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महाराष्ट्र की लाल कंधारी गाय कम खर्च में देती है ज्यादा दूध

Divendra SinghDivendra Singh   4 Jan 2020 6:57 AM GMT

कंधार, नांदेड़(महाराष्ट्र)। महाराष्ट्र के एक तालुका से कंधारी गाय कई राज्यों तक पहुंच गई है, लेकिन कंधार तालुका में ही इन गायों की संख्या कम हो रही है। जबकि इस गाय के पालन में ज्यादा मेहनत भी नहीं लगती और कम खर्च भी।

महाराष्ट्र के नांदेड़ ज़िला मुख्यालय से लगभग 50 किमी. दूर कंधार तालुका के गऊळ गाँव में सबसे ज्यादा कंधारी किस्म की गायें हैं। गऊळ गाँव के राघवराय नारायण पंदेवाड़ के पास कंधारी किस्म की 60 गाएं हैं, वो हर वर्ष लगने वाले पशु मेला में अपनी गायों को लेकर जाते हैं। कंधारी की खासियत के बारे में बताते हैं, "इसे पालने में ज्यादा मेहनत नहीं लगती और इसको खिलाने के लिए ज्यादा चारा भी नहीं लगता है। हमारे अभी भी खेती बैलों से ही होती है, इसके बैल बहुत मजबूत होते हैं।"


लाल कंधारी गाय के प्रजनन क्षेत्र महाराष्ट्र के अहमदनगर, परभणी, बीड, नांदेड़ और लातूर जिले हैं। यह नस्ल कर्नाटक में भी अधिक मात्रा में पायी जाती है। महाराष्ट्र में पाये जाने वाली लाल कंधारी गायों के बारे में मान्यता है कि इस प्रजाति को चौथी सदी में कांधार के राजाओं के द्वारा विकसित किया गया था। लाल कंधारी को "लखाल्बुन्दा" नाम से भी जाना जाता है।

गऊळ गाँव के हनुंमत रामराव बताते हैं, "हम इन्हें सुबह चरने के लिए छोड़ देते हैं, इसलिए इन्हें ज्यादा चारा भी नहीं देना पड़ता है। जब इन्हें बेचते हैं तो एक गाय के 40-50 हजार रुपए में बिकती हैं, और एक जोड़ी बैल तो एक लाख तक बिक जाते हैं।"

देशभर में दूध के उत्पादन में महाराष्ट्र का 7वां स्थान है। आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2018-19 में दूध पैदा करने के मामले में देशभर में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है। इसके बाद राजस्थान, मध्यप्रदेश, आंधप्रदेश, गुजरात, पंजाब और महाराष्ट्र है।

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औसत आकर की ये गाये गहरे भूरे अथवा गहरे लाल रंग की होती हैं। लंबे कान नीचे की ओर झुके होते हैं और आंखों के चारो ओर कालापन होता है। सीगें छोटी और दोनों तरफ सीधी लाइन में फैली हुई और पूंछ काली व लंबी होती हैं। चौड़ा माथा, ऊंचा कूबड़ आदि इसकी प्रमुख विशेषता हैं। गायों की तुलना में बैल ज्यादा गहरे रंग के होते हैं। सींग समान रूप से घुमावदार और मध्यम आकार के होते हैं।


जिस तरह से इनकी संख्या कम हो रही है, इनके संरक्षण के लिए यहां पर 'लाल कंधारी गुरांचे संवर्धन केंद्र' (लाल कंधारी गाय ब्रीडिंग सेंटर) भी बनाया गया है। जहां पर कंधारी के संरक्षण पर काम हो रहा है। इस गाय का औसत दूध उत्पादन 400 से 600 किलोग्राम होता है। ये लगभग 230-270 दिनों तक दूध देती हैं और शुष्क अवधि 130-190 दिन की होती है। ये गायें प्रतिदिन 1.5 - 4 लीटर दूध देती हैं दूध में औसत वसा प्रतिशत 4.57 होती है। पहले ब्यांत (calving)की अवधि 30-45 महीने और औसत प्रजनन अंतराल 360-700 दिन की होती है।

पूरे मराठवाड़ा में लाल कंधारी बैलों से ही खेती के सारे काम होते हैं। परभणी, पुणे, नांदेड़ में कंधार में लाल कंधार की बिक्री और खरीदने की सुविधा उपलब्ध है। लाल कंधारी कई काम वाली नस्ल मानी जाती है। बैलों को भारी कृषि कार्यों और परिवहन के लिए उपयोग में लाया जाता है। इन जानवरों को छोटे झुंड में केवल चराई पर व्यापक प्रबंधन प्रणाली के तहत रखा जाता है।

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