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51 हजार हेक्टेयर, 5 हजार टन तेल: कैसे अरोमा मिशन ने बदली किसानों की किस्मत

Divendra Singh | Dec 30, 2025, 15:08 IST
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अरोमा मिशन ने भारत में एरोमेटिक फसलों की खेती को एक संगठित उद्योग में बदला है। उन्नत किस्मों, डिस्टिलेशन यूनिट्स और इंडस्ट्री कनेक्ट के ज़रिए यह मिशन किसानों की आय, रोजगार और आत्मनिर्भरता को नई दिशा दे रहा है। यह कहानी है विज्ञान, किसान और बाजार के सफल सहयोग की।
यह कहानी है विज्ञान, किसान और बाजार के सफल सहयोग की।
साल 2017 में जब भारत के खेतों में अरोमेटिक पौधों की बात उठी थी, तब बहुत से किसानों के लिए यह एक अनजानी, जोखिम भरी और “शहरों की चीज़” जैसी लगती थी। पर आज, वही अरोमेटिक खेती भारत के ग्रामीण परिदृश्य में आत्मनिर्भरता, रोज़गार और वैश्विक पहचान की खुशबू बिखेर रही है। इस बदलाव की जड़ में है CSIR Aroma Mission, जिसने विज्ञान को खेत तक और किसान को उद्योग से जोड़ा।

राष्ट्रपति के हाथों सम्मान मिलना केवल एक औपचारिक उपलब्धि नहीं है। यह उस लंबी यात्रा की सार्वजनिक स्वीकृति है, जिसमें वैज्ञानिकों, किसानों, उद्यमियों और नीति-निर्माताओं ने मिलकर भारत की खुशबूदार अर्थव्यवस्था की नींव रखी। सीएसआईआर- केंद्रीय औषध एवं सगंध अनुसंधान संस्थान (CIMAP) के निदेशक डॉ सुबोध त्रिवेदी गाँव कनेक्शन से अरोमा मिशन की उपलब्धियों के बारे में बता रहे हैं।

जब राष्ट्रपति भवन में वैज्ञानिकों की एक टीम को सम्मानित किया गया, तो वह सिर्फ़ एक पुरस्कार नहीं था। यह उस यात्रा की सार्वजनिक स्वीकृति थी, जो भारत के खेतों से शुरू होकर वैश्विक खुशबू उद्योग तक पहुँची है।
जब राष्ट्रपति भवन में वैज्ञानिकों की एक टीम को सम्मानित किया गया, तो वह सिर्फ़ एक पुरस्कार नहीं था। यह उस यात्रा की सार्वजनिक स्वीकृति थी, जो भारत के खेतों से शुरू होकर वैश्विक खुशबू उद्योग तक पहुँची है।

2017 से शुरू हुई यात्रा: विज्ञान से खेत तक

अरोमा मिशन का मूल उद्देश्य बहुत स्पष्ट था- भारत में विकसित इम्प्रूव्ड वैरायटीज़, एग्रो-टेक्नोलॉजी, ऑयल एक्सट्रैक्शन, वैल्यू एडिशन, उद्यमिता विकास और इंडस्ट्री-फार्मर कनेक्ट को एक साथ जोड़ना।

पहले चरण में मिशन ने लगभग 6,000 हेक्टेयर अंडर-यूटिलाइज़्ड भूमि को कवर किया। यह वह ज़मीन थी जहाँ परंपरागत फसलों से किसान को या तो बहुत कम लाभ मिलता था या खेती ही नहीं होती थी। नए पौधों के साथ सबसे बड़ी चुनौती थी- विश्वास। किसान पूछते थे:

“फसल लग गई तो तेल कहाँ जाएगा?”

“डिस्टिलेशन कैसे होगा?”

“बाज़ार कौन देगा?”

यहीं अरोमा मिशन ने खुद को सिर्फ़ ‘बीज बाँटने वाली योजना’ नहीं, बल्कि एंड-टू-एंड समाधान के रूप में स्थापित किया।

गुजरात के कच्छ ज़िले के रुषभ चारला भी उन्हीं किसानों में से एक हैं; आज कच्छ की बंजर ज़मीन पर पामारोज़ा और लेमन ग्रास जैसी सगंध फ़सलें उगा रहे हैं।
गुजरात के कच्छ ज़िले के रुषभ चारला भी उन्हीं किसानों में से एक हैं; आज कच्छ की बंजर ज़मीन पर पामारोज़ा और लेमन ग्रास जैसी सगंध फ़सलें उगा रहे हैं।


तीसरे चरण तक पहुँचा भारत: 51,000 हेक्टेयर की खुशबू

आज, जब अरोमा मिशन का तीसरा चरण लगभग पूरा हो चुका है, तो तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। देशभर में 51,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में अरोमेटिक क्रॉप्स उगाई जा रही हैं। लगभग 400 डिस्टिलेशन यूनिट्स क्लस्टर मॉडल के तहत स्थापित की गई हैं और 4,500 से अधिक किसान क्लस्टर्स सीधे उद्योग से जुड़े हैं।

