खेती की डरावनी तस्वीर! भारत में हर घंटे एक किसान या खेत मज़दूर ने दी जान, NCRB रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
Gaon Connection | May 07, 2026, 18:55 IST
भारत के ग्रामीण क्षेत्र में खेती की स्थिति बेहद चिंताजनक होती जा रही है। 2024 में 10,546 किसानों और खेत मजदूरों ने आत्महत्या की। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा मामलों की खबर है, जबकि कर्नाटक में भी यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। बढ़ती कृषि लागत, अनियमित मौसम और बढ़ते कर्ज ने किसानों की आर्थिक स्थिति को अस्थिर किया है।
खेती से टूट रही जिंदगी
देश में खेती का संकट सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि किसानों और खेत मजदूरों की जिंदगी पर भी भारी पड़ रहा है। NCRB की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2024 में देशभर में 10,546 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की यानी औसतन हर दिन 28 और लगभग हर घंटे एक किसान या खेत मजदूर ने अपनी जान गंवाई। सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में सामने आए जबकि कर्नाटक में आत्महत्याओं में सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया 2024’ रिपोर्ट के मुताबिक खेती-किसानी से जुड़ी आत्महत्याओं में खेत मजदूरों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। 2024 में आत्महत्या करने वाले 10,546 लोगों में 5,913 खेत मजदूर थे, जो कुल मामलों का करीब 56 प्रतिशत है। वहीं 4,633 किसान शामिल रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि खेती की बढ़ती लागत, मौसम की मार, कर्ज का दबाव और फसलों का उचित दाम न मिलना किसानों और खेत मजदूरों दोनों को आर्थिक संकट की ओर धकेल रहा है। ग्रामीण इलाकों में खेती से होने वाली आय घटने और मजदूरी पर निर्भरता बढ़ने से हालात और मुश्किल हुए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार खेती-किसानी से जुड़ी आत्महत्याओं के मामलों में महाराष्ट्र सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य रहा। यहां 2024 में 3,824 किसानों और खेत मजदूरों ने आत्महत्या की, जो देश के कुल मामलों का 36 प्रतिशत से ज्यादा है। कर्नाटक में 2,971 मामले दर्ज किए गए और यह महाराष्ट्र के बाद दूसरे स्थान पर रहा। हालांकि सबसे ज्यादा चिंता की बात यह रही कि कर्नाटक में आत्महत्या के मामलों में 22.61 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। राज्य में 2023 में 2,423 मामले थे, जो 2024 में बढ़कर 2,971 हो गए। इसके अलावा मध्य प्रदेश में 835, आंध्र प्रदेश में 780, तमिलनाडु में 503 और छत्तीसगढ़ में 486 मामले सामने आए। राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी आत्महत्याओं के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
रिपोर्ट में किसानों की आत्महत्या के कारणों का अलग से उल्लेख नहीं किया गया है। हालांकि किसान संगठनों ने इन आंकड़ों को अधूरा बताया है। ऑल इंडिया किसान सभा के महासचिव विजू कृष्णन का कहना है कि ग्रामीण संकट के चलते मजदूरी के लिए शहरों की ओर पलायन करने वाले गरीब किसानों की आत्महत्याएं इन आंकड़ों में शामिल नहीं हैं। उन्होंने कहा कि देश में कृषि संकट लगातार गहराता जा रहा है और केवल आंकड़ों में मामूली कमी दिखने से जमीनी हालात नहीं बदल जाते। उनके मुताबिक खेती और ग्रामीण रोजगार से जुड़े बड़े सुधारों के बिना किसानों और खेत मजदूरों की स्थिति में बदलाव संभव नहीं है।