‘सिद्धू’ कटहल ने एक किसान के पेड़ को राष्ट्रीय पहचान दिला दी, आप भी लगा सकते हैं ये किस्म
Divendra Singh | Jan 17, 2026, 14:27 IST
कर्नाटक के एक किसान के खेत में लग कटहल का पेड़ आज पूरे देश के लिए मिसाल बन गया है। ‘सिद्धू’ नाम की इस खास किस्म ने अपने तांबे-लाल गूदे, बेहतरीन स्वाद और उच्च पोषण मूल्य के दम पर राष्ट्रीय पहचान हासिल की।
दक्षिण कर्नाटक के गाँवों में कटहल का पेड़ हमेशा से मौजूद रहा है। घरों के आंगन, खेतों की मेड़ों और गांव की पगडंडियों के किनारे खड़े ये विशाल पेड़ आमतौर पर “छाया और घरेलू फल” तक ही सीमित समझे जाते थे। किसान इन्हें काटते नहीं थे, लेकिन इनसे कोई बड़ी आमदनी की उम्मीद भी नहीं करते थे। लेकिन कर्नाटक के एक गाँव में खड़ा एक 35 साल पुराना कटहल का पेड़ इस सोच को पूरी तरह बदलने वाला साबित हुआ। यही पेड़ आगे चलकर “सिद्धू जैक” के नाम से देश की सबसे खास और पोषण से भरपूर कटहल किस्म बना।
इस पेड़ को सालों पहले कर्नाटक के तुमकुर ज़िले के चेलूर गाँव के किसान एसके सिद्दपा ने अपने खेत में लगाया था। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यही पौधा आने वाले समय में न केवल उनके परिवार की किस्मत बदलेगा, बल्कि भारत में कटहल की खेती को एक नई पहचान भी देगा। समय के साथ इस पेड़ से आने वाले फलों का रंग, स्वाद और बनावट आसपास के सामान्य कटहल से अलग दिखने लगे। इसके गूदे का रंग तांबे जैसा लाल, स्वाद ज्यादा मीठा और बनावट मजबूत थी।
गाँव के लोग इसे अलग पहचानने लगे, लेकिन वैज्ञानिक दुनिया तक इसकी खासियत तब पहुंची जब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) ने दक्षिण कर्नाटक में स्थानीय कटहल किस्मों का सर्वे शुरू किया।
2014 से 2018 के बीच IIHR की टीम गाँव-गाँव घूमकर किसानों के खेतों में मौजूद स्थानीय किस्मों की पहचान कर रही थी। इसी दौरान चेलूर गाँव में इस पेड़ की विशेषताएं वैज्ञानिकों का ध्यान खींच ले गईं। परीक्षणों में यह साबित हुआ कि इस किस्म के फलों में कुल घुलनशील ठोस पदार्थ यानी मिठास का स्तर बहुत अधिक है, जो लगभग 31 डिग्री ब्रिक्स तक पाया गया। यही कारण है कि इसका स्वाद सामान्य पीले या सफेद गूदे वाले कटहल से कहीं बेहतर माना गया।
एसके सिद्दपा के बेटे एसएस परमेश बताते हैं, "इस किस्म के फल का वजन लगभग पर 2 से 5 किलो के बीच रहता है। औसतन एक फल का वजन करीब 2.44 किलो पाया गया।"
पेड़ की संरचना चौड़ी पिरामिड जैसी होती है और एक परिपक्व पेड़ से लगभग 450 फल तक निकल सकते हैं। इसका मतलब है कि एक ही पेड़ से सालाना करीब 1000 किलो से ज्यादा उत्पादन संभव है। यह खासियत इसे घरेलू बागानों के साथ-साथ व्यावसायिक खेती के लिए भी बेहद उपयुक्त बनाती है।
सिद्धू कटहल की सबसे बड़ी ताकत उसका पोषण मूल्य है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के वैज्ञानिक अध्ययनों में यह सामने आया कि इसके तांबे-लाल रंग वाले गूदे में कैरोटीनॉयड, लाइकोपीन, फ्लेवोनॉयड और फेनोलिक यौगिकों की मात्रा सामान्य किस्मों से कहीं अधिक है। प्रति 100 ग्राम गूदे में कैरोटीनॉयड की मात्रा लगभग 4.43 मिलीग्राम, लाइकोपीन 1.12 मिलीग्राम, कुल फेनोल्स 31.76 मिलीग्राम और विटामिन-सी करीब 6.48 मिलीग्राम पाई गई। इसके अलावा इसकी एंटीऑक्सीडेंट क्षमता भी काफी ज्यादा दर्ज की गई, जिससे यह केवल स्वादिष्ट फल नहीं बल्कि एक “फंक्शनल फूड” के रूप में भी पहचाना जाने लगा।
