जलवायु संकट से निपटने की तैयारी: भारत ने 11 साल में विकसित कीं करीब 3,000 जलवायु-अनुकूल फसलों की किस्में
Gaon Connection | May 11, 2026, 11:12 IST
भारत में जलवायु परिवर्तन के संकट को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने खेती को सुरक्षित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 2014 से लेकर 2025 तक, 2,996 जलवायु-प्रतिरोधी फसल किस्में विकसित की गई हैं, जो सूखा, बाढ़ और गर्मी जैसी चुनौतियों का सामना कर सकती हैं।
खेती को जलवायु संकट से बचाने के लिए भारत ने तैयार कीं नई फसल किस्में
देश में बढ़ते तापमान, सूखा, बाढ़ और अनियमित बारिश जैसी जलवायु चुनौतियों के बीच भारत सरकार ने खेती को सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सरकार के अनुसार वर्ष 2014 से 2025 के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के नेतृत्व में देशभर में 2,996 जलवायु-अनुकूल यानी क्लाइमेट-रेजिलिएंट फसल किस्में विकसित और जारी की गई हैं। इन किस्मों को इस तरह तैयार किया गया है कि वे सूखा, बाढ़, गर्मी और दूसरे चरम मौसमीय हालात को बेहतर तरीके से झेल सकें। राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) पर जारी सरकारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि बदलते मौसम के जोखिम को कम करने और कृषि को टिकाऊ बनाने के लिए कई आधुनिक कृषि तकनीकों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इनमें डायरेक्ट-सीडेड राइस (सीधी बुवाई वाला धान), जीरो-टिल गेहूं, तनाव-सहनशील फसलें और फसल अवशेष प्रबंधन जैसी तकनीकें शामिल हैं।
2011 में शुरू हुआ
सरकार के अनुसार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने वर्ष 2011 में “नेशनल इनोवेशंस ऑन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर” (NICRA) कार्यक्रम शुरू किया था। इसका उद्देश्य ऐसी कृषि तकनीकें विकसित करना और किसानों तक पहुंचाना है, जो जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में मदद करें। विज्ञप्ति में कहा गया है कि NICRA कार्यक्रम ने किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल खेती और जोखिम कम करने के उपायों की ट्रेनिंग देने में अहम भूमिका निभाई है। इसके तहत अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार उपयुक्त तकनीकों का प्रदर्शन और प्रशिक्षण भी कराया गया।
सरकार के मुताबिक NICRA के तहत इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के मानकों के अनुसार देश के 651 कृषि जिलों का जलवायु संवेदनशीलता आकलन किया गया। इनमें से 310 जिलों को अत्यधिक या बहुत अधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि किन इलाकों में जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है और वहां किसानों को किस तरह की तकनीकों और सहायता की जरूरत होगी।
सरकार ने बताया कि जलवायु परिवर्तन से ज्यादा प्रभावित जिलों में किसानों को नई तकनीकों से जोड़ने के लिए “क्लाइमेट रेजिलिएंट विलेज” भी विकसित किए गए हैं। अब तक 28 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 151 संवेदनशील जिलों के 448 गांवों में ऐसे मॉडल गांव स्थापित किए जा चुके हैं। इन गांवों में जल संरक्षण, बेहतर बीज, मौसम आधारित खेती, मिट्टी स्वास्थ्य प्रबंधन और टिकाऊ कृषि प्रणालियों का प्रदर्शन किया जा रहा है, ताकि दूसरे किसान भी इन तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हों।
राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के तहत सरकार पानी के बेहतर इस्तेमाल, मिट्टी की सेहत सुधारने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन भारतीय खेती के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। ऐसे में जलवायु-अनुकूल फसल किस्में और नई कृषि तकनीकें किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए महत्वपूर्ण होंगी।