बीएससी के 'गणित' का खेती में इस्तेमाल, जैविक खादों से कम की लागत, पीएम मोदी ने की सराहना

27 साल के अरविंद निषाद ने गणित मध्यम से बीएससी की फिर बीटीसी की। लेकिन नौकरी के बजाए उन्होंने अपना सारा गुणा-भाग और ज्ञान खेती में लगाया, उन्होंने जैविक खेती अपनाई। उनके काम की प्रशंसा भी हो रही है। जैविक खेती के लिए पीएम मोदी भी उनकी तारीफ कर चुके हैं।

Sumit YadavSumit Yadav   24 May 2021 11:14 AM GMT

उन्नाव (उत्तर प्रदेश)। बीएससी (गणित) कर नौकरी खोजने के बजाय खेती में कुछ बेहतर करने की सोच ने अरविंद को अपने गांव के अलावा आसपास के गांवों के कई किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बना दिया है। यहां तक कि उनके काम की खबर लखनऊ और दिल्ली तक पहुंच गई है। जैविक तरीकों से खेती कर रहे अरविंद निषाद की तारीफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 14 मई 2021 को कर चुके हैं। पीएम मोदी ने 14 मई को पीएम किसान सम्मान योजना की 8वीं किस्त जारी करने के अवसर पर देश के कुछ प्रगतिशील किसानों से भी वीडियो के जरिए बात की थी।, जिसमें अरविंद भी शामिल थे।

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के सिकंदरपुर सरोसी ब्लॉक के रौतापुर गाँव के अरविंद निषाद के पास 3 एकड़ जमीन है, जिसमें वह गोबर और गोमूत्र से निर्मित जैविक खादों का प्रयोग कर धान, मक्का, उड़द, गेहूं, मूंगफली की फसल के अलावा खरबूजा, लौकी, तोरई, पपीता उगा रहे हैं।

"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा उन्नाव जिले के किसानों की जैविक खेती की तारीफ उन्नाव के लिए लिए गर्व की बात है।" नन्द किशोर, उप कृषि निदेशक, उन्नाव

गाँव कनेक्शन से बात करते हुए अरविंद (27 वर्ष) कहते हैं, " 2016 में बीएससी करने बीटीसी की पढ़ाई के साथ मैंने खेती करना शुरू किया, लेकिन परंपरागत खेती करने की लागत बहुत ज्यादा थी, जिससें खेती करना मुश्किल हो रहा था। 2018 में कृषि विभाग के माध्यम से मैंने जैविक खेती की जानकारी ली। इसके लिए मैंने चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय, कानपुर में लगे एक कैंप में प्रशिक्षण भी लिया।" गणित से स्नातक (बीएससी) अरविंद ने बीटीसी (Basic Teacher Certificate) और टीईटी (Teacher Eligibility Test) भी पास की है लेकिन नौकरी की बजाए उनका मन खेती में रमा है।

अरविंद आगे बताते हैं, वहां मुझे कई तरह की जैविक खादों के बारे में बताया गया, जो हम आसानी से अपने घर पर बिना किसी लागत के तैयार कर सकते हैं। इस बीच उन्नाव में प्रदेश सरकार द्वारा नमामि गंगे योजना की शुरुआत की गई, जिसके अंतर्गत गंगा के किनारे खेती कर रहे किसानों को जैविक खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा था। कृषि विभाग के सहयोग से मैंने भी 2019 में जैविक खेती की शुरुआत की, जिसका मुझे अब बहुत फायदा मिल रहा है।"

अरविंद के मुताबिक ज्यादातर किसान गोबर को सीधे खेतों में डाल देते हैं, जो ज्यादा डालने पर भी अच्छे परिणाम नहीं देता है लेकिन इसी गोबर और गौमूत्र से अगर जैविक खाद बनाएं तो पूरा फायदा मिल सकता है।

अरविंद कहते हैं, "गोबर, गौमूत्र तथा कुछ अन्य चीजों को मिलाकर हम जीवामृत, घन जीवामृत तथा वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार कर सकते हैं। इन खादों को बनाना बेहद सस्ता और आसान है। जैविक खाद का उपयोग कर हमने एक बीघे (करीब पौना एकड़) में 10 कुंतल गेहूं का उत्पादन किया है।"

