यहां बगैर मिट्टी के विदेशी सब्जियों और वनस्पतियों की होती है खेती

हम लोगों को अब तक यही बताया गया है कि पौधे को हवा, पानी और मिट्टी चाहिए जिससे इन पौधों का विकास होता है। लेकिन आजकल एक अनोखी तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, जिसका नाम हाइड्रोपोनिक्स यानी जलकृषि है।

यहां बगैर मिट्टी के विदेशी सब्जियों और वनस्पतियों की होती है खेतीसाभार इंटरनेट

चेन्नई। क्या आपने बिना मिट्टी के खेती के बारे में सुना है ? क्या आपने आस-पास इस तरह की खेती होती देखी है ? आज आपको एक ऐसी ही खेती के बारे में बताने जा रहे हैं जहां कम जगह के बावजूद बगैर मिट्टी के ना सिर्फ खेती होती है बल्कि अच्छी और बड़ी मात्रा में उपज भी होती है। हम लोगों को अब तक यही बताया गया है कि पौधे को हवा, पानी और मिट्टी चाहिए जिससे इन पौधों का विकास होता है। लेकिन आजकल एक अनोखी तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, जिसका नाम हाइड्रोपोनिक्स यानी जलकृषि है। एक ऐसा तरीका जिसमे बिना मिट्टी के पौधा बढ़ता है, जहां पानी में घुले खनिज पदार्थ और पोषक तत्व का घोल इन पौधों के विकास के काम आता है। चेन्नई के श्री पेरुमबदुर स्थित ऐडायापक्कम में सुपर ग्रीन्स इंडिया कंपनी का फार्म साल2014 से ही इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है।

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फार्म के प्रबंधकीय सलाहकार पी, साई कृष्णा बताते हैं, "इस पद्धति को विकसित करने में काफी शोध और प्रयोग किये गए हैं।" विशेषज्ञों द्वारा बंजर घोषित कर दिए गए जमीन पर सफलतापूर्वक खेती करने वाले पी साईं को खेती से बेहद लगाव है। वो बताते हैं, "मिट्टी जो अक्सर कीटनाशक दवाइयों से दूषित होता है कि जगह हमारे फार्म में खनिज पदार्थ का घोल इस्तेमाल किया जाता है। अपने फार्म पर हम पहले कठोर जल को आर ओ प्लांट की मदद से शुद्ध करते हैं। हम सूर्य की ऊर्जा का इस्तेमाल रिवर्स ओसमोसिस के लिये करते हैं। पानी का इस्तेमाल उस टैंक में किया जाता है जहां पोषक तत्व और खनीज पदार्थ का मिश्रण किया जाता है और बीज की रोपाई की जाती है।"

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कुछ समय के बाद स्पंज में अंकुर की बुआई कर दी जाती है और दो सप्ताह के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके बाद इसे खड़े रैक पर रखे गए कप में रख दिया जाता है। पानी की आपूर्ति जिस पाइप से की जाती है उसे इस तरह से तैयार किया जाता है वो वापस टैंक में पहुंच सके।"

यह सब कुछ एक नियंत्रित वातावरण में किया जाता है। साईं कहते, "हमने एक ग्रीनहाउस बनाया है जहां तापमान, सूर्य की रोशनी और आर्द्रता नियंत्रित की जाती है"। वर्टीकल फार्मिंग यानी खड़ी खेती में विश्वास रखने वाले साई इसे वक्त की जरूरत बताते हुए कहते हैं, "हम लोग इसके जरिए उत्पादन को 400 गुना तक बढ़ा देते हैं।"

पारंपरिक तरीके में एक पौधा एक वर्ग फीट जगह लेता है जबकि वर्टिकल फार्मिंग यानी खड़ी खेती में कई गुना उपज होता है। एक अनुमान के मुताबिक एक पौधा 60 दिन में तैयार हो जाता है वो प्रति सप्ताह 150 किलोग्राम विदेशी साग या वनस्पति पैदा करता है।

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रसियन और अमेरिकन काएल (एक प्रकार की गोभी), काई-लेन (चाइनीज़ ब्रोकली), तुलसी (बासिल) और पॉक चॉय (चाइनीज गोभी) जैसे कुछ उत्पाद हैं जिनकी खेती यहां की जाती है। साई बताते हैं, "इसे हम अच्छे रेस्त्रां और फाइव स्टार होटल्स में बेच देते हैं। ऐसे उत्पाद के लिए अच्छा बाजार भी है जो आमतौर इसका आयात करते रहे हैं।" एक ऐसे दौर में जहां ऑर्गेनिक यानी जैविक उत्पादों को अपनाने की होड़ है वहां इस तरह की खेती इससे एक कदम आगे बढ़कर है।



साईं कहते हैं, "कोई भी व्यक्ति जैविक उत्पाद की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकता है। हो सकता है कि एक किसान अपने खेत में रसायन का इस्तेमाल नहीं करता हो, लेकिन उस रासायन के असर का क्या जो उसके पड़ोस की खेत में इस्तेमाल हो रहा है?

विभिन्न कृषि पद्धतियों पर अनुसंधान कर रहे मथियालगान जी कहते हैं, "न केवल हाइड्रोपोनिक्स (जल कृषि) बल्कि एयरोपॉनिक्स (जहां पौधे को हवा में,कोहरे से भरे वातावरण बिना मिट्टी के इस्तेमाल के विकसित किया जाता है) तरीके की खेती संभव है"। उदाहरण के तौर पर हमारे देश में हाइड्रोपोनिक्स तरीके से टमाटर की खेती की जाती है जहां सिर्फ एक पौधे से 25 किलो टमाटर मिलता है।

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इस तरह की खेती जिसमे तापमान का नियंत्रण हमारे हाथ में होता है वहां खेती सालो भर की जा सकती है, जिसका नतीजा उत्पादन में अच्छी बढ़ोत्तरी के रुप में होगी। बिना मिट्टी के हवा में खेती की बात हमारे देश के लिए अभी बहुत नई और अनोखी है। इसकी जानकारी अभी भी अधिकांश किसानों को नहीं है और अगर किसी ने सुनी भी है तो उनका इस पर यकीन करना बेहद मुश्किल है। इस राह में सबसे बड़ी बाधा होनेवाले खर्च की है क्योंकि इस तरह की खेती बहुत महंगी होती है और इसके लिए अच्छी जानकारी के साथ-साथ बेहतर प्लानिंग की भी जरूरत पड़ती है जो देश के अधिकांश छोटे और सीमांत किसान के बूते के बाहर की बात है। जरूरत इस बात की है कि इस दिशा में मिलने वाले सरकारी प्रोत्साहनों की जानकारी आम किसानों तक पहुंच सके।

साभार: इफको लाइव

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