बंदर और जंगली सुअर के बाद छुट्टा पशुओं से परेशान हैं उत्तराखंड के किसान

रोबिन सिंह चौहान, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

रुद्रप्रयाग/चमोली(उत्तराखंड)। पलायन के बाद दूर शहरों में बसे लोगों ने यहां पर रहने वालों की समस्या बढ़ा दी है, जो बाहर गया उसने घर में तो ताला लगा दिया, लेकिन अपने जानवरों को खुला छोड़ दिया, जो अब फसल बर्बाद कर रहे हैं।

रुद्रप्रयाग जिले के मंदाकिनी घाटी में रहने वाले किसान बताते हैं, "आवारा गायों का आतंक बढ़ गया है, इससे पहले तो सिर्फ जंगली सुअर और बंदरों का आतंक हुआ करता था, लेकिन अब आवारा गाय और बछड़ों को लोग अपने घरों से छोड़ दे रहे हैं। जो फसलों को बर्बाद कर दे रहे हैं। रात-दिन जहां देखों आपको सड़कों पर, खेत-खलिहान में आपको गाय का झुंड दिख जाएगा। गाँव में भी घरों में घुस रही हैं, जिससे यहां पर बहुत बड़ी परेशानी यहां पर हो रही है।"

वहीं इस इलाके के लोगों ने अब एक नया तरीका यह इजाद कर लिया है कि इन आवारा घूम रहे गोवंश को वह गाड़ी में कहीं दूर जंगलों में छोड़ आते हैं। इसके लिए गांव वाले पैसा इकट्ठा करते हैं और गाड़ी वाले को पैसा दिया जाता है लेकिन इससे भी मुसीबत का हल फिलहाल होता दिखाई नहीं दे रहा। क्योंकि कुछ समय बाद यह गोवंश दोबारा से सड़कों पर दिखाई देता है वही खेतों में फसलों को बर्बाद करता है पहाड़ के छोटे-छोटे बाजारों में आवारा घूम रही गाय और गोवंश आपको आसानी से दिख जाएंगे।


वो आगे बताते हैं, "ये खेतों में घुसकर नुकसान पहुंचाते हैं, दिन ब दिन इनकी संख्या बढ़ जाती है। हम गाँव वाले पैसा इकट्ठा करके इन्हें ऊपर पहाड़ पर जंगलों में छोड़ आते हैं, ताकि ये नुकसान न पहुंचाएं, लेकिन ये फिर वापस लौट आती हैं। हम लोग रात-दिन पहरा देते रहते हैं।"

वर्ष 2012 में हुई अंतिम पशुगणना के अनुसार भारत में करीब 52 लाख छुट्टा पशु हैं। पिछले सात सालों में इनकी जनसंख्या में बढ़ोत्तरी ही हुई है। वहीं 16 जुलाई 2018 में 'द वाशिंगटन पोस्ट' में छपी खबर के मुताबिक के भारत में 52 लाख छुट्टा गायें सड़कों पर घूमती हैं। शहरों में ये यातायात जाम करती हैं तो गांवों में ये खेतों को नुकसान पहुंचाती हैं। खबर के मुताबिक एक राज्य में दस लाख से अधिक छुट्टा पशु हैं।

अखिल भारतीय किसान महासभा के मुताबिक वर्ष 2016-17 में पर्वतीय क्षेत्रों में मात्र 20 फीसदी कृषि भूमि थी, बाकी या तो बंजर छोड़ दी गई या फिर कमर्शियल उद्देश्यों के चलते बेच दी गई। महासभा का मानना था कि जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाना एक बड़ी समस्या है। राज्य में मात्र 7,84,117 हेक्टअर क्षेत्र में कृषि उत्पादन होता है। जबकि राज्य की 90 फीसदी आबादी आजीविका के लिए खेती पर ही निर्भर करती है। इसमें भी सिर्फ 12 फीसदी ज़मीन पर सिंचाई की व्यवस्था है, बाकि वर्षा आधारित खेती करते हैं।"

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गर्मियों में सबसे जानवर नुकसान पहुंचाते हैं, जब जंगलों में पानी स्रोत सूख जाते हैं तो हाथी पानी पीने के लिए आते हैं, अक्सर ये जानवर खेतों तक आ जाते हैं और फसल बर्बाद कर देते हैं। पलायन आयोग के मुताबिक उत्तराखंड में 2011 की जनगणना के बाद से अब तक 734 गांव पूरी तरह खाली हो गए हैं, वहीं 565 ऐसे गांव हैं जिनकी जनसंख्या 50 प्रतिशत से कम हो गई है।

वहीं पौड़ी गढ़वाल जिले के दुगड्डा गाँव के किसान किसान मुकेश कहते हैं, "हम लोग यहां धान-गेहूं उगाते हैं, यहां पर आठ-दस साल से हाथी बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं और बंदर तो लगातार ही आ रहे हैं, अब खेती में कुछ हो नहीं रहा है तो लोग पलायन करेंगे ही।"

प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र में मात्र 20 फीसदी कृषि भूमि है और 80 फीसदी अप्रयुक्त है या बेची जा चुकी है। इस 20 प्रतिशत कृषि भूमि में भी मात्र 12 प्रतिशत सिंचित है और 08 फीसदी वर्षा पर आधारित है। इस पर भी जो खेती हो पाती है उसे जंगली जानवर नष्ट कर देते हैं और रही बची फसल की उचित कीमत नहीं मिल पाती।

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