प्याज के आँसू! किसान से ₹1 प्रति किलो में खरीदी जा रही, ऑनलाइन ₹35 में बिक रही, तो आखिर ₹34 किसके?
Umang | May 14, 2026, 17:25 IST
प्याज की खेती आज देश में एक बड़ी समस्या बन गई है। किसान अपनी मेहनत से उगाई प्याज को औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर है। वहीं शहरों में ग्राहक उसी प्याज के लिए कई गुना ज्यादा कीमत चुका रहा है। खेत से बाजार तक पहुंचते-पहुंचते प्याज का दाम कई गुना बढ़ जाता है।
एक प्याज के दो दाम!
देश में इस समय प्याज सिर्फ एक सब्जी नहीं, बल्कि खेती, महंगाई और बाजार व्यवस्था की बेबसी की कहानी बन गई है। एक तरफ महाराष्ट्र का किसान अपनी मेहनत से उगाई प्याज को मंडी में बेचकर खाली हाथ लौट रहा है, तो दूसरी तरफ शहरों में वही प्याज ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और दुकानों पर 30 से 35 रुपये किलो बिक रहा है। यानी खेत से बाजार तक पहुंचते-पहुंचते प्याज का दाम 35 गुना बढ़ जाता है, लेकिन सबसे कम हिस्सा उस किसान को मिलता है जिसने उसे उगाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर ग्राहक महंगा प्याज खरीद रहा है, तो किसान गरीब क्यों हो रहा है?
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले के प्रकाश गलधर नामक किसान की कहानी ने पूरे देश को झकझोर दिया है। चार एकड़ में प्याज उगाने वाले इस किसान ने बड़ी उम्मीद से अपनी फसल मंडी पहुंचाई थी। 25 बोरी प्याज का वजन 1262 किलो निकला, लेकिन मंडी में उसका भाव सिर्फ ₹1 प्रति किलो लगा। पूरी फसल की कीमत मात्र ₹1262 बनी लेकिन असली सदमा इसके बाद मिला। मंडी में हमाली, तुलाई, ढुलाई और दूसरे खर्च काटने के बाद किसान के हाथ में कुछ नहीं बचा। उल्टा उसे एक रुपया और जमा करने को कहा गया। जिस किसान ने महीनों खेत में पसीना बहाया, बीज-खाद और दवाइयों पर पैसा खर्च किया, सिंचाई करवाई और फसल तैयार की, उसी को आखिर में अपनी मेहनत का दाम तक नहीं मिला। किसान प्रकाश गलधर ने बताया कि बाकी प्याज उन्होंने खेत में ही फेंक दी, क्योंकि उसे बेचने से भी नुकसान हो रहा था। बेटी की शादी का कर्ज पहले से है और अब खेती भी घाटे का सौदा बन चुकी है।
इस कहानी का सबसे चुभने वाला हिस्सा यह है कि जिस समय किसान को प्याज का ₹1 किलो भाव मिल रहा था, उसी समय लखनऊ के एक शख्स ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म Blinkit से 1 किलो प्याज ₹35 में खरीदी। यानी किसान अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर है, जबकि शहर में ग्राहक उसी प्याज के लिए कई गुना ज्यादा कीमत चुका रहा है। यानी किसान और ग्राहक दोनों परेशान हैं लेकिन बीच की सप्लाई चेन मुनाफे में दिखाई देती है। सवाल यह है कि खेत से बाजार तक ऐसा क्या हो जाता है कि ₹1 किलो की प्याज ₹35 में बिकने लगती है? क्या सिर्फ ट्रांसपोर्ट इतना महंगा है? क्या सिर्फ पैकिंग और डिलीवरी का खर्च इतना बढ़ गया है? या फिर किसानों और ग्राहकों के बीच खड़ी बिचौलियों की लंबी व्यवस्था असली कमाई कर रही है? यही सवाल अब गांव से लेकर शहर तक लोगों को परेशान कर रहा है।
![ग्राहक का बिल]()
