FAO Report: जिस मिट्टी से उगता है हमारा खाना, उसकी सेहत बिगड़ रही! खेती पर क्यों बढ़ा ख़तरा, जानिए पूरी वजह
Mansi | Sept 04, 2026, 16:13 IST
दुनिया भर में मिट्टी का क्षरण जारी है और इसे बचाने के तरीके धीमी गति से अपनाए जा रहे हैं। एफएओ की रिपोर्ट के अनुसार, मिट्टी का कटाव सबसे गंभीर खतरा है जो खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है। मिट्टी के भीतर रहने वाले सूक्ष्मजीव और केंचुए जैविक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। टिकाऊ मिट्टी प्रबंधन के लिए प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बेहतर नीतियों की आवश्यकता है।
मिट्टी की सेहत बिगड़ी तो सिर्फ़ फसल नहीं, हमारा भोजन और किसानों की आजीविका भी प्रभावित हो सकती है
हम जिस मिट्टी पर चलते हैं, उसे अक्सर सिर्फ़ ज़मीन समझकर आगे बