खेती में AI का बढ़ता इस्तेमाल, लेकिन किसान की कमाई कितनी बढ़ेगी? जानिए क्यों ज़रूरी है किसान-केंद्रित तकनीक
Mansi | Sept 04, 2026, 19:10 IST
कृषि में एआई तकनीक ने किसानों को सही फैसले लेने में सहारा दिया है। यह तकनीक मौसम, भूमि और कीटों की जानकारी प्रदान करते हुए उत्पादकता को बढ़ा सकती है। भारत सरकार 'भारत-विस्तार' जैसे प्रोजेक्ट्स के माध्यम से किसानों को डिजिटल प्लेटफार्मों की सहायता कर रही है। हालाँकि, यह सवाल उठता है कि किसानों के डेटा का संरक्षण और आर्थिक लाभ किसे मिलेगा।
कृषि में AI के बढ़ते इस्तेमाल से किसानों को मौसम, फ़सल और बाज़ार से जुड़ी सलाह समय पर मिलने की उम्मीद बढ़ी
खेती में किसान का हर फ़ैसला किसी न किसी जोखिम से जुड़ा होता है। बारिश कब होगी, बुवाई का सही समय क्या है, खेत में कितना पानी देना है, कौन-सी खाद कितनी मात्रा में डालनी है, फसल में कीड़ा लगने पर क्या करना है और उपज को कब बेचने पर बेहतर दाम मिल सकता है। इन सवालों के जवाब समय पर मिल जाएँ तो खेती का ख़र्च और जोखिम दोनों कम किए जा सकते हैं। अब इन फ़ैसलों में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की भूमिका बढ़ रही है। मौसम, मिट्टी, फसल, कीट, मंडी और उपग्रह से मिलने वाले डेटा को एक साथ समझकर किसानों तक स्थानीय सलाह पहुँचाने की कोशिश हो रही है।
लेकिन खेती में एआई आने की कहानी सिर्फ़ इतनी नहीं है कि तकनीक से उत्पादन बढ़ जाएगा और किसान की कमाई भी बढ़ जाएगी। अगर एआई की मदद से किसी फसल का उत्पादन बढ़ता है, तो किसान की आमदनी पर उसका असर बाज़ार भाव, खेती की लागत, तकनीक की कीमत और किसान की सौदेबाज़ी की ताक़त पर भी निर्भर करेगा। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि एआई से खेती की उत्पादकता बढ़ने पर उसका आर्थिक फ़ायदा किसे मिलेगा। किसान को, तकनीक बनाने वाली कंपनी को या कृषि इनपुट और बाज़ार से जुड़े दूसरे कारोबारों को? भारत में कृषि एआई की दिशा तय करते समय यही सवाल सबसे अहम होने वाला है।
एआई बड़ी मात्रा में डेटा को तेज़ी से पढ़कर उससे उपयोगी जानकारी निकाल सकता है। खेती में इसका इस्तेमाल मौसम के अनुमान, फसल की निगरानी, कीट और रोग की पहचान, मिट्टी की जानकारी, सिंचाई और खाद प्रबंधन तथा मंडी से जुड़ी जानकारी देने में किया जा सकता है। भारत सरकार भी कृषि में एआई के इस्तेमाल को बढ़ाने पर काम कर रही है। फरवरी 2026 में ‘भारत-विस्तार’ (Bharat-VISTAAR) का पहला चरण शुरू किया गया। सरकार के मुताबिक़ यह किसान-केंद्रित, एआई आधारित डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा है, जो कृषि से जुड़ी सरकारी और वैज्ञानिक जानकारी को एक जगह लाने की कोशिश करता है। इसमें मौसम, मंडी भाव, कीट एवं रोग, मिट्टी की सेहत, फसल प्रबंधन और सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी शामिल है। भारत-विस्तार को इस तरह तैयार किया गया है कि किसान मोबाइल या सामान्य फ़ोन से भी जानकारी ले सकें। इसके लिए 155261 नंबर उपलब्ध कराया गया है। शुरुआत हिंदी और अंग्रेज़ी में हुई और आगे दूसरी भारतीय भाषाओं में सुविधा बढ़ाने की बात कही गई है।
एआई का असली फ़ायदा तब होगा जब उससे मिलने वाली जानकारी किसान के काम आ सके। उदाहरण के लिए, अगर किसी किसान को उसके क्षेत्र में बारिश का स्थानीय पूर्वानुमान मिल जाता है, तो वह सिंचाई का फ़ैसला बदल सकता है। किसी फसल में कीट का ख़तरा समय रहते पता चल जाए तो वह शुरुआती स्तर पर नियंत्रण की कोशिश कर सकता है। इसी तरह मंडी से जुड़ी जानकारी किसान को बिक्री की बेहतर योजना बनाने में मदद कर सकती है।
