राजकीय कुष्ठ आश्रम में रहने वाले कुष्ठरोगियों का दर्द, सरकार तक पहुंचाना चाहते हैं अपनी बात

Mohit SainiMohit Saini   10 Oct 2019 11:55 AM GMT

रिठानी, मेरठ (उत्तर प्रदेश)। एक समय था कि इस कुष्ठाश्रम में पचास से अधिक कुष्ठ रोगी रहा करते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ये संख्या घटकर पांच रह गई। सुविधाओं की कमी से अब कोई यहां नहीं आना चाहता है।

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिला मुख्यालय से लगभग आठ किमी दूर रिठानी गाँव में साल 1954 में कुष्ठ आश्रम की शुरूआत की गई थी। मेरठ ही नहीं आसपास के कई जिलों से लोग लोग यहां पर दान करने आते थे, जिससे यहां के लोगों का खर्च आसानी से चल जाता था। कई प्रदेशों से पचास से कुष्ठ रोगी यहां रहते थे, आज उनकी संख्या पांच रह गई है, जिसमें एक पुरुष और चार महिलाएं हैं।

कई वर्षों से आश्रम में रह रही बंगाल की सीमा देवी का दर्द उनकी आंखों से छलक जाता है, वो बताती हैं, "मेरे फूफा बचपन में मुझे यहां छोड़ गए थे, इतने साल हो गए लेकिन अब कोई मिलने नहीं आता है।"


कुष्ठ रोगियों की शिकायत है कि सरकार हमे पांच किलो चावल 10 किलो आटा और 250 ग्राम तेल देते हैं, जिससे उनका गुजारा होना मुमकिन है ना ही दूध मिलता है और ना ही साग-सब्जी मिलती है कभी कभी ये आलम हो जाता है कि भूखे रहकर भी सोना पड़ता है।

राजकीय कुष्ठ आश्रम में रहने वाले कुष्ठ रोगियों की सबसे बड़ी समस्या रास्ते की है। मैथिला देवी बताती हैं, "जंगल से होकर गुजरने वाला रास्ता बेहद खतरनाक है और जो दानी लोग हैं वह आने से कतराते हैं कच्चा रास्ता होने के कारण बरसात में बड़े गड्ढे हो जाते हैं कीचड़ हो जाता है, जिसके कारण बाहर से आने वाले दानी लोग वापसी घर लौट जाते हैं क्योंकि रास्ता बेहद कच्चा और जंगल का है।"

कुष्ठ आश्रम में कुष्ठरोगी आरती चौबे कहती हैं, "यहां पर डॉक्टर एक महीने में एक बार आते हैं, रास्ते के कारण कोई दानी दान देने नहीं आते और रास्ते खराब होने के कारण डॉक्टर भी महीने में आते हैं हमारे पास कभी पैसा नहीं होता बुखार आ जाता है। तो दानी लोग जो पैसा देकर जाते हैं उनसे ही हम अपना ईलाज कराने पास के डॉक्टर के यहां चले जाते हैं या फोन करके उन्हें बुला लेते हैं लेकिन जो सरकारी डॉक्टर है वह महीने में एक बार ही आते हैं।

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