लॉकडाउन से छिन गया पूरे गाँव का रोजगार, अब किसी के पास कोई काम नहीं बचा है

रामजी मिश्रा, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)। "कोई पास बैठ कर काम नहीं कर सकता है। हम लोगों के पास खेती नहीं है, हम क्या कर सकते हैं। हमारा तो यही काम था अब वो बंद हो गया है।" अपने गाँव में ही चोटी बनाने का काम करने वाले पुरुषोत्तम कहते हैं।

बहुत से ऐसे गाँव हैं जिनके पास अपना खुद का बड़ा कारोबार है और लोग उससे बड़ी संख्या में जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक आत्मनिर्भर गाँव है उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में पड़ने वाला फीलनगर। इस गाँव में चोटी बनाने का काम होता है।

हाल ही में इस गाँव के कारोबार पर लॉडाउन का ग्रहण लग गया। इसके बाद जैसे सब कुछ बदल गया। लोग पूरी तरीके से सरकार से मिलने वाली सहायता पर आश्रित हो गए हैं। इस गाँव के लोग ना सिर्फ बेरोजगार हो गए हैं बल्कि गाँव की आर्थिक स्थिति एकदम ध्वस्त हो गई है। बावजूद इसके गाँव के लोग लॉकडाउन को बेहद जरूरी मानते हैं।


इसी गाँव के संजीव यादव बताते हैं, "इस गाँव में लगभग हर घर में चोटी बनाने का काम होता है। हर व्यक्ति कम से कम सौ से डेढ़ सौ रुपए हर दिन कमाई कर ही लेता है। लेकिन लॉकडाउन के बाद धंधा ठंडा पड़ गया है। लोग कोटे से मिलने वाले अनाज पर निर्भर हो कर रह गए हैं।"

वहीं चोटी का काम करने वाले गंगाराम बताते हैं कि अब इस गाँव के लोगों के पास काम कुछ है ही नहीं। सरकार राशन दे रही है लेकिन हल्दी मिर्च आदि के लिए पैसे चाहिए। यहां हर रोज लोग दो सौ-तीन सौ से लेकर चार सौ तक कमा लेते थे लेकिन अब खाली बैठे हैं। किसी के पास इस समय रुपए नहीं हैं।

गाँव के ही रामकिशोर बताते हैं कि गाँव की आर्थिक स्थिति खराब हो गई है। लेकिन हम नियमों का पालन कर रहे हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद ही कुछ काम शुरू हो सकता है। ग्रामीणों की मानें तो इसकी वजह है कि चोटी बनाने के लिए जो कच्चा माल आता है वह दिल्ली से आता है। इसके अलावा जो चोटी तैयार होती हैं उन्हे भी दूर तक के खरीदार ले जाते थे। गाँव के लोग यह भी बताते हैं कि अब जो माल पहले का तैयार है उसे भी निकालने में काफी मुसीबत है। आस पास लगने वाले छोटे बड़े मेले में भी इनकी बिक्री हो जाती थी लेकिन अब तो सब बंद चल रहा है।

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