कमजोर मानसून के बीच खरीफ़ बुआई सुस्त, पिछले साल से 101 लाख हेक्टेयर घटा रकबा, इन फसलों में आई सबसे बड़ी गिरावट

Umang | Jul 14, 2026, 14:39 IST
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10 जुलाई 2026 तक देश में खरीफ़ फसलों की कुल बुआई 531.25 लाख हेक्टेयर रही, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से 101.44 लाख हेक्टेयर कम है। धान, दालें, तिलहन, श्रीअन्न और कपास की बुआई में गिरावट दर्ज की गई, जबकि गन्ना और जूट-मेस्ता का रकबा बढ़ा है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, आगे की बारिश खरीफ़ बुआई की रफ़्तार और उत्पादन की दिशा तय करेगी।

खरीफ़ के ताज़ा आँकड़ों ने बढ़ाई चिंता
खरीफ़ के ताज़ा आँकड़ों ने बढ़ाई चिंता
देश में इस बार खरीफ़ सीज़न की शुरुआत उम्मीद के मुताबिक नहीं रही है। कई राज्यों में मानसून की धीमी रफ़्तार और बीच-बीच में लंबे शुष्क दौर ने बुआई की गति को प्रभावित किया है। वहीं, आने वाले महीनों में अल नीनो के प्रभाव की आशंका ने भी कृषि क्षेत्र की चिंताएँ बढ़ा दी हैं। ऐसे हालात में किसान बारिश की निरंतरता का इंतज़ार कर रहे हैं, क्योंकि खरीफ़ की अधिकांश फसलें समय पर और पर्याप्त वर्षा पर निर्भर करती हैं।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा 10 जुलाई 2026 तक जारी आँकड़ों के अनुसार, देश में खरीफ़ फसलों की कुल बुआई 531.25 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि तक यह आँकड़ा 632.69 लाख हेक्टेयर था। यानी एक साल में बुआई क्षेत्र में 101.44 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है। सामान्य बुआई क्षेत्र 549.36 लाख हेक्टेयर की तुलना में भी इस बार 18.11 लाख हेक्टेयर कम रकबा दर्ज हुआ है।

धान, दालें, तिलहन और कपास की बुआई में गिरावट, गन्ना और जूट में बढ़त

खरीफ़ की प्रमुख फसल धान की बुआई 114.69 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले वर्ष के 125.53 लाख हेक्टेयर की तुलना में 10.84 लाख हेक्टेयर कम है। हालांकि सामान्य बुआई क्षेत्र 97.74 लाख हेक्टेयर के मुकाबले यह 16.95 लाख हेक्टेयर अधिक है।

  • दालों की कुल बुआई 56.63 लाख हेक्टेयर रही, जो पिछले वर्ष के 73.85 लाख हेक्टेयर से 17.22 लाख हेक्टेयर कम है। सामान्य क्षेत्र 62.20 लाख हेक्टेयर की तुलना में भी इसमें 5.57 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। अरहर की बुआई 19.54 लाख हेक्टेयर, उड़द 9.34 लाख हेक्टेयर, मूंग 21.52 लाख हेक्टेयर, कुलथी 0.14 लाख हेक्टेयर, मोठ 4.40 लाख हेक्टेयर और अन्य दालें 1.69 लाख हेक्टेयर में बोई गई हैं। इनमें केवल मूंग और मोठ का रकबा सामान्य क्षेत्र से अधिक रहा।
  • श्रीअन्न एवं मोटे अनाज की बुआई 98.69 लाख हेक्टेयर रही, जो पिछले वर्ष से 28.61 लाख हेक्टेयर कम है। बाजरा 33.76 लाख हेक्टेयर, ज्वार 6.88 लाख हेक्टेयर, रागी 0.93 लाख हेक्टेयर, छोटे बाजरे 1.16 लाख हेक्टेयर और मक्का 55.97 लाख हेक्टेयर में बोया गया। मक्का का रकबा सामान्य क्षेत्र से मामूली 0.23 लाख हेक्टेयर अधिक रहा।
  • तिलहनों की कुल बुआई 117.83 लाख हेक्टेयर दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 31.34 लाख हेक्टेयर कम है। मूंगफली 23.40 लाख हेक्टेयर, सोयाबीन 90.51 लाख हेक्टेयर, तिल 2.79 लाख हेक्टेयर और अरंडी 0.14 लाख हेक्टेयर में बोई गई। केवल सूरजमुखी की बुआई सामान्य और पिछले वर्ष दोनों से अधिक रही।
  • कपास की बुआई 79.54 लाख हेक्टेयर में हुई, जो पिछले वर्ष के 93.95 लाख हेक्टेयर से 14.41 लाख हेक्टेयर कम है। सामान्य क्षेत्र 95.83 लाख हेक्टेयर की तुलना में भी कपास का रकबा 16.28 लाख हेक्टेयर कम रहा।
  • इसके विपरीत गन्ने की बुआई 57.58 लाख हेक्टेयर रही, जो पिछले वर्ष से 0.86 लाख हेक्टेयर और सामान्य क्षेत्र से 2.36 लाख हेक्टेयर अधिक है। जूट एवं मेस्ता का रकबा भी 6.28 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष और सामान्य दोनों आँकड़ों से थोड़ा अधिक दर्ज किया गया।
फसल10 जुलाई 2026 तक बुआई (लाख हे. )10 जुलाई 2025 तक बुआई (लाख हे. )अंतर (लाख हे. )
धान114.69125.53-10.84
सोयाबीन90.51107.72-17.21
कपास79.5493.95-14.41
गन्ना57.5856.72+0.86
मक्का55.9769.56-13.59
बाजरा33.7645.98-12.22
मूंगफली23.4035.45-12.05
मूंग21.5224.08-2.56
अरहर19.5428.03-8.49
उड़द9.3413.29-3.95

बारिश पर टिकी आगे की तस्वीर, समय पर मानसून लौटा तो सुधर सकते हैं आँकड़े

10 जुलाई तक के आँकड़े बताते हैं कि खरीफ़ की अधिकांश प्रमुख फसलों की बुआई अभी भी पिछले वर्ष के स्तर से पीछे चल रही है। धान, दालें, श्रीअन्न, तिलहन और कपास जैसी प्रमुख फसलों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, जिसका बड़ा कारण कई राज्यों में मानसून की अनियमित प्रगति और बारिश की कमी रही है।

कृषि क्षेत्र की आगे की स्थिति अब आने वाले हफ़्तों की वर्षा पर निर्भर करेगी। यदि मानसून सामान्य रूप से सक्रिय होता है तो अभी भी कई क्षेत्रों में बुआई की रफ़्तार तेज़ हो सकती है। वहीं, यदि वर्षा में कमी बनी रहती है और अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है, तो किसानों को दोबारा बुआई, कम उत्पादन और लागत बढ़ने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में आगामी मानसूनी गतिविधियाँ खरीफ़ सीज़न की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएँगी।
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