ये भी पढ़ें: बड़े काम का कटहल: सब्जी, फल के साथ आटा, जैम, जेली और पापड़ बनाने में भी हो सकता है प्रयोग
इस किस्म की पहचान के बाद IIHR ने इसे औपचारिक रूप से प्रमोट करना शुरू किया। वैज्ञानिकों ने इसके पौधों की शुद्धता प्रमाणित की और किसानों को इसके रोपण और प्रसार का प्रशिक्षण दिया। पहली बार 2017 में सिद्धगंगा मठ में सिद्धू जैक किस्म को सार्वजनिक रूप से लाया गया। इसके बाद 2019 से IIHR ने बड़े स्तर पर इसके पौधों का वितरण शुरू किया। कुछ ही वर्षों में लाखों पौधे देश के अलग-अलग राज्यों में पहुंचे और यह किस्म कर्नाटक से निकलकर महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश तक फैल गई।
इस पूरी यात्रा का सबसे अहम पहलू यह रहा कि किसान को सिर्फ “पौधे का स्रोत” बनाकर छोड़ नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें जैव विविधता का संरक्षक माना गया। सिद्धू किस्म के मूल संरक्षक किसान को इस पूरी प्रक्रिया में भागीदार बनाया गया। पौध उत्पादन से लेकर बिक्री तक, आय का बड़ा हिस्सा सीधे किसान तक पहुंचा। जहां पहले इस किसान परिवार को कटहल से सालाना मुश्किल से 7–8 हजार रुपये की आमदनी होती थी, वहीं इस पहल के बाद उनकी कुल कमाई 1.15 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह आंकड़ा सिर्फ पैसे की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि अगर स्थानीय संसाधनों को वैज्ञानिक पहचान और बाजार से जोड़ा जाए, तो गांवों में भी उद्यमिता का मजबूत आधार बन सकता है।
सिद्धू किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भारत की सर्वश्रेष्ठ कटहल किस्म का पुरस्कार भी दिया। यह सम्मान केवल एक फल को नहीं, बल्कि किसान नवाचार को मिला। बाद में इस किस्म को पौधा किस्म संरक्षण और किसान अधिकार प्राधिकरण के तहत पंजीकरण भी प्राप्त हुआ, जिससे किसान के अधिकार कानूनी रूप से सुरक्षित हो गए और भविष्य में रॉयल्टी जैसी आय के रास्ते खुले।
एसएस परमेश बताते हैं, "ये किस्म मई-सितंबर तक फल देती है, अब तो दूर-दूर से किसान इसके पौधे मँगाने लगे हैं, आज ये किस्म लगभग 11 प्रदेशों तक पहुँच गई है। हमारी कोशिश है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक हम इस किस्म को पहुँचा पाएँ।"
आज सिद्धू कटहल केवल ताजा फल के रूप में ही नहीं, बल्कि प्रोसेस्ड उत्पादों के रूप में भी बाजार में जगह बना रहा है। इससे हलवा, पायसम, चिप्स, रेडी-टू-कुक सब्जियां और स्नैक्स तैयार किए जा रहे हैं। इससे गांवों में स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट्स खुल रही हैं और महिलाओं को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। यही वजह है कि यह मॉडल केवल खेती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने का जरिया बन गया।
एक किसान द्वारा बचाया गया एक पेड़ पूरे देश के लिए पोषण सुरक्षा, आय सुरक्षा और कृषि विविधता का स्रोत बन सकता है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती खेती लागत के दौर में ऐसी फसलें, जो कम पानी में भी टिकाऊ हों और बाजार में अच्छी कीमत दें, भविष्य की खेती का आधार बन सकती हैं।