इसी बीच सरकार के ताजा आंकड़ों ने एक और बड़ा विरोधाभास सामने ला दिया है। अप्रैल 2026 में देश की थोक महंगाई दर यानी WPI बढ़कर 8.30 फीसदी पहुंच गई, जो पिछले 42 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। मार्च में यह आंकड़ा 3.88 फीसदी था। सिर्फ एक महीने में महंगाई में तेज उछाल दर्ज किया गया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के मुताबिक महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह पेट्रोलियम उत्पाद, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, धातुएं, मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स और गैर-खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी है। अप्रैल में महीने-दर-महीने WPI में 3.86 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो यह दिखाती है कि लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
यानी बाजार में महंगाई बढ़ रही है लेकिन इसके बावजूद किसान को उसकी फसल की लागत तक नहीं मिल रही। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि खुदरा बाजार में प्याज 25 से 35 रुपये किलो बिक रही है, लेकिन मंडियों में कई किसानों को ₹5 किलो तक भी दाम नहीं मिल रहा। कुछ किसानों को तो इससे भी कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ रही है।
आज देश में सबसे दुखद स्थिति यही है कि किसान भी खुश नहीं है और ग्राहक भी राहत में नहीं है। महाराष्ट्र में किसान सड़क पर प्याज फेंक रहे हैं। उत्तर प्रदेश में आलू की फसल ट्रैक्टर से कुचली जा रही है। कर्नाटक में किसान टमाटर जानवरों को खिलाने को मजबूर हैं। वजह सिर्फ इतनी है कि मंडियों में फसल की कीमत इतनी गिर चुकी है कि कई बार कटाई और ढुलाई का खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाता है।
दूसरी तरफ शहरों में ग्राहक को अब भी राहत नहीं मिल रही। बाजार में सब्जियां महंगी हैं, रसोई का बजट बिगड़ रहा है और आम आदमी महंगाई से परेशान है। यानी किसान घाटे में है, ग्राहक महंगाई में है, लेकिन सिस्टम के बीच खड़ी परतें लगातार कमाई कर रही हैं।
इसकी सबसे बड़ी वजह खराब बाजार व्यवस्था और स्टोरेज की कमी है। देश में कोल्ड स्टोरेज की भारी कमी है, इसलिए किसान लंबे समय तक प्याज स्टोर नहीं कर पाता और मजबूरी में तुरंत बेच देता है। सरकारी खरीद भी बेहद सीमित है। सरकार का प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड कुल उत्पादन का सिर्फ 1 से 2 फीसदी प्याज ही खरीद पाता है। ऐसे में जब बाजार में एक साथ ज्यादा फसल आती है, तो दाम सीधे जमीन पर गिर जाते हैं और सबसे पहले किसान टूटता है।
25 बोरी प्याज बेचने के बाद भी किसान के हाथ खाली
शहर में वही प्याज ₹35 किलो, आखिर बीच में कौन कमा रहा है?
ग्राहक का बिल
सरकार कह रही महंगाई बढ़ी, किसान कह रहा लागत भी नहीं निकली
यानी बाजार में महंगाई बढ़ रही है लेकिन इसके बावजूद किसान को उसकी फसल की लागत तक नहीं मिल रही। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि खुदरा बाजार में प्याज 25 से 35 रुपये किलो बिक रही है, लेकिन मंडियों में कई किसानों को ₹5 किलो तक भी दाम नहीं मिल रहा। कुछ किसानों को तो इससे भी कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ रही है।
खेत में किसान टूट रहा, शहर में ग्राहक महंगाई झेल रहा
दूसरी तरफ शहरों में ग्राहक को अब भी राहत नहीं मिल रही। बाजार में सब्जियां महंगी हैं, रसोई का बजट बिगड़ रहा है और आम आदमी महंगाई से परेशान है। यानी किसान घाटे में है, ग्राहक महंगाई में है, लेकिन सिस्टम के बीच खड़ी परतें लगातार कमाई कर रही हैं।