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पारंपरिक फसलों का मोह छोड़ गाजर की खेती करते हैं यहां के किसान, उपज खरीदने गांव आते हैं व्यापारी

पारंपरिक फसलों का मोह छोड़ गाजर की खेती करते हैं यहां के किसान, उपज खरीदने गांव आते हैं व्यापारी

अमरपाल सिंह वर्मा

श्रीगंगानगर (राजस्थान)। किसानों की खुशहाली और संपन्नता का नमूना देखना हो तो साधुवाली गांव चले जाइए। यह गांव किसानों द्वारा पारपंरिक फसलों का मोह छोडक़र वैकल्पिक उपज लेने, ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने और बेहतरीन मार्केटिंग का अनूठा उदाहरण है। इस गांव के किसानों ने न केवल उत्कृष्ट किस्म की मिठास भरी गाजर उगाईं बल्की बिचौलियों को बाहर निकाल कर इन गाजरों को खरीदने के लिए व्यापारियों को गांव में ही आने पर मजबूर कर दिया। अन्य गांवों के किसान भले ही अपनी उपज को बेचने शहरों में स्थित मंडियों में जाते हों लेकिन साधुवाली के खेतों में उपजी गाजरों को लेने के लिए व्यापारियों को गांव में आना पड़ता है।

किसानों की अथक मेहनत और नवाचारों का उदाहरण बन चुका यह गांव राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में गंग नहर के किनारे पर स्थित है। श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय से महज आठ किमी दूर बसे साधुवाली गांव की सीमा जहां खत्म होती है, वहां से पंजाब शुरू हो जाता है। साधुवाली से 30-35 किमी की दूरी पर स्थित भारत-पाकिस्तान सीमा। इस गांव के किसान किसी जमाने में नरमा, कपास, गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों के ही मोह में फंसे थे।

1975 में गांव के बुधराम बिश्नोई, गोपाल भादू, शंकर पंवार, हरचंद आदि किसानों ने खेतों में गाजर उगाईं। गंग नहर के मुहाने पर बसे इस गांव में पानी की तो कोई कमी थी नहीं। भले ही थोड़ी-बहुत जमीन बुवाई की थी पर गाजरों की अच्छी पैदावार हुई। इसके बाद वह लगातार गाजर की खेती करने लगे। 1980-85 तक तो ये किसान इतनी ही गाजर बोते थे, जितनी चंद टोकरियों में समा सकें जिसे वे गंगानगर मंडी में ले जा कर बेच आते।

1990 से 1995 के बीच गांव के ज्यादातर किसान गाजर उगाने लगे और बंपर उत्पादन होने लग लग गया। यहां से गाजर पूरे गंगानगर जिले, पड़ोसी हनुमानगढ़ जिले और पंजाब से नजदीकी शहरों तक बिक्री के लिए जाने लगीं।

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साधुवाली गांव को गाजरों के ही कारण पहचाना जाने लगा। गाजर उत्पादक किसान समिति के अध्यक्ष अमर सिंह बिश्नोई बताते हैं, ''अब तो साधुवाली और आसपास के क्षेत्र में करीब 10 हजार हेक्टेयर जमीन में गाजरों की खेती होती है। अकेले साधुवाली गांव के ही करीब दो सौ किसान गाजर की खेती कर रहे हैं। किसानों का आर्थिक स्तर समृद्ध हुआ है। यहां के किसान खुशहाल और संपन्न की श्रेणी में आ गए हैं।''

वे आगे कहते हैं, ''इस बार गाजर का बम्पर उत्पादन हुआ है। नवम्बर महीने में गाजर की आवक मंडी में शुरू हो गई। अभी तक रोजाना 10 से 12 हजार बोरी गाजर की आवक प्रतिदिन हो रही है। एक बोरी में 50 किलो गाजर होती है और किसान को एक बोरी गाजर बेचने पर 800 से 1000 हजार रुपए मिल रहे हैं।''

इस तरह पाई मंजिल

किसानों के यह ठाठ-बाट शुरू से नहीं थे। साधुवाली के गाजर उत्पादक किसान भी बिचौलियों और व्यापारियों की मिलीभगत के शिकार थे। आज से 15-20 साल पहले तक किसानों को गाजर बेचने के लिए गंगानगर, फाजिल्का अबोहर आदि जगहों पर जाना पड़ता था। परिवहन खर्च व्यय करने के बावजूद वहां उन्हें बमुश्किल एक रुपए प्रतिकिलो ही दाम मिल पाते थे। किसानों को भारी निराशा का सामना करना पड़ता था। पन्द्रह साल पहले किसानों ने अपनी किस्मत के मालिक खुद बनने की ठान ली। तब गांव के किसानों ने एक समूह बना लिया। बिचौलिए दूर कर दिए। ऐलान कर दिया कि हम गाजर बेचने मंडी में नहीं जाएंगे। गांव में ही बोली लगेगी। जिसे लेनी हो, गांव में आ जाए।