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जैविक खाद कैसे करें तैयार और कैसे करना है प्रयोग

अरविंद के मुताबिक, जीवामृत को एक बीघा ( एकड़ ) खेत के लिए एक प्लास्टिक के ड्रम में 160 लीटर पानी भर देते हैं, फिर उसमें दस लीटर देसी गाय का मूत्र, 10 किलोग्राम गाय का गोबर, दो किलोग्राम गुड़, दो किलोग्राम बेसन और थोड़ी सी बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे की मिट्टी घोल देते हैं। एक दिन में कम से कम दो बार इसे किसी डंडे से क्लॉक वाइज (गोल-गोल) घुमाते हैं। गर्मियों के मौसम में दो से तीन दिन बाद और सर्दियों के मौसम में 5 से 6 दिन बाद इसका उपयोग फसल में किया जा सकता है।

जीवामृत के करने के बारे में अरविंद कहते हैं, "हम इसे दो तरीके से प्रयोग कर सकते है, पहला - फसल में पानी लगाते समय हम इसे नाली में धीरे-धीरे गिराते रहें, जिससे पानी के साथ यह पूरी फसल में फैल जाएगा या किसी टोटी दार बर्तन में भरकर नाली के किनारे रख दें और इसे धीरे धीरे पानी में गिरने दे।

दूसरा जीवामृत को छानकर स्प्रेयर के माध्यम से भी फसल में प्रयोग कर सकते हैं। ऐसा करने से फसल में ताकत देने के साथ यह विभिन्न रोगों से भी रक्षा करती है। जीवामृत से पौधे मजबूत होते हैं और दाना भरपूर और चमकदार आता है।

अपने घर पर ही जीवामृत, घन जीवामृत और वर्मी कंपोस्ट बनाने है अरविंद। फोटो- सुमित यादव

घन जीवामृत- जैविक की डीएपी

वो अपने खेतों में जीवामृत के साथ घन जीवामृत का भी प्रयोग करते हैं। घन जीवामृत भी गोबर से तैयार किया जाता है। अरविंद बताते हैं, "घन जीवामृत बनाने के लिए हमें तीन कुंतल गोबर (गाय-भैंस किसी का भी) लेकर इसे ठंडा होने के लिए किसी छांव वाली जगह पर फैला देते हैं। इसके बाद एक बड़े बर्तन में दस लीटर देसी गाय का गौमूत्र, दस किलो गाय का गोबर (जब गोबर भैंस का हो), दो किलोग्राम गुड़, दो किलोग्राम बेसन और थोड़ी सी पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी लेकर घोल तैयार कर लेते हैं।"

घन जीवामृत के आगे कि विधि वो बताते हैं, "तैयार घोल को ठंडे गोबर में छिड़ककर धीरे-धीरे पूरा गोबर आपस में मिला देते हैं। फिर इसे किसी जूट की बोरी से ढक देते हैं, जिससे इसमें फसल को लाभ पहुँचाने वाले जीवाणु उत्पन्न हो जाते हैं। इस तरह इसे दिन में एक बार पलटते रहते हैं। यह प्रक्रिया 5 से 6 दिन करने के बाद हम इसे खेत में डीएपी की जगह पर प्रयोग करते हैं।" इस खाद को फसल बुवाई से पहले (बेसिल) में प्रयोग करना चाहिए।

वर्मी कंपोस्ट ऐसे बनाएं

जैविक खेती में वो जो तीसरा काम करते हैं वो हैं वर्मीकंपोस्ट बनाने का। वर्मी कंपोस्ट तैयार करने के लिए उन्होंने 5 फीट लंबी, 3 फीट चौड़ी और 2 फीट गहरी चरही (टंकी) में गोबर भरकर उसमें करीब 3 किलो केंचुआ डालते हैं।

अरविंद बताते हैं, "वर्मीकंपोस्ट पिट में केंचुए अपने आप बढ़ते रहते हैं। बस उन्हें ढककर रखना चाहिए ताकी ज्यादा गर्मी, बारिश से बच जाएं और पक्षियों से बचे रहें।"

वो आगे बताते हैं, अगर ऐसा लगे की केंचुए बढ़ नहीं रहे हैं तो उसमें दो किलो गुड़ का घोल तैयार कर डाल दिया जाता है, जिससे तेजी से केचुए बढ़ने लगते हैं। जितने ज्यादा केचुआ होंगे उतनी ही तेजी से वह खाद का निर्माण करते हैं। धीरे-धीरे वर्मी कंपोस्ट खाद गोबर से ऊपर आ जाती है, जिसे हम नियमित रूप से निकालते रहते हैं।"

वर्मीकंपोस्ट एक प्रकार से केंचुओं का अपशिष्ट होता है, वो गोबर खाते हैं और दानेदार खाद बाहर निकालते जाते हैं। अधिक प्रयोग होने पर भी जैविक खाद से फसल को कोई नुकसान नहीं होता। जैविक खाद से मिट्टी स्वास्थ्य और उपजाऊ बनती है, जिसकी उर्वरा शक्ति भी लंबे समय तक बनी रहती हैं।


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अरविंद से प्रेरित होकर कई किसानों ने शुरू की जैविक खेती

अरविंद निषाद से प्रेरित होकर रौतापुर सहित आसपास के कई किसान इस समय जैविक खाद का प्रयोग कर खेती कर रहे हैं। उन्होंने इन किसानों के साथ मिलकर अन्नदाता जैविक कृषक समूह बना रखा है, जिसमें फिलहाल 20 सक्रिय किसान हैं। इन किसानों के खेतों के उत्पाद, काला नमक चावल, मूंगफली, मक्के का आटा, बाजरे का आटा और सब्जियों की समूह के बैनर तले मार्केटिंग की जाती है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरविंद निषाद को सुझाव दिया था कि वो अपने उत्पादों को प्लास्टिक के बजाए ऐसे मैटेरियल में पैक करें, जिससे प्रकृति को नुकसान न हो।

जैविक खेती कर रहे राजकुमार निषाद (32वर्ष ) बताते हैं, "जैविक खाद के प्रयोग से हमारी लागत कम हो गई है। पहले हम पशुओं से मिलने वाला गोबर सीधे खेतों में डाल रहे थे, लेकिन अब हम इसे जैविक खाद में परिवर्तित कर अपनी फसलों में डाल रहे हैं, जिससे हमें रासायनिक खादों का प्रयोग नही करना पड़ रहा है। इस तरह खेती में लागत कम हुई है, जिससे मुनाफा भी बढ़ा है।"

अरविंद की प्रेरणा से जैविक खेती कर रहे रंजीत राजपूत ने बताया, "जैविक खाद का हमने धान की फसल में प्रयोग किया था, जिससे मुझे अच्छा अनुभव मिला है। जबकि इसमें हमने रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं किया था। जैविक खादों के प्रयोग से फसलों में रोग लगने की संभावना भी न के बराबर रहती है। गेहूं की फसल में भी हमने जैविक खाद का प्रयोग कर अच्छा उत्पादन प्राप्त किया है।"

अरविंद गाँव कनेक्शन को बताते हैं, "हमारा उद्देश्य अधिक से अधिक किसानों को जैविक खेती के प्रति जागरूक करना है। हमारे गाँव के आसपास के गाँवों के किसानों को भी जैविक खेती के प्रति प्रेरित कर रहा हूं। इस समय हमारे साथ हमारे क्षेत्र में 100 से अधिक किसान पूरी तरह से जैविक खेती कर रहे हैं। भविष्य में हम किसानों के साथ मिलकर जैविक खादों का बड़ी मात्रा में निर्माण कर बेचने की योजना पर भी काम कर रहे हैं। "

उन्नाव जिले के उप कृषि निदेशक नन्द किशोर बताते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा उन्नाव जिले के किसानों की जैविक खेती की तारीफ उन्नाव के लिए लिए गर्व की बात है।"

वो आगे कहते हैं, "जैविक खेती किसानों के लिए बेहद लाभकारी है। किसान गोबर, गौमूत्र और गुड़ जैसी चीजों से जैविक खादों का निर्माण कर सकते हैं। जैविक खाद बनाने मों लागत भी बहुत कम आती है। यह महंगे रासायनिक उर्वरकों की जगह प्रयोग की जाती हैं, जिससे हमारी फसल में लागत कम हो जाती है, साथ ही फसलों में रोग लगने की आशंका भी कम रहती है। उन्नाव जिले के अन्य किसानों को भी जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।"

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