किसानों के लिए नई आफत! पंजाब के खेतों में पहली बार दिखीं खरपतवार की 3 नई प्रजातियां, वैज्ञानिकों ने किया अलर्ट
Gaon Connection | Jun 11, 2026, 19:20 IST
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में तीन नई खरपतवार प्रजातियों की पहचान की है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये खरपतवार फसलों के साथ पोषक तत्वों, नमी और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं तथा कीट व रोगों के प्रसार को बढ़ावा दे सकती हैं। किसानों को सतर्क रहने और नई प्रजातियों की सूचना देने की सलाह दी गई है।
पंजाब के कृषि तंत्र पर नया संकट
जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ रही मौसम संबंधी चरम घटनाएं अब सिर्फ फसलों को ही नहीं बल्कि पूरे कृषि तंत्र को प्रभावित करने लगी हैं। बाढ़, सूखा और अनियमित बारिश जैसी परिस्थितियां खेतों में नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। इसी कड़ी में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU), लुधियाना के वैज्ञानिकों ने एक नई चिंता जताई है। वैज्ञानिकों ने राज्य के बाढ़ प्रभावित इलाकों में ऐसी नई खरपतवार (वीड) प्रजातियों की पहचान की है जो आने वाले समय में खेती और फसल उत्पादन के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के अनुसार, वर्ष 2023 और 2025 में आई बाढ़ के बाद राज्य के कई जिलों में किए गए सर्वेक्षण में खरपतवारों की संरचना में बड़े बदलाव देखने को मिले। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते इन नई प्रजातियों पर निगरानी और नियंत्रण नहीं किया गया तो यह फसलों, जैव विविधता और कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा जारी बयान के मुताबिक होशियारपुर, गुरदासपुर, पठानकोट, रूपनगर, अमृतसर और पटियाला जिलों में सर्वेक्षण किया गया। इस दौरान तीन ऐसी खरपतवार प्रजातियां सामने आईं जिनकी पहले इन क्षेत्रों में मौजूदगी दर्ज नहीं की गई थी। इनमें जंगली मूली (Raphanus raphanistrum), जल धनिया (Ranunculus sceleratus) और मार्श येलो-क्रेस (Rorippa palustris) शामिल हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि बाढ़ का पानी अपने साथ बीज और पौधों के अन्य हिस्से बहाकर लाया जिससे ये प्रजातियां नए क्षेत्रों तक पहुंच गईं।
सर्वेक्षण के दौरान कुछ स्थानों पर मार्श येलो-क्रेस को मटर की फसलों में फैलते हुए भी पाया गया जो यह संकेत देता है कि यह खरपतवार खेती वाले क्षेत्रों में भी आसानी से अपनी जगह बना सकती है।
अध्ययन में रबी सीजन के दौरान खरपतवारों की संरचना में भी उल्लेखनीय बदलाव दर्ज किए गए। कई ऐसी प्रजातियां, जो पहले कम दिखाई देती थीं, अब बाढ़ के बाद नम खेतों में अधिक संख्या में नजर आने लगी हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बदलाव चिंता का विषय है क्योंकि खरपतवार फसलों के साथ पोषक तत्वों, नमी, धूप और जगह के लिए सीधी प्रतिस्पर्धा करते हैं। इतना ही नहीं, कई खरपतवार कीटों और रोग फैलाने वाले जीवों के वैकल्पिक मेजबान भी बन जाते हैं, जिससे फसलों को अतिरिक्त नुकसान पहुंच सकता है।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने कहा कि यह अध्ययन दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक मौसम संबंधी घटनाएं कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को अप्रत्याशित रूप से बदल सकती हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब में नई खरपतवार प्रजातियों की पारिस्थितिकी, अनुकूलन क्षमता और इनके आक्रामक फैलाव की संभावनाओं के बारे में अभी सीमित जानकारी उपलब्ध है। ऐसे में लगातार निगरानी और समय पर प्रबंधन उपाय बेहद जरूरी हैं, ताकि ये प्रजातियां स्थायी रूप से स्थापित होकर फसल उत्पादन, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता को प्रभावित न कर सकें।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. माखन सिंह भुल्लर ने किसानों से मौजूदा खरीफ सीजन के दौरान विशेष सतर्कता बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा कि यदि खेतों में कोई नई पौध प्रजाति या असामान्य खरपतवार दिखाई दे तो इसकी जानकारी तुरंत पीएयू विशेषज्ञों, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), किसान सलाह सेवा केंद्रों (FASCs) या कृषि एवं किसान कल्याण विभाग को दें, ताकि शुरुआती स्तर पर ही आवश्यक कदम उठाए जा सकें।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के अनुसार, वर्ष 2023 और 2025 में आई बाढ़ के बाद राज्य के कई जिलों में किए गए सर्वेक्षण में खरपतवारों की संरचना में बड़े बदलाव देखने को मिले। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते इन नई प्रजातियों पर निगरानी और नियंत्रण नहीं किया गया तो यह फसलों, जैव विविधता और कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं।
बाढ़ के साथ पहुंचे नए खरपतवार
सर्वेक्षण के दौरान कुछ स्थानों पर मार्श येलो-क्रेस को मटर की फसलों में फैलते हुए भी पाया गया जो यह संकेत देता है कि यह खरपतवार खेती वाले क्षेत्रों में भी आसानी से अपनी जगह बना सकती है।