झारखंड के आदिवासियों से सीख सकते हैं पारंपरिक बीजों का संरक्षण

झारखंड के आदिवासियों से सीख सकते हैं पारंपरिक बीजों का संरक्षणझारखंड के आदिवासी किसान लुप्त हो रही किस्मों के बीजों का कर रहे हैं संरक्षण।

जोंगा, रमधी, चंद्रगही, कमलदानी, खीराबीचा, कैथका, सामजीरा, गोड़ा, भदई, पोठिया और गोड़ धान की ऐसी प्रजातियां हैं, जिनकी सैकड़ों साल से खेती होती थी लेकिन संकर बीजों के बढ़ते प्रचलन ने देश के प्रमुख धान उत्पादक राज्यों से यह प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर है लेकिन झारखंड के आदिवासी किसान आज भी इन बीजों को न सिर्फ संरक्षित कर रहे हैं बल्कि इनकी खेती भी कर रहे हैं।

इस बारे में जानकारी देती हुई झारखंड में परंपरागत और देसी खेती को बढ़ावा देने में लगी कार्यकर्ता सुनीता ने बताया '' झारखंड के आदिवासी टाना भगत समुदाय के किसान सैकड़ों वर्ष पुरानी परंपरागत धान के बीजों की खेती करके उसको बचा रहे हैं। संकर बीजों की तुलना में इन बीजों की खेती से किसानों को फायदा हो रहा है।''

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संकर और जीएम बीजों की गुणवत्ता को लेकर पुरी दुनिया में बहस चल रही है। माना जा रहा है कि अधिक उपज का लालच देकर बीजों के व्यापार में लगी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ऐसे बीजों को बढ़ावा दे रही है, इन बीजों की खेती करने से एक तरफ जहां फसलों पर अधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटानाशकों के प्रयोग से खेती की लागत बढ़ने के साथ ही मिट्टी की उर्वराशक्ति घट रही है। ऐसे में परंरागत और देसी बीजों को बचाने और उनके संरक्षण के लिए देशभर में अभियान चल रहे हैं।

झारखंड के लोहरदगा जिले के भंडरा ब्लाक के कसपुर गांव के किसान रामलगन उरांव ने बताया '' संकर धान की खेती करने को लेकर हर साल नया बीज खरीदना पड़ता वहीं हमारे पास जो देसी बीज हैं उनकेा बदलने की जरुरत नहीं पड़ती। देसी बीजों में खाद और पानी देनी की भी कम जरूरत पड़ती है। ''

जोंगा धान की विशेषता बताते हुए उन्होंने कहा कि इस धान का भात और मांड दोनों मीठा होता है। इसका स्वाद भी बहुत अच्छा होता है। सब्जी के बिना भी हम लोग इसको खा सकते हैं। झारखंड के गिरीडीह जिले के जमुआ ब्लॉक के किसान रामधन महतो ने बताया कि परंपरागत देसी बीजों को बचाने के लिए वह लोग अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं लेकिन सरकार की तरफ से ऐसा कोई काम नहीं किया जा रहा है।

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झारखंड में देसी बीजों को बचाने के लिए गाँवों में जहां किसान अपने आप से परंपरागत बीज मेला लगा रहे हैं वहीं बीजों का आपस में आदान-प्रदान भी कर रहे हैं। झारखंड की राजधानी रांची स्थित बिरसा मुण्डा कृषि विश्वविद्यलय के साथ मिलकर भी आदिवासी किसान देश के दूसरे किसानों तो देसी बीज पहुंचाने के लिए काम कर रहे हैं। देसी बीजों की खेती से भी अच्छी उपज हो सकती है इसको लेकर लोगों में प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है। गांव-गांव में छात्रों और युवाओं की मदद से बीज बैंक को भी स्थापित किया जा रहा है। साथ ही इन बीजों के औषधीय गुणों के बारे में लोगों को बताया जा रहा है। झारखंड में परंपरागत बीजों के जीव द्रव्य का संरक्षण भी किया जा रहा है। जीन कैंपेन और कई सारी दूसरी स्वंयसेवी संस्थाए भी देसी बीजों को संरक्षण के इस अभियान में आदिवासी किसानों की मदद कर रही हैं।

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