आज जब किसान नई-नई तकनीकों और हाई-इनपुट खेती की ओर देख रहे हैं, सिद्धू कटहल यह याद दिलाता है कि समाधान हमेशा बाहर से नहीं आता। कई बार समाधान हमारे अपने खेतों, अपने बीजों और अपने पारंपरिक ज्ञान में छिपा होता है। जरूरत है उसे पहचानने, वैज्ञानिक रूप से मजबूत करने और बाजार से जोड़ने की।
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इस पेड़ को सालों पहले कर्नाटक के तुमकुर ज़िले के चेलूर गाँव के किसान एसके सिद्दपा ने अपने खेत में लगाया था। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यही पौधा आने वाले समय में न केवल उनके परिवार की किस्मत बदलेगा, बल्कि भारत में कटहल की खेती को एक नई पहचान भी देगा। समय के साथ इस पेड़ से आने वाले फलों का रंग, स्वाद और बनावट आसपास के सामान्य कटहल से अलग दिखने लगे। इसके गूदे का रंग तांबे जैसा लाल, स्वाद ज्यादा मीठा और बनावट मजबूत थी।
गाँव के लोग इसे अलग पहचानने लगे, लेकिन वैज्ञानिक दुनिया तक इसकी खासियत तब पहुंची जब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) ने दक्षिण कर्नाटक में स्थानीय कटहल किस्मों का सर्वे शुरू किया।
2014 से 2018 के बीच IIHR की टीम गाँव-गाँव घूमकर किसानों के खेतों में मौजूद स्थानीय किस्मों की पहचान कर रही थी। इसी दौरान चेलूर गाँव में इस पेड़ की विशेषताएं वैज्ञानिकों का ध्यान खींच ले गईं। परीक्षणों में यह साबित हुआ कि इस किस्म के फलों में कुल घुलनशील ठोस पदार्थ यानी मिठास का स्तर बहुत अधिक है, जो लगभग 31 डिग्री ब्रिक्स तक पाया गया। यही कारण है कि इसका स्वाद सामान्य पीले या सफेद गूदे वाले कटहल से कहीं बेहतर माना गया।
एसके सिद्दपा और उनके बेटे एसएस परमेश। फोटो: एसएस परमेश
एसके सिद्दपा के बेटे एसएस परमेश बताते हैं, "इस किस्म के फल का वजन लगभग पर 2 से 5 किलो के बीच रहता है। औसतन एक फल का वजन करीब 2.44 किलो पाया गया।"
पेड़ की संरचना चौड़ी पिरामिड जैसी होती है और एक परिपक्व पेड़ से लगभग 450 फल तक निकल सकते हैं। इसका मतलब है कि एक ही पेड़ से सालाना करीब 1000 किलो से ज्यादा उत्पादन संभव है। यह खासियत इसे घरेलू बागानों के साथ-साथ व्यावसायिक खेती के लिए भी बेहद उपयुक्त बनाती है।
सिद्धू कटहल की सबसे बड़ी ताकत उसका पोषण मूल्य है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के वैज्ञानिक अध्ययनों में यह सामने आया कि इसके तांबे-लाल रंग वाले गूदे में कैरोटीनॉयड, लाइकोपीन, फ्लेवोनॉयड और फेनोलिक यौगिकों की मात्रा सामान्य किस्मों से कहीं अधिक है। प्रति 100 ग्राम गूदे में कैरोटीनॉयड की मात्रा लगभग 4.43 मिलीग्राम, लाइकोपीन 1.12 मिलीग्राम, कुल फेनोल्स 31.76 मिलीग्राम और विटामिन-सी करीब 6.48 मिलीग्राम पाई गई। इसके अलावा इसकी एंटीऑक्सीडेंट क्षमता भी काफी ज्यादा दर्ज की गई, जिससे यह केवल स्वादिष्ट फल नहीं बल्कि एक “फंक्शनल फूड” के रूप में भी पहचाना जाने लगा।
ये भी पढ़ें: बड़े काम का कटहल: सब्जी, फल के साथ आटा, जैम, जेली और पापड़ बनाने में भी हो सकता है प्रयोग
इस किस्म की पहचान के बाद IIHR ने इसे औपचारिक रूप से प्रमोट करना शुरू किया। वैज्ञानिकों ने इसके पौधों की शुद्धता प्रमाणित की और किसानों को इसके रोपण और प्रसार का प्रशिक्षण दिया। पहली बार 2017 में सिद्धगंगा मठ में सिद्धू जैक किस्म को सार्वजनिक रूप से लाया गया। इसके बाद 2019 से IIHR ने बड़े स्तर पर इसके पौधों का वितरण शुरू किया। कुछ ही वर्षों में लाखों पौधे देश के अलग-अलग राज्यों में पहुंचे और यह किस्म कर्नाटक से निकलकर महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश तक फैल गई।
तांबे-लाल गूदे वाला ‘सिद्धू’ कटहल
इस पूरी यात्रा का सबसे अहम पहलू यह रहा कि किसान को सिर्फ “पौधे का स्रोत” बनाकर छोड़ नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें जैव विविधता का संरक्षक माना गया। सिद्धू किस्म के मूल संरक्षक किसान को इस पूरी प्रक्रिया में भागीदार बनाया गया। पौध उत्पादन से लेकर बिक्री तक, आय का बड़ा हिस्सा सीधे किसान तक पहुंचा। जहां पहले इस किसान परिवार को कटहल से सालाना मुश्किल से 7–8 हजार रुपये की आमदनी होती थी, वहीं इस पहल के बाद उनकी कुल कमाई 1.15 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह आंकड़ा सिर्फ पैसे की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि अगर स्थानीय संसाधनों को वैज्ञानिक पहचान और बाजार से जोड़ा जाए, तो गांवों में भी उद्यमिता का मजबूत आधार बन सकता है।
सिद्धू किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भारत की सर्वश्रेष्ठ कटहल किस्म का पुरस्कार भी दिया। यह सम्मान केवल एक फल को नहीं, बल्कि किसान नवाचार को मिला। बाद में इस किस्म को पौधा किस्म संरक्षण और किसान अधिकार प्राधिकरण के तहत पंजीकरण भी प्राप्त हुआ, जिससे किसान के अधिकार कानूनी रूप से सुरक्षित हो गए और भविष्य में रॉयल्टी जैसी आय के रास्ते खुले।
एसएस परमेश बताते हैं, "ये किस्म मई-सितंबर तक फल देती है, अब तो दूर-दूर से किसान इसके पौधे मँगाने लगे हैं, आज ये किस्म लगभग 11 प्रदेशों तक पहुँच गई है। हमारी कोशिश है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक हम इस किस्म को पहुँचा पाएँ।"
आज सिद्धू कटहल केवल ताजा फल के रूप में ही नहीं, बल्कि प्रोसेस्ड उत्पादों के रूप में भी बाजार में जगह बना रहा है। इससे हलवा, पायसम, चिप्स, रेडी-टू-कुक सब्जियां और स्नैक्स तैयार किए जा रहे हैं। इससे गांवों में स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट्स खुल रही हैं और महिलाओं को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। यही वजह है कि यह मॉडल केवल खेती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने का जरिया बन गया।
एक किसान द्वारा बचाया गया एक पेड़ पूरे देश के लिए पोषण सुरक्षा, आय सुरक्षा और कृषि विविधता का स्रोत बन सकता है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती खेती लागत के दौर में ऐसी फसलें, जो कम पानी में भी टिकाऊ हों और बाजार में अच्छी कीमत दें, भविष्य की खेती का आधार बन सकती हैं।
आज जब किसान नई-नई तकनीकों और हाई-इनपुट खेती की ओर देख रहे हैं, सिद्धू कटहल यह याद दिलाता है कि समाधान हमेशा बाहर से नहीं आता। कई बार समाधान हमारे अपने खेतों, अपने बीजों और अपने पारंपरिक ज्ञान में छिपा होता है। जरूरत है उसे पहचानने, वैज्ञानिक रूप से मजबूत करने और बाजार से जोड़ने की।
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