हर्बल खेती बनेगी कमाई का ज़रिया! सीखें स्टीविया, तुलसी और जरेनियम की खेती; यहाँ मिल रही मुफ्त ट्रेनिंग
Umang | May 29, 2026, 17:00 IST
कोरोना महामारी के बाद औषधीय पौधों और हर्बल उत्पादों की मांग बढ़ी है, जिससे किसानों के लिए नई संभावनाएं खुल रही हैं। तुलसी, स्टीविया, जरेनियम, हल्दी और बड़ी इलायची जैसी फसलें किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।
जानिए कौन-सा औषधीय पौधा किस काम आता है
कोरोना महामारी के बाद लोगों का रुझान आयुर्वेद और औषधीय पौधों की ओर तेजी से बढ़ा है। ऐसे में उत्तर प्रदेश का राज्य कृषि प्रबंध संस्थान औषधीय खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रयास कर रहा है। संस्थान परिसर में विकसित हर्बल गार्डन में 80 से अधिक औषधीय पौधों का संरक्षण, परीक्षण और प्रदर्शन किया जा रहा है, ताकि किसानों को नई फसलों और उनकी बाजार संभावनाओं से जोड़ा जा सके। राज्य कृषि प्रबंध संस्थान के निदेशक राजेंद्र कुमार सिंह बताते हैं कि संस्थान उत्तर प्रदेश में मेडिसिनल प्लांट्स के लिए नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है। यहां भारत सरकार, विश्वविद्यालयों और विभिन्न संस्थाओं से जुड़े प्रोजेक्ट्स का परीक्षण किया जाता है। साथ ही यह भी देखा जाता है कि कौन-से औषधीय पौधे प्रदेश की जलवायु और मिट्टी में सफलतापूर्वक उगाए जा सकते हैं।
हर्बल गार्डन में श्यामा तुलसी, कपूर तुलसी, नींबू तुलसी, स्टीविया, बड़ी इलायची, हल्दी और जरेनियम समेत 80 से अधिक औषधीय पौधे लगाए गए हैं। यहां आने वाले किसानों और छात्रों को इन पौधों की पहचान, उपयोग और खेती की तकनीक के बारे में जानकारी दी जाती है। राजेंद्र कुमार सिंह के अनुसार श्यामा तुलसी और कपूर तुलसी का उपयोग सर्दी, खांसी और बुखार जैसी समस्याओं में किया जाता है। नींबू तुलसी अपनी सुगंध और औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है। वहीं स्टीविया प्राकृतिक मिठास का स्रोत है और इसे डायबिटीज मरीजों के लिए चीनी के विकल्प के रूप में देखा जाता है।
संस्थान ने हाल ही में जरेनियम की खेती का परीक्षण शुरू किया है। यह पौधा पहले उत्तर प्रदेश में ज्यादा प्रचलित नहीं था, लेकिन शुरुआती नतीजे उत्साहजनक हैं। जरेनियम से निकलने वाले तेल का उपयोग परफ्यूम, कॉस्मेटिक और अरोमा उद्योग में होता है, जिससे किसानों के लिए आय के नए अवसर बन सकते हैं। राजेंद्र कुमार सिंह का कहना है कि संस्थान लगातार ऐसी नई फसलों की तलाश करता है जिनकी बाजार में मांग हो और जिनसे किसानों को बेहतर आमदनी मिल सके।
संस्थान में किसानों के लिए एक सप्ताह का आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान रहने और भोजन की व्यवस्था निशुल्क होती है। इसमें किसानों को औषधीय पौधों की खेती, पौध तैयार करने, बाजार और प्रसंस्करण से जुड़ी जानकारी दी जाती है। कृषि और बागवानी के छात्र भी यहां शोध और अध्ययन के लिए आते हैं। संस्थान किसानों को यह भी बताता है कि गुणवत्तायुक्त पौधे और बीज कहां से प्राप्त किए जा सकते हैं।
राजेंद्र कुमार सिंह का मानना है कि आने वाले समय में औषधीय पौधों की भूमिका और बढ़ेगी। उनका कहना है कि लोगों का झुकाव प्राकृतिक उपचार की ओर बढ़ रहा है और औषधीय पौधों का बाजार भी लगातार विस्तार कर रहा है। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में भी भारत की कृषि नहीं रुकी और उसी दौरान लोगों में स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ी। इसका असर औषधीय पौधों की मांग पर भी देखने को मिला है। ऐसे में औषधीय खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आय का एक मजबूत विकल्प बन सकती है।
निदेशक के अनुसार केंद्र और राज्य सरकार दोनों औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने पर जोर दे रही हैं। संस्थान का उद्देश्य किसानों को केवल पौधों की जानकारी देना नहीं, बल्कि उन्हें बाजार, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता से जोड़ना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान पारंपरिक खेती के साथ औषधीय पौधों को भी अपनाते हैं तो उनकी आय बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में नए रोजगार अवसर भी पैदा हो सकते हैं।