भारत में नेशनल पेस्ट सर्विलांस (NPSS) भी एआईऔर मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करके कीटों की पहचान और निगरानी में मदद कर रहा है। कृषि मंत्रालय के अगस्त 2026 के आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़, जुलाई 2026 तक NPSS के ज़रिए 73 फसलों और 436 कीटों को कवर किया जा रहा था और 10,000 से अधिक कृषि विस्तार कार्यकर्ता इसका इस्तेमाल कर रहे थे।
एआई की ताक़त उसके डेटा पर निर्भर करती है। खेत का आकार, कौन-सी फसल बोई गई है, मिट्टी की स्थिति, मौसम, उत्पादन, मंडी भाव और खेती से जुड़े दूसरे आँकड़े AI को बेहतर सलाह देने में मदद कर सकते हैं। लेकिन इसके साथ सवाल उठता है कि इस डेटा को कौन नियंत्रित करेगा और इससे बनने वाली आर्थिक वैल्यू का फ़ायदा किसे मिलेगा। भारत में डिजिटल कृषि का आधार तेजी से बढ़ रहा है। कृषि मंत्रालय की अगस्त 2026 की जानकारी के मुताबिक़ 6 अगस्त 2026 तक 10.33 करोड़ से अधिक फ़ार्मर आईडी बनाए जा चुके थे। वहीं खरीफ़ 2025 में डिजिटल क्रॉप सर्वे के तहत 604 ज़िलों में 28.5 करोड़ से अधिक खेतों/प्लॉटों का सर्वे किया गया था। इसमें फ़ोटो और जियो-टैग के ज़रिए खेतों में उगाई जा रही फसलों की जानकारी दर्ज की गई। इतने बड़े डेटा आधार के साथ किसानों के डेटा की सुरक्षा, पारदर्शिता और इस्तेमाल से जुड़े अधिकार भी अहम हो जाते हैं। किसान को पता होना चाहिए कि उसकी जानकारी कहाँ और किस उद्देश्य से इस्तेमाल की जा रही है।
छोटे किसानों के लिए एआई को सस्ता और उपयोगी बनाने में किसान उत्पादक संगठन यानी FPO, सहकारी समितियाँ और दूसरे किसान संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। किसान अकेले महँगी तकनीक अपनाने के बजाय सामूहिक रूप से सेवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं। इन संगठनों के ज़रिए किसान मौसम और फसल संबंधी जानकारी लेने के साथ-साथ बाज़ार की स्थिति समझने और सामूहिक बिक्री में भी बेहतर सौदेबाज़ी कर सकते हैं। इससे AI का फ़ायदा केवल खेत में उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी कृषि मूल्य श्रृंखला में किसान की स्थिति मज़बूत हो सकती है।
कृषि एआई की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने किसानों ने कोई ऐप डाउनलोड किया या कितने सवाल एआई से पूछे। असली सवाल यह है कि इसके बाद किसान की खेती की लागत कितनी कम हुई, फसल का नुकसान कितना घटा, उत्पादन में कितना सुधार हुआ और उसे अपनी उपज का कितना बेहतर दाम मिला। भारत-विस्तार के इस्तेमाल के आँकड़े बताते हैं कि किसान AI आधारित सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। जुलाई 2026 तक इस प्लेटफ़ॉर्म ने 3 लाख से अधिक किसानों को सेवाएँ दी थीं और 72 लाख से अधिक किसान सवालों का जवाब दिया था।
अगर एआई को सही तरीके से इस्तेमाल किया गया तो भारतीय खेती में बड़ा बदलाव आ सकता है। किसान को सामान्य सलाह की जगह उसके खेत, मौसम और फसल के हिसाब से जानकारी मिल सकती है। कीट और रोग की शुरुआती पहचान हो सकती है, सिंचाई और खाद का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है और बाज़ार की जानकारी के आधार पर बिक्री की योजना बनाई जा सकती है।
