अब मध्य प्रदेश में भी होगी 500 रुपए किलो बिकने वाली काले चावल की खेती, डायबिटीज रोगी भी खा सकेंगे

अब मध्य प्रदेश में भी होगी 500 रुपए किलो बिकने वाली काले चावल की खेती, डायबिटीज रोगी भी खा सकेंगेफोटो साभार- assamicaagro.in

जबलपुर। सिक्किम, असम और मणिपुर में पैदा होने वाले काले चावल की खेती अब मध्य प्रदेश में भी होगी। सिक्किम सरकार की संस्था सीम्फेड ने इसके लिए दो जिलों का चयन किया है जहां इस विशेष प्रकार के चावल की खेती को प्रोत्साहित किया जाएगा।

काला चावल की मांग बाजार में लगातार बढ़ रही है। इसे देखते हुए सिक्किम सरकार की संस्था सीम्फेड (सिक्किम राज्य सहकारी आपूर्ति और विपणन संघ लिमिटेड) जो जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही है, की निगरानी में इसकी खेती देश के अन्य हिस्सों में भी शुरू हुई थी लेकिन अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली। ऐसे में अब इसकी पैदावार के लिए मध्य प्रदेश के मंडला और डिंडोरी जिले को चुना गया है। असम, सिक्किम और मणिपुर में पैदा होने वाले विशेष प्रकार के इस काले चावल को वहां की स्थानीय भाषा में चाक हवो कहा जाता है।

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इस बारे में सीम्फेड के प्रोजेक्ट मैनेजर राकेश सिंह बताते हैं " इस विशेष चावल की खेती के लिए मध्य प्रदेश के दो जिलों का चयन किया गया है। मंडला और डिंडोरी का मौसम इसकी पैदावार के लिए अनुकूल पाया गया है। असम से आयी टीम ने इसकी पुष्टि भी की है। " राकेश सिंह के मुताबिक बाजार में इस चावल की मांग दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। इस समय इस काले चावल की कीमत 200 से 500 रुपए प्रति किलो तक है। पारंपरिक सफेद चावल के मुकाबले काले चावल को सेहत के लिए ज्‍यादा बेहतर माना जाता है। वहीं यह किसानों के लिए भी बहुत लाभकारी है। हालांकि आम चावल की तरह इसकी पैदावार कम होती है लेकिन कीमत भी अच्छी मिलती है। एक एकड़ में सामान्य चावल की खेती जहां 25 से 30 कुंतल तक हो जाती है तो वहीं काला चावल की पैदावार आठ से 10 कुंतल होती है।

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राकेश सिंह आगे बताते हैं "इस चावल की सबसे खास बात यह है कि इसे मधुमेह रोगी भी खा सकते हैं। मेडिकली इसकी पुष्टि भी हो चुकी है। ये एंटी ऑक्‍सीडेंट होता है जो हमारे शरीर की रक्षा करता है। आम सफेद चावल के मुकाबले इसमें ज्‍यादा विटामिन बी और ई के साथ कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन और जिंक की मात्रा भी ज्‍यादा होती है।"

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काला चावल (चाको हवो) आकार में व्‍हाइट या ब्राउन राइस जैसा ही होता है। इसकी खेती की शुरुआत चीन से हुई थी। इसके बाद असम और मणिपुर में शुरू हुई। अब इसे देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचाने की कवायद हो रही है। अभी इसकी पैदावार सबसे ज्यादा मणिपुर में हो रही है। मणिपुर कृषि विभाग के अनुसार 2015 के खरीफ सीजन के दौरान 60 से 70 हेक्टेयर खेत पर चाक हाओ की पैदावार हुई थी। राज्य सरकार ने इसकी खेती का दायरा बढ़ाने का निर्णय लिया। मिशन ऑर्गेनिक वेल्यू चेन, एनई के तहत वर्ष 2016 के खरीफ सीजन में प्रदेश सरकार ने किसानों को करीब 2000 हेक्टेयर में इसकी पैदावार के लिए प्रेरित किया। मणिपुर सरकार के कृषि मंत्रालय के जरिए दिए गए आंकड़ों के अनुसार अन्य काले चावलों के मुकाबले चाक हाओ किसान, व्यापारियों से लेकर उपभोक्ता तक के लिए लाभ का सौदा है। इसकी खेती में प्रति हेक्टेयर 60 हजार रुपए की लागत आती है।

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वहीं सीम्फेड की वेबसाइट के अनुसार असम के किसान उपेंद्र राबा ने 2011 सबसे पहले इसकी खेती की थी। उपेंद्र ग्‍वालपारा जिले के आमगुरीपारा के रहने वाले हैं। उपेंद्र को इसी संस्था ने चावल की खेती के बारे में जानकारी दी थी। जब इसकी पैदावार बढ़ने लगी और किसानों को मुनाफा होने लगा तो अन्य किसानों ने इसकी तरफ रुख किया।

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राकेश सिंह आगे बताते हैं " सामान्य चावल की कीमत जहां 15 से 80 रुपए प्रति किलो होती है तो वहीं इस चावल की कीमत 200 रुपए से शुरू होती है। जबकि अगर आप इसे जैविक तरीके उगाते हैं तो 500 रुपए प्रति किलो तक इसकी कीमत मिल सकती है। इस लिहाज से इसकी खेती से किसान ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं।" असम की सरकार ने काले चावल की खेती को प्रोत्‍साहित करने के लिए 2015 से विशेष प्रोग्राम भी शुरू किया है।


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