यह केवल खेती नहीं, बल्कि ग्रामीण औद्योगिकीकरण का मॉडल है। इससे करीब एक करोड़ मैन-डे का सृजन हुआ और लगभग 15 लाख लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोज़गार मिला।

भारत का किसान परंपरागत खेती से जुड़ा है। नई फसल, नई तकनीक, यह सब उसके लिए जोखिम जैसा लगता है। यही सबसे बड़ी चुनौती थी।
भारत का किसान परंपरागत खेती से जुड़ा है। नई फसल, नई तकनीक, यह सब उसके लिए जोखिम जैसा लगता है। यही सबसे बड़ी चुनौती थी।


सबसे अहम बात - किसानों ने करीब 5,000 टन एसेंशियल ऑयल का उत्पादन किया, जिसकी बाज़ार कीमत लगभग ₹660 करोड़ रही। यह तेल सीधे भारतीय उद्योगों तक पहुँचा, जिससे आयात पर निर्भरता घटी।

किसान की हिचक, वैज्ञानिक की ज़िम्मेदारी

नई फसल अपनाने में किसान का संकोच स्वाभाविक है। दशकों से परंपरागत खेती करने वाला किसान तभी जोखिम उठाता है, जब उसे भरोसा हो कि फसल के बाद भी कोई उसे अकेला नहीं छोड़ेगा। अरोमा मिशन ने यही भरोसा दिया।

डिस्टिलेशन यूनिट, इंडस्ट्री लिंक, प्रोसेसिंग, ट्रेनिंग- हर कड़ी को जोड़ा गया। इसी कारण कच्छ, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य भारत और पूर्वोत्तर तक किसान इस मिशन से जुड़ते गए।

क्या भारत बन सकता है ग्लोबल अरोमा हब?

आज भारत की स्थिति यह है कि एक समय जिस लेमनग्रास ऑयल को आयात करना पड़ता था, अब भारत दुनिया के बड़े निर्यातकों में शामिल है। मेंथॉल मिंट में भारत आज दुनिया के 80% से अधिक उत्पादन के साथ ग्लोबल लीडर है। वेटिवर और पामारोज़ा में भी भारत आत्मनिर्भरता की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है।

अरोमा मिशन का लक्ष्य केवल उत्पादन नहीं, बल्कि Import Substitution → Export Leadership है।

भविष्य की तैयारी: जलवायु, जीरो-वेस्ट और नई तकनीक

आने वाले वर्षों में मिशन का फोकस और गहरा होने जा रहा है। ऐसी अरोमेटिक फसलें विकसित की जा रही हैं जो 25–30 साल बाद के उच्च तापमान और अधिक CO₂ में भी टिकाऊ रहें। डिस्टिलेशन के बाद बचने वाली डी-ऑयल्ड हर्ब को कचरा नहीं, बल्कि संसाधन माना जा रहा है- वर्मीकम्पोस्ट, मशरूम कल्टीवेशन और हाई-वैल्यू मॉलिक्यूल्स के लिए। लक्ष्य है- हर राज्य में कम से कम एक सस्टेनेबल अरोमा क्लस्टर, जहाँ Zero Waste, Low Carbon Emission और High Farmer Income एक साथ संभव हो।

मिलावट पर रोक और ज्ञान की नई इमारत

एसेंशियल ऑयल इंडस्ट्री में मिलावट एक बड़ी समस्या रही है। इससे निपटने के लिए हैंडहेल्ड डिवाइसेज़ और Certified Reference Materials (CRMs) विकसित किए जा रहे हैं, ताकि किसान और उद्योग दोनों गुणवत्ता को तुरंत जांच सकें। 2026 तक देश को कम से कम 25 स्वदेशी CRMs देने का लक्ष्य है, जिससे फार्मा और अरोमा इंडस्ट्री को आयात पर निर्भर न रहना पड़े।

अरोमा मिशन: खेती से कहीं आगे की कहानी

अरोमा मिशन की असली ताक़त आंकड़ों में नहीं, बल्कि उस बदलाव में है जो गाँवों में दिख रहा है- जहाँ कभी खाली ज़मीन थी, वहाँ खुशबूदार फसलें हैं। जहाँ केवल कच्चा माल जाता था, वहाँ अब वैल्यू-एडिशन हो रहा है। जहाँ किसान सिर्फ़ उत्पादक था, वहाँ अब वह उद्यमी बन रहा है। यह मिशन दिखाता है कि अगर विज्ञान, नीति और किसान एक साथ चलें, तो भारत न सिर्फ़ आत्मनिर्भर बन सकता है, बल्कि दुनिया को अपनी खुशबू से पहचान भी दिला सकता है।




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