लेकिन इसके लिए एआई के साथ इंसानी मदद भी ज़रूरी रहेगी। कृषि विशेषज्ञ और कृषि विस्तार कार्यकर्ता एआई से मिली जानकारी को स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। क्योंकि खेती सिर्फ़ डेटा से नहीं चलती। किसान के पास कितनी ज़मीन है, पानी कितना है, पूँजी कितनी है और वह कितना जोखिम उठा सकता है, ये बातें भी उसके फ़ैसले तय करती हैं। इसलिए भारत को ऐसा कृषि एआई मॉडल चाहिए जिसमें तकनीक किसान की जगह लेने के बजाय किसान की क्षमता बढ़ाए। एआई का इस्तेमाल खुली और भरोसेमंद डिजिटल व्यवस्था के ज़रिए हो, किसान के डेटा पर उसके अधिकार सुनिश्चित हों और FPO व सहकारी संस्थाएँ इसमें सक्रिय भागीदार बनें।
लेकिन खेती में एआई आने की कहानी सिर्फ़ इतनी नहीं है कि तकनीक से उत्पादन बढ़ जाएगा और किसान की कमाई भी बढ़ जाएगी। अगर एआई की मदद से किसी फसल का उत्पादन बढ़ता है, तो किसान की आमदनी पर उसका असर बाज़ार भाव, खेती की लागत, तकनीक की कीमत और किसान की सौदेबाज़ी की ताक़त पर भी निर्भर करेगा। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि एआई से खेती की उत्पादकता बढ़ने पर उसका आर्थिक फ़ायदा किसे मिलेगा। किसान को, तकनीक बनाने वाली कंपनी को या कृषि इनपुट और बाज़ार से जुड़े दूसरे कारोबारों को? भारत में कृषि एआई की दिशा तय करते समय यही सवाल सबसे अहम होने वाला है।
एआई खेती में क्या बदल सकता है?
किसान को सिर्फ़ डेटा नहीं, सही समय पर सही सलाह चाहिए
भारत में नेशनल पेस्ट सर्विलांस (NPSS) भी एआईऔर मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करके कीटों की पहचान और निगरानी में मदद कर रहा है। कृषि मंत्रालय के अगस्त 2026 के आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़, जुलाई 2026 तक NPSS के ज़रिए 73 फसलों और 436 कीटों को कवर किया जा रहा था और 10,000 से अधिक कृषि विस्तार कार्यकर्ता इसका इस्तेमाल कर रहे थे।
किसान का डेटा भी उतना ही महत्वपूर्ण है
FPO और सहकारी समितियाँ बन सकती हैं मददगार
कृषि एआई की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने किसानों ने कोई ऐप डाउनलोड किया या कितने सवाल एआई से पूछे। असली सवाल यह है कि इसके बाद किसान की खेती की लागत कितनी कम हुई, फसल का नुकसान कितना घटा, उत्पादन में कितना सुधार हुआ और उसे अपनी उपज का कितना बेहतर दाम मिला। भारत-विस्तार के इस्तेमाल के आँकड़े बताते हैं कि किसान AI आधारित सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। जुलाई 2026 तक इस प्लेटफ़ॉर्म ने 3 लाख से अधिक किसानों को सेवाएँ दी थीं और 72 लाख से अधिक किसान सवालों का जवाब दिया था।
2047 तक कैसी हो सकती है एआई वाली खेती?
लेकिन इसके लिए एआई के साथ इंसानी मदद भी ज़रूरी रहेगी। कृषि विशेषज्ञ और कृषि विस्तार कार्यकर्ता एआई से मिली जानकारी को स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। क्योंकि खेती सिर्फ़ डेटा से नहीं चलती। किसान के पास कितनी ज़मीन है, पानी कितना है, पूँजी कितनी है और वह कितना जोखिम उठा सकता है, ये बातें भी उसके फ़ैसले तय करती हैं। इसलिए भारत को ऐसा कृषि एआई मॉडल चाहिए जिसमें तकनीक किसान की जगह लेने के बजाय किसान की क्षमता बढ़ाए। एआई का इस्तेमाल खुली और भरोसेमंद डिजिटल व्यवस्था के ज़रिए हो, किसान के डेटा पर उसके अधिकार सुनिश्चित हों और FPO व सहकारी संस्थाएँ इसमें सक्रिय भागीदार बनें।