गर्मी बढ़ने पर कद्दू लौकी जैसी सब्जियों में लगने लगें रोग और कीड़े,  अपनाएं ये उपाय

गर्मी बढ़ने पर कद्दू लौकी जैसी सब्जियों में लगने लगें रोग और कीड़े,  अपनाएं ये उपायतापमान बढ़ने पर इन फसलों में लग जाता है रोग... फोटो- गांव कनेक्शन

लखनऊ। तापमान बढ़ने और गर्म हवाएं चलने से इस समय जायद की कई फसलों में कीट व रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है, खास करके लौकी, कद्दू जैसी कद्दू वर्गीय फसलों में इनका प्रकोप कुछ ज्यादा होता है, इसलिए समय रहते इनकी रोकथाम करनी चाहिए।

कृषि विज्ञान केन्द्र, सीतापुर के वैज्ञानिक (फसल सुरक्षा) डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव बताते हैं, "इस समय मौसम गर्म होता है, जिससे फसलों में रोग लगने की संभावना कम होती है, लेकिन कीट लगने लगते हैं, क्योंकि गर्मी बढ़ने से कीट छिपने के पत्तियों का सहारा लेते हैं और फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं।"

वो आगे बताते हैं, "मूंगफली, उड़द, मूंग और कद्दू वर्गीय फसलों को ज्यादा नुकसान पहुंचेगा, इसलिए इन फसलों में ज्यादा ध्याने देने की जरूरत होती है।"

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उपकार के महानिदेशक प्रो. राजेन्द्र कुमार ने कहा कि हमारा देश 169.478 मिलियन मीट्रिक टन सब्जी का उत्पादन करता है, जिसमें से 30 प्रतिशत कीट और सूक्ष्मजीवी रोगों के कारण नष्ट हो जाता है।

कद्दू वर्गीय सब्जियों में कीट प्रबंधन

लाल भृंग: यह कीट कद्दू वर्गीय सभी सब्जियों को हानि पहुंचाता है। इसकी वयस्क सूड़ी लाल रंग की लगभग पांच-आठ मिमी लंबी होती है। सूड़ी घास और झाड़ियों में छिपकर रहते हैं और तापमान बढ़ते ही झाड़ियों से निकलकर बाहर आती हैं।

रोकथाम: पेड़ के चारों ओर पांच प्रतिशत बीएचपी चूर्ण मिट्टी में मिलाएं। बीएचपी की मात्रा 25 किग्रा प्रति हेक्टेयर के अनुसार होनी चाहिए। इसके अतिरक्ति सुबह या शाम के समय जब यह सूड़ी अधिक नुकसान पहुंचाती है, पांच प्रतिशत बीएचपी के पाउडर का छिड़काव करें।

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मेलान मक्खी: यह फलनाशक मक्खी तरबूज, खरबूज, कद्दू, खीरा जैसी सभी सभी कद्दू वर्गीय सब्जियों को नुकसान पहुंचाती है। वयस्क मक्खी गर्मी में ज्यादा सक्रिय होती है। मादा कोमल फल पर छेद करके उसमें चार-आठ अंडे प्रत्येक छेद में देती है।

रोकथाम: पेड़ के चारों ओर मिट्टी की गुड़ाई करने से इनके प्यूपा धूप में मर जाते हैं। प्रभावित फलों को एकत्र कर जमीन में 600 मिमी गहराई पर दबा देना चाहिए। जहरीली बेट (50 ग्राम मेलाथियान, 200 ग्राम शीरा, दो लीटर पानी) के प्रयोग से नष्ट किया जा सकता है।

माहू: इसके वयस्क और बच्चे दोनों ही पौधों की पत्तियों और ऊपरी प्ररोह पर रस चूसते रहते हैं। यह कीड़ा एक तरल पदार्थ विसर्जित करता है, जिसपर बाद में फफूंदी उग आती है। खरबूजा और तरबूजे के अतिरक्ति ये बैंगन, कपास, भिण्डी, खीरा को भी नुकसान पहुंचाता है।

रोकथाम: इसको नष्ट करने के लिए 0.03 प्रतिशत मोनोक्रोटोफास या डेमीक्रान का छिड़काव करना चाहिए, लेकिन ध्यान रखना चाहिए इस विषैली दवा का छिड़काव फल पर न हो। अन्य दवाएं जो नीम से बनती हैं, जैसे, मल्टीनीम, नीमरिन प्रयोग जड़ वाली सब्जियों में करें।

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लौकी का बग कीट: इस कीट के बच्चे और वयस्क दोनों ही हानिकारक होते हैं, ये कोमल पत्तियों, कलियों, तनों और फलों का रस चूसते हैं। फल बढ़वार की अवस्था में इस कीट के प्रभाव से लौकी लकड़ी की तरह कड़ी हो जाती है।

रोकथाम: इसकी रोकथाम के लिए ओजोन बायोटेक, ओजानीम त्रिशूल 3000 पीपीएम या 10000 पीपीएम का प्रयोग करना चाहिए।

गन्ने में कीटों का रोकथाम

कंडुआ ग्रसित पौधों में बन रहे चाबुक दिखते ही उन्हे पॉलीइथिलीन के लिफाफे से ढककर कोटें व बोरों में भर दें और खेत में दूर ले जाकर जला दें या गड्ढे में दबा दें। रोग का फैलाव कम करने के लिए ग्रसित तनों को निकालकर नष्ट कर दें। जिस खेत में पेड़ी रखनी हो उसमें कंडुआ प्रभावित थान को जड़ से उखाड़कर नष्ट कर दें।

पाइरिला दिखने पर परजीवी इपीरिकेनिया के कोकून समूहों का (पत्ती के साथ) इनके बाहुल्य वाले खेतों से निकालकर इनकी कमी वाले खेतों में पत्तियों में स्टेपल करें।

अप्रैल में तना बेधक कीट की संभावना रहती है जो गोफ में लगता है इसकी रोकथाम के लिए क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. का दो लीटर या क्लोरेन्ट्रेनलीप्रोल (16.7 प्रतिशत) की 175 मिली. का 200 ली. पानी में घोलकर छिड़काव करें। पेड़ी में काले चिट्टे का प्रकोप होने पर दो प्रतिशत यूरिया का घोल डालें।

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मूंगफली के रोग एवं नियंत्रण

रोमिल इल्ली: रोमिन इल्ली पत्तियों को खाकर पौधों को अंगविहीन कर देता है। पूर्ण विकसित इल्लियों पर घने भूरे बाल होते हैं। यदि इसका आक्रमण शुरू होते ही

रोकथाम: क्विनलफास एक लीटर कीटनाशी दवा को 700-800 लीटर पानी में घोल बना प्रति हैक्टर छिड़काव करना चाहिए।

लीफ माइनर: लीफ माइनर के प्रकोप होने पर पत्तियों पर पीले रंग के धब्बे दिखाई पड़ने लगते हैं। इसके गिडार पत्तियों में अन्दर ही अन्दर हरे भाग को खाते रहते हैं और पत्तियों पर सफेद धारियॉं सी बन जाती हैं।

रोकथाम: इमिडाक्लोरपिड एक मिली. को एक लीटर पानी में घोल छिड़काव कर देना चाहिए।

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