फैसला करने के बाद किसान शाम चार बजे गांव में गंग नहर के किनारे पहुंच जाते। गाजरों की धुलाई करने के बाद पैकिंग करते। सुबह व्यापारी आते और बोली लगाते। जिस व्यापारी की बोली ज्यादा होती, उसे गाजर बेच देते। यह तरीका काम आया। किसानों की जेब में ज्यादा पैसा आने लगा। इसके बाद किसानों ने पलट कर नहीं देखा। उन्होंने नहर किनारे लगने वाली मंडी को व्यवस्थित किया। सोशल मीडिया का सहारा लेने लगे। फेसबुक, व्हाट्सएप आदि पर किसानों के ग्रुप बन गए हैं। वह अपनी जानकारी एक-दूसरे से इसके जरिए साझा करते हैं।

देश में दूर तक पहुंची गाजरे

पांच-छह साल पहले तक किसानों को नहर के पानी से गाजरों को धोना पड़ता था। यह काम बड़ा कठिन था और इसमें समय भी खूब लगता। फिर किसान धुलाई के लिए खास तरह की मशीनें ले आए। इससे उनका काम आसान हो गया। गाजर खूब लाल, गुलाबी, मिठास और रस भरी तो पहले से थीं, अच्छी सफाई से गाजरों की चमक बढ़ गई। इसी के साथ बढ़ गई मांग। अब तो देश में पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिमी बंगाल, ओडिशा और महाराष्ट्र में दूर-दूर तक साधुवाली की गाजर पहुंचने लगी हैं। किसान गाजर की ऑर्गेनिक खेती करते हैं। बिना खाद और केमिकल डाले उपजाई गई गाजर लोग खूब पसंद करते हैं।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाजर की खेती

साधुवाली में गाजर की खेती को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनाया जा रहा है। गांव के बुधराम बिश्नोई गाजर की खेती की शुरुआत करने वाले किसानों में थे। फिर उनके पुत्र रामस्वरूप ने इस खेती को अपनाया और अब बुधराम के पौत्र अमर सिंह गाजरों की खेती कर रहे हैं। अब गाजर की खेती केवल साधुवाली तक सीमित नहीं रही। साधुवाली से 80 किमी के दायरे में समूचे इलाके के किसान गाजर उगाने लगे हैं, जिसमें पड़ोसी राज्य पंजाब के किसान भी शामिल हैं।

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कृषि विभाग के रिटायर संयुक्त निदेशक वी.एस.नैण बताते हैं, ''साधुवाली के किसानों ने सचमुच एक मिसाल कायम की है। उन्होंने वक्त की नजाकत तो समझा। गाजर के रूप में एक ऐसे खाद्य उत्पाद को खेती के लिए चुना, जिसकी न केवल भारी मांग है बल्कि दाम भी अच्छे मिल रहे हैं। साधुवाली के किसानों की देखादेख समूचा इलाका 'गाजर हब' बन गया है। किसान पांच से लेकर पचास बीघा तक जमीन में गाजरें ही उगा रहे हैं। गाजर ने किसानों की कायापलट दी है।''

50 हजार रुपए प्रति बीघा मुनाफा पक्का

गाजर उत्पादक किसान समिति के अध्यक्ष अमर सिंह बिश्नोई बताते हैं, ''हमारे खेतों में एक बीघे में 50 से 80 कुंतल गाजरों का उत्पादन हो जाता है। समस्त खर्च निकालकर न्यूनतम 50 हजार रुपए तक प्रति बीघा मुनाफा हो सकता है। इस साल बहुत अच्छी आय हुई है। किसानों को 20 से 30 रुपए प्रति किलो तक दाम मिले हैं। इस वर्ष समूचे इलाके में करीब 100 करोड़ रुपए का टर्न-ओवर हुआ है।'' गांव के निवासी रिटायर पुलिस उप निरीक्षक राजेन्द्र भादू कहते हैं, ''गाजर की खेती करने वाले किसान बहुत अच्छी स्थिति में हैं। मैं और मेरा भाई भी तीन बीघा जमीन में गाजर उगाते हैं। ''

सरकार नहीं दे रही साथ

गाजर उत्पादक किसानों ने जो कुछ किया है, वह अपनी मेहनत के बूते किया है। सरकार ने कभी उनका साथ नहीं दिया है। गत भाजपा सरकार ने वर्ष 2016-17 के बजट में साधुवाली में गाजर मंडी बनाने का ऐलान किया लेकिन उसके बाद कुछ नहीं किया। किसान बार-बार क्षेत्र के दौरे पर आने वाले मंत्रियों तथा आला अधिकारियों का ध्यान इस ओर दिलाते रहे हैं लेकिन किसी ने कोई दिलचस्पी नहीं ली है। किसान चाहते हैं कि सरकार अगर मंडी नहीं बनाना चाहती तो यहां उनके लिए वाशिंग यार्ड की बनवा दे। इससे किसानों को गाजर की धुलाई में आसानी हो जाएगी। अभी नहर पर जिस प्रकार गाजरों की धुलाई होती है, वह काम बेहद जोखिम भरा है। श्रीगंगानगर के मौजूदा निर्दलीय राजकुमार गौड़ किसानों को तमाम सुख-सुविधाएं देने पर सहमति जताते हैं। इस संवाददाता ने जब उनसे साधुवाली में गाजर मंडी नहीं बनने के बारे में पूछा तो गौड़ बोले, ''गहलोत सरकार के आने के बाद ऐसी कोई घोषणा नहीं हुई है। पुरानी घोषणा के बारे मेंं मैं पता करूंगा। किसानों के लिए मेरे से जो बन पड़ेगा, मैं वह करूंगा।''



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