खरीफ तिल की बुवाई का सही समय, असिंचित क्षेत्रों में भी मिलती है अच्छी उपज

तिल की खेती अकेले या सहफसली के रूप अरहर, मक्का एवं ज्वार के साथ की जा सकती है।

खरीफ तिल की बुवाई का सही समय, असिंचित क्षेत्रों में भी मिलती है अच्छी उपज

लखनऊ। ये समय तिल की खेती का सही समय होता है, इस समय किसान खरीफ की तिल की बुवाई कर सकते हैं, इसकी सबसे खास बात होती है, इसमें सिंचाई की जरूरत नहीं होती है।

कृषि विज्ञान केंद्र, अंबेडकरनगर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रवि प्रकाश मौर्य बताते हैं, "तिल की खेती किसानों द्वारा अनुपजाऊ जमीन में की जाती है, हल्की रेतीली, दोमट मिट्टी तिल उत्पादन के लिए सही होती है। इसकी खेती अकेले या सहफसली के रूप अरहर, मक्का एवं ज्वार के साथ की जा सकती है। तिल की बुवाई कतारों में करनी चाहिए,जिससे खेत में खरपतवार और दूसर कामों में आसानी हो सके।"


देश में तिल की खेती महाराष्ट्र, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडू, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व तेलांगाना में होती है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंडमें तिल की खेती बड़ी मात्रा में होती है।

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भूमि की दो-तीन जुताईयां कल्टीवेटर या देशी हल से कर एक पाटा लगाना आवश्यक है, जिससे भूमि बुवाई के लिए तैयार हो जाती है। इसलिए तिल की बुवाई 30-45 सेमी. कतार से कतार और 15 सेमी. पौध से पौध की दूरी व बीज की गहराई 2 सेमी. रखी जाती है। मानसून आने पर जुलाई के द्वितीय पखवारे में तिल की बुवाई अवश्य कर देनी चाहिए।

एक किलोग्राम स्वच्छ व स्वस्थ बीज प्रति बीघा की दर से प्रयोग करें। बीज का आकार छोटा होने के कारण बीज को रेत, राख या सूखी हल्की बलुई मिट्टी मे मिला कर बुवाई करें। तिल की उन्नतशील प्रजातियां टा-78, शेखर, प्रगति, तरूण आदि की फलियां एकल व सन्मुखी तथा आर.टी..351 प्रजाति की फलियां बहुफलीय व सन्मुखी होती है। पकने की अवधि 80-85 दिन व उपज क्षमता 2.0-2.50 कुंतल प्रति बीघा है। थीरम तीन ग्राम व एक ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किग्रा.बीज की दर से उपचारित करके ही बीज को बोना चाहिए। मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरक का प्रयोग करे।

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तिल की बुवाई के समय प्रति बीघा आठ किग्रा. यूरिया, 31 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट व 5 किग्रा. गंधक या 50 किग्रा जिप्सम की आवश्यकता होती है। आठ किग्रा. यूरिया की मात्रा बुवाई के 30 दिन पर देना चाहिए। प्रथम निराई गुड़ाई, बुवाई के 15 से 20 दिन बाद, दूसरी निराई 30-35 दिन बाद कर सकते हैं। निराई गुड़ई करते समय विरलीकरण कर पौधो की आपसी दूरी 10-15 सेमी कर ले। रोग कीट का भी ध्यान रखना चाहिये।

जीवाणु अंगमारी रोग मे पत्तियों पर जल कण जेसे छोटे बिखरे हुए धब्बे धीरे-धीरे बढ़कर भूरे हो जाते हैं यह बीमारी चार से छह पत्तियों की अवस्था में देखने को मिलती हैं। बीमारी नजर आते ही स्ट्रेप्टोसाक्लिन 4 ग्राम को 150 लीटर पानी मे घोल कर पत्तियों पर छिडकाव करें। इस प्रकार 15 दिन के अन्तर पर दो बार छिड़काव करें।

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तना और जड़ सड़न रोग का प्रकोप होने पर पौधे सूखने लगते हैं और तना उपर से नीचे की ओर सड़ने लगता है, इस रोग की रोकथाम के लिए बीजोपचार जरूरी है। चूर्णी फफूंद रोग जब फसल 45 से 50 दिन की हो जाती है तो पत्तियों पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं, इससे पतियां गिरने लगती हैं इस रोग के नियंत्रण के लिए पत्तियों पर घुलनशील सल्फर 1/2किग्रा. को 150 लीटर पानी मे घोल कर छिड़काव फूल आने और फली बनने के समय करें। तिल का पत्ती मोड़क और फली छेदक कीट, प्रारम्भिक अवस्था में कोमल पत्तियों को खाता है औश्र बाद में फूल, फली व दाने को खाता है। इसके नियंत्रण के लिए फुल आने की अवस्था में 15 दिन के अन्तराल से मोनोक्रोटोफ़ॉस 36 एसएल. 185 मिली. प्रति 185 लीटर पानी में घोलकर प्रति बीघा की दर से तीन बार छिड़काव करें।

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