हाइड्रोजेल के इस्तेमाल से कम पानी में भी होगी बेहतर खेती, लागत में आएगी कमी

Divendra Singh | 7ec 07, 2018, 09:57 IST
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हाइड्रोजेल के इस्तेमाल से कम पानी में भी होगी बेहतर खेती
लखनऊ। देश में पिछले कुछ वर्षों में जल संकट तेजी से बढ़ रहा है, इससे खेती किसानी पर बड़ा प्रभाव पड़ रहा है। अगर आने वाले वर्षों में भी ऐसा ही रहा तो खेती करना मुश्किल हो जाएगा, ऐसें आईसीएआर द्वारा विकसित हाइड्रोजेल किसानों के लिए संजीवनी का काम कर सकता है।

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कृषि विज्ञान केंद्र, सीतापुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दया श्रीवास्तव हाइड्रोजेल के बारे में बताते हैं, "जहां पानी की कमी है, या सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं, जिसके कारण किसान की लागत बढ़ जाती है। ऐसे में उन किसानों के लिए हाइड्रोजल मददगार बन सकता है।"

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा के वैज्ञानिकों ने हाइड्रोजेल विकसित किया है, जिसकी मदद से बारिश के पानी को स्टोर कर रखा जा सकता है और इसका इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलों को पानी की जरूरत पड़ेगी।
भारत में जितनी खेती होती है, उनमें से 60 प्रतिशत खेती ऐसे क्षेत्र में की जाती है जहां पानी की बेहद किल्लत है। इनमें से 30 प्रतिशत जगहों पर पर्याप्त बारिश नहीं होती है। भारत में खेती मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर है। देश में 60 प्रतिशत खेती बारिश के पानी पर निर्भर है और इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 1150 मिलीमीटर से भी कम होती है।

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वो आगे बताते हैं, "ये हाइड्रोजेल ऐसा पदार्थ होता है जो पानी से मिलने के बाद ज्यादा से ज्यादा पानी सोख लेता है, और ये हमारी मिट्टी में मौजूद रहते हैं। जो जड़ के पास बने रहते हैं, जैसे कि पौधों की जड़ों को सबसे अधिक पानी की जरूरत होती है, ऐसे में ये हाइड्रोजल जड़ों के पास मौजूद रहते हैं और धीरे-धीरे आराम से जड़ों को पानी देते हैं रहते हैं, इस तरह आप इसका प्रयोग कर कम से कम तीन-चार सिंचाई आप बचा सकते हैं।"

हाइड्रोजेल खेत से उर्वरा शक्ति पर भी कोई असर नहीं पड़ता है, ये अपनी क्षमता से कई गुना अधिक पानी सोख लेता है, एक एकड़ खेत में एक-दो किलो हाइड्रोजल की जरूरत होती है। हाइड्रोजेल 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खराब नहीं होता है, इसलिये इसका इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहां सूखा पड़ता है।

हाइड्रोजेल के कण बारिश होने पर या सिंचाई के वक्त खेत में जाने वाले पानी को सोख लेता है और जब बारिश नहीं होती है तो कण से खुद-ब-खुद पानी रिसता है, जिससे फसलों को पानी मिल जाता है। फिर अगर बारिश हो तो हाइड्रोजेल दुबारा पानी को सोख लेता है और जरूरत के अनुसार फिर उसमें से पानी का रिसाव होने लगता है।
हाइड्रोजेल का इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलें बोई जाती हैं। फसलों के साथ ही इसके कण भी खेतों में डाले जा सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने मक्का, गेहूं, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज, टमाटर, फूलगोभी, गाजर, धान, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में हाइड्रोजेल का इस्तेमाल कर पाया गया कि इससे उत्पादकता तो बढ़ती है, लेकिन पर्यावरण और फसलों को किसी तरह का नुकसान नहीं होता है।

यहां से मंगा सकते हैं हाइड्रोजेल

अगर कोई किसान इसे खरीदना चाहे तो अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र पर संपर्क कर सकता है। नहीं तो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा में भी संपर्क करके मंगा सकते हैं।

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