ी कमजोर होती है। किरण के माता-पिता ने उनका इलाज करवाने के लिए अपनी गायों को बेच दिया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।


वो कहते हैं कि मेरे माता-पिता ने कभी मेरी उपेक्षा नहीं की, लेकिन लड़कियों के खिलाफ पारंपरिक पूर्वाग्रह बहुत मजबूत था, खासकर इस लाम्बानी जनजाति में।

समाज के ताने से परेशान होकर आत्महत्या की कोशिश कर चुके हैं किरण

गरीबों के मददगार बने किरण साल 2010 में समाज के ताने और अपने लोगों से भरपूर प्रेम न मिलने के कारण सुसाइड करने का प्रयास किया था। किरण दुखी मन से बताते हैं, "भारतीय समाज में एक ऐसी विडंबना है कि वो अपने जैसे दिखने वाले, अपने जैसे बोलने वाले और अपने ही जैसे व्यवहार करने वाले को अपना पाते हैं। मैं महिला अंगों के साथ पैदा भले हुई था लेकिन हमारे अंदर के सभी व्यवहार पुरुष वाले थे इसके लिए घर में और बाहर भी खूब मज़ाक उड़ाया जाता था। लेकिन इसमें हमारी कोई गलती नहीं थी। मुझे नहीं समझ आता था मैं अपने इस व्यवहार को कैसे बदलूँ। फिर मैंने निर्णय लिया कि शायद यह समाज ऐसे लोगों को स्वीकार न करे इससे बेहतर है हम खुद न रहें।

लम्बानी जनजाति की उस बाधाओं से निकलकर तेलंगाना से कर्नाटक आ गए। कर्नाटक हम लोगों के लिए आसान नहीं था। वहां की भाषा, खान पान सब कुछ अलग था। कर्नाटक में भी लोगों से एकाएक घुलनशील हो पाना सम्भव नहीं था लेकिन एक साल में हम दोनों ने मिलकर लोगों को जोड़ा ताकि यहाँ एक शुकुन की जिंदगी जी सकें।

बचपन से किया है जीवन के लिए संघर्ष :

किरण बताती हैं, "जब मैं पैदा हुआ तो माता-पिता बहुत खुश हुए थे कि हमारे घर में बेटी हुई है। लेकिन उनको कैसे पता चलता कि जिस बेटी के लिए वो खुश हो रहे हैं उसके अंदर पुरुषों के गुण हैं। तीन साल की उम्र में ही मुझे पोलियों की बीमारी हो गया। हमारे जीवन पर कुदरत की यह दोहरी मार थी। मेरे दो बहन और एक भाई हैं। पोलियो की वजह से मैं स्कूल नहीं जा पाता था। और परिवार इतना अमीर नहीं था कि हमारे लिए व्हीलचेयर खरीद सके। मैंने अपने माता-पिता से कई बार कहा कि मैं स्कूल जाना चाहता हूं।"


वो आगे कहते हैं, " एक दिन जब बारिश हो रही थी, एक गाँव के शिक्षक, श्री कृष्णमूर्ति, मेरे माता-पिता से बात करने के लिए घर आए कि मुझे स्कूल में डाल दिया जाए। मेरे माता-पिता ने कहा कि स्कूल दो किलोमीटर दूर था और मेरे पास व्हीलचेयर भी नहीं थी। शिक्षक ने कहा कि वह मेरी मदद और समर्थन करेगा। उन्होंने मुझे अपना नाम बद्री से उषाकिरण में बदलने के लिए कहा क्योंकि बद्री एक आदिवासी नाम था और इससे मुझे परेशानी होगी। मैं नौ साल के लिए स्कूल गया था। लेकिन मुझे समस्या थी। दोस्ती नहीं। कोई स्वतंत्रता नहीं। किसी चीज में कोई दिलचस्पी नहीं। ड्रेस एक समस्या थी क्योंकि मैंने शॉर्ट्स पहनी थी और उन्होंने स्कूल में कहा था कि एक लड़की को एक लड़की की तरह कपड़े पहनने चाहिए। यह सब कुछ मेरे लिए आसान नहीं था।

समाज के मुख्यधारा से जुड़ने के जज्बे ने किया मदद को प्रेरित :

किरण ट्रांसमैन हैं। वो कहते हैं कि ट्रांसजेंडर समुदाय समाज के मुख्यधारा बिल्कुल नहीं जुड़ पाता है। लोगों की नजर में हिजड़ा लोग केवल ट्रेनों में मांगने और सेक्सवर्क में ही संलिप्त होते हैं। उनको यह नहीं पता होता है कि बहुत मजबूरी में यह सब करना पड़ता है। और फिर हम लोग भी तो तो उसी समाज से निकलकर आये हैं जिसके आज वो हिस्सा हैं। यही सारी बातें आज मदद की प्रेरणा बन पाया है। हमनें सोचा कि क्यों न हम इन्हीं लोगों की मदद करके इनसे जुड़ने का प्रयास करें। संकट के इस समय में लोगों की मदद करना हमारे लिए एक सुखद अनुभव रहा है।

दलित, विकलांग और ट्रांसमैन होने का पीड़ा जीवन भर साथ रहा

किरण कहते हैं कि मेरे जीवन के लिए दलित होना, उसके बाद विकलांग होना और फिर ट्रांसमैन होना सबसे बड़ा अभिशाप बन गया है। जब मैं छोटा था तो एक ऐसे समुदाय के बीच रहना पड़ता था जहां अधिकार के नाम पर कुछ भी नहीं मिलता है। दलित होना हमारे लिए सबसे बड़ा संकट हो गया था। जब तक दलित के संकट से उभरता तब तक या उससे पहले ही शारिरिक विकलांगता से परेशान हो गया। कमर के नीचे सभी अंग काम करना बंद कर दिए। मेरा जीवन जैसे कष्ट सहने के लिए ही बना हो।

विकलांगता को चुनौती देते हुए जब कुछ करने का समय आया तो ट्रांसमैन होना हमारे समाज को खटक गया और फिर ट्रांसमैन ने पूरे समाज से काटकर एक ऐसे समुदाय से जोड़ दिया जहाँ पीड़ा और कष्ट के अलावा कुछ नहीं नजर आ रहा था। पूरे जीवन के इस दौर में यह तीन बाधाओं ने बहुत परेशान किया लेकिन इन बाधाओं को तोड़कर कुछ करने की ज़िद ने इस लायक बना दिया है जिससे आज हम मुख्यधारा के लोगों की मदद कर पा रहे हैं।

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