देश में 22.5 लाख हेक्टेयर जमीन पर की जा रही जैविक खेती

देश में 22.5 लाख हेक्टेयर जमीन पर की जा रही जैविक खेतीराधा मोहन सिंह।

कृषि मंत्रालय ने किसानों को आवश्यक तकनीकी एवं कृषि संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने के लिए एक नए कार्यक्रम की रूपरेखा रखी है जिसके तहत देश के पांचों क्षेत्रों में क्षेत्रीय कृषि मेले कराने का काम किया जा रहा है।

परंपरागत कृषि विकास योजना एवं जैविक मूल्य श्रंखला जैसी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से देश में वर्तमान में 22.5 लाख हेक्टेयर जमीन पर जैविक खेती हो रही है। छोटे और सीमांत किसान जो कृषि लागत की खरीद के लिए असमर्थ है वे जैविक खेती की ओर उन्मुख हो सकते है जिसका खर्च कम है और मुनाफा ज्यादा।

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि प्रधानमंत्री जी ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य दिया है, जिसे हासिल करने के लिए कृषि मंत्रालय दिन-रात काम कर रहा है। कृषि मंत्री ने यह बात आज पोर्ट ब्लेयर में आयोजित तीन दिवसीय क्षेत्रीय किसान मेले में कही। इस मेले में दक्षिणी क्षेत्र के किसान हिस्सा ले रहे हैं।

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कृषि मंत्री ने कहा कि कृषि मंत्रालय ने किसानों को आवश्यक तकनीकी एवं कृषि संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने के लिए एक नए कार्यक्रम की रूपरेखा रखी जिसके तहत देश के पांचों क्षेत्रों में क्षेत्रीय कृषि मेले कराने का काम किया जा रहा है। दक्षिणी क्षेत्र में पहली बार यह कार्यक्रम, अण्डमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में किया जा रहा है जो हमारी सरकार की द्वीपों के विकास के प्रति प्रतिबद्धता को भी परिलक्षित करता हैं। उन्होंने कहा कि इस द्वीप समूह में व्याप्त सीमित संसाधनों को देखते हुए तथा द्वीपों में किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के उददेश्य से वर्ष 23 जून 1978 को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा द्वीपसमूह में स्थित विभिन्न कृषि अनुसंधान केन्द्रों का विलय कर केन्द्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान का गठन किया गया।

यह संस्थान, कृषि अनुसंधान एवं विकास की विभिन्न जरूरतों को पूरा करता हैं तथा अनुकूल एवं मौलिक अनुसंधान के माध्यम से फसलों, बागवानी उत्पादों, पशुधन और मत्स्य पालन में उत्पादकता तथा उत्पाद गुणवत्ता को बढ़ानें के लिए विभिन्न नवीन शोध कार्यो को करने हेतु तत्पर हैं।

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उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 से संस्थान की गतिविधियों का और अधिक विस्तार किया गया जिसके तहत् लक्षद्वीप में स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र को भी इस संस्थान के साथ जोड़ा गया। अप्रैल 2017 से केन्द्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान, मिनिकॉय द्वीप, ल़क्षद्वीप में भी अपना एक क्षेत्रीय केन्द्र चला रहा है। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता जताई कि इस मेले में लक्षद्वीप से भी किसान बंधु पधारें हैं। उन्होंने कहा कि द्वीप समूह में पर्यटन के अलावा, कृषि भी द्वीपवासियों की आजीविका का एक मुख्य अंग है तथा कृषि को और अधिक बढावा देने तथा किसानों को अधिक लाभप्रद फसलों के उत्पादन के लिए यह संस्थान अपनी ओर से आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक प्रदान करने के लिए समर्पित है।

उन्होंने बताया कि इस संस्थान को अपनी सेवा के विगत चार दशकों के दौरान कई बाधाओं का सामना करना पड़ा है। इन बाधाओं के बावजूद भी संस्थान ने द्वीपों में कृषि के विकास के लिए कई उल्लेखनीय उपलब्ध्यिां हासिल की हैं। अण्डमान एवं निकोबार प्रशासन के विकास संबंधी विभाग यहां बहुत अच्छा कार्य कर रहें है और इस संस्थान एवं प्रशासन के बीच बहुत अच्छे समन्वय एवं तालमेल से कार्य किया जा रहा है जिससे यहां के किसानों को अत्याधिक लाभ पहुंचने की संभावना हैं।

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कृषि मंत्री ने इसके पहले पोर्ट ब्लेयर में ही आयोजित जैविक खेती सम्मेलन में हिस्सा लिया। इस मौके पर उन्होंने बताया कि भारतवर्ष में वर्तमान में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से 22.5 लाख हेक्टेयर जमीन पर जैविक खेती हो रही है, जिसमें परंपरागत कृषि विकास योजना एवं जैविक मूल्य श्रंखला ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कृषि मंत्री ने जानकारी दी कि भारत सरकार, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) शुरू की गई है, जिसमें क्लस्टर मोड पर ओर्गनिक उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए देश भर में 50,000 रुपए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से तीन वर्षों के लिए अनुदान राशि दी जा रही है। यह अनुदान समस्त भारतवर्ष में जैविक उत्पादन, पीजीएस प्रमाणीकरण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन के लिए दी जा रही है। पीकेवीवाई के तहत देश के विभिन्नत क्षेत्रों में 2015-16 से 10,000 क्ल स्ट‍रों के गठन से 2 लाख हैक्टेवयर क्षेत्र जैविक खेती के लिए कवर किया गया है।

उन्होंने इस मौके यह भी कहा कि उन्हें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान और इन द्वीपों में आकर तथा हितधारकों के साथ जैविक खेती से संबंधित महत्वपूर्ण बातें साझा करके काफी प्रसन्नता हो रही है। उन्होंने कहा कि छोटे और सीमांत किसान जो कृषि लागत की खरीद के लिए असमर्थ है वे जैविक खेती की ओर उन्मुख हो सकते है जिसका खर्च कम है और मुनाफा ज्यादा। अंडमान निकोबार द्वीप समूह भी छोटे स्तर पर, (321 हेक्टेयर जैविक क्षेत्र) जैविक खेती को अपना रहा है, यद्यपि यह द्वीप पूरी तरह जैविक खेती के लिए अनुकूल है।

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