"ये तो मेरे लिए स्वर्ग और बैकुंठ है, यहां से मेरी लाश निकलेगी अब"

ओडिशा, महाराष्टृ, बिहार, उत्तर प्रदेश के अलावा कई और राज्यों से, अपनी कई पीढ़ियां देख चुकी, विषम परिस्थितियों से त्रस्त होकर आश्रम में आई ढेरों महिलाएं आज फिर नए दोस्त बना रही हैं और खुशी के गीत गा कर एक नए जीवन की ओर अग्रसर हैं।

Jigyasa MishraJigyasa Mishra   27 April 2019 6:51 AM GMT

वृन्दावन (उत्तर प्रदेश)। वृद्ध आश्रय या महिला आश्रय सुनकर अक़सर बेसहाय, निराश और मायूस लोगों की छवि दिमाग में बनती है। ऐसे लोग जो किसी मजबूरी में यहाँ आकर अपना जीवन यापन कर रहे होंगे। लेकिन मथुरा जिले के वृंदावन में एक ऐसा महिला आश्रय है जहाँ रहने वाली महिलाएं अपने आखिरी दम तक यहीं रहना चाहती हैं।

ओडिशा, महाराष्टृ, बिहार, उत्तर प्रदेश के अलावा कई और राज्यों से, अपनी कई पीढ़ियां देख चुकी, विषम परिस्थितियों से त्रस्त होकर आश्रम में आई ढेरों महिलाएं आज फिर नए दोस्त बना रही हैं और खुशी के गीत गा कर एक नए जीवन की ओर अग्रसर हैं।

लेकिन इस ख़ुशी भरे माहौल तक पहुंचने से पहले इन सभी महिलाओं ने दुखों का पहाड़ पार किया है।

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"बहुत गन्दा माहौल था घर का... क्या-क्या बताएं... मने जब मेरे बेटा का शादी हुआ था तब से ये सब शुरू हो गया था। बहु जो थी मेरी वो बोली कि मुझको कहीं और भेज दो। वो मुझे नहीं रहने देने का चाहती थी। मेरा बेटा नहीं मना तो वो अपने माने... मायके चली गयी तो मेरा बेटा का तबियत ख़राब हो गया था बहुत फिर वो आई और बहुत ख़राब माहौल हो गया था घर का। तब मैं खुद मेरे बेटे से बोली कि मुझको यहाँ, मने आश्रम में छोड़ दे," कहते-कहते 65 वर्षीय सुषमा के आँखों में पानी डबडबा गए थे। सुषमा नागपुर के पास एक गाँव की रहने वाली हैं लेकिन पिछले दो सालों से महिला आश्रय में अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं।

मध्य प्रदेश की रहने वाली मालिनी तिवारी जो 'ज़िन्दगी एक सफ़र है सुहाना' गाती भी हैं और जीती भी हैं उनकी भी कुछ ऎसी ही कहानी थी।

"एक बड़ी संस्था में संगीत टीचर की हैसियत से बीस साल काम किया था, बॉम्बे में। फ़िर उन लोगों ने बहुत कम पैसे दिए और एक दिन कहा अब मेरी ज़रुरत नहीं थे वहां। मुझे मेरे काम का अनुभव प्रमाण पात्र भी नहीं दिया। मेरी माँ भी चल बसी थी। उसके बाद मैं यहाँ सोने का खम्भा देखने आई थी। मैया से मैंने प्रार्थना की कि मरते टाइम अपने धाम में मुझे बुला लेना, भगवान। ... और देखो, उन्होंने बुला लिया। इस जगह का मैं पांच साल से इंतज़ार कर रही थी कि ये (महिला आश्रय) कब बने, कब बने, कब बने... पिछले साल मैं यहाँ (वृन्दावन) आयी और एक जगह पर दस दिन रही, एक दुसरे आश्रम में फिर यहाँ आ गयी। और मेरे लिए तो ये जगह स्वर्ग है, बैकुंठ है मेरे लिए, अब तो यहाँ से मेरी लाश ही निकलेगी," मालिनी तिवारी ने बताया।

"यहाँ तो हमें दिन में 5 बार खाने को मिलता है, इतना तो, अगर शादी की होती, बच्चे वच्चे होते तो कभी कोई घर पर भी नहीं देता। अब यहाँ पर मैं आ गई हूँ तो यहाँ से मेरी लाश ही निकलेगी। (यहाँ) मैं बहुत खुश हूँ, (यहाँ) भगवान हैं, मंदिर है, बाग़-बगीचा है, क्या बिस्तर है, किचन है, क्या नहीं है यहाँ! हर सुविधा है," मालिनी आगे बताती हैं।

महाराष्ट्र से आयीं ऊषा को भी बच्चों ने घर से निकल दिया था जब वो यहाँ आयीं। "कभी किसी की कमी ही नहीं महसूस होती। जब तक घर में थी तो बहुत टेंशन में थी कि मेरा क्या होगा... करके। लेकिन यहाँ मैं अब निश्चिन्त हूँ," तीन साल से आश्रम में रहने वाली ऊषा श्रीवास्तव बताती हैं।

बिहार के मधुबनी से किसी तरह अपनी जान बचाकर आई सुनीता (बदला हुआ नाम) सबसे अलग मालूम होती हैं आश्रय में। आश्रम कर्मचारियों ने बताया कि वो किसी से बात ही नहीं करतीं। पर आश्रम की ही निवासी, सुनंदा से उनकी बड़ी दोस्ती है।

"मैया, हमें तो बहुत आनंद है। हम तो सब छोड़कर यहाँ आये और खुशी-खुशी में हैं... खुशी-ख़ुशी में हैं," सुनंदा ने बताया। सुनीता के कन्धों पर हाथ रख कर वो फ़िर बोलीं, "और अपनी तो दोस्ती है। है न?" जवाब में काफ़ी देर से गंभीर दिख रही सुनीता के चेहरे पर अंततः एक बड़ी सी मुस्कान आई और दोनों ने एक दुसरे को गले से लगा लिया। (इसे आप वीडियो में भी देख सकते हैं।)

मुंशी प्रेमचंद ने सही ही लिखा है, "बुढ़ापा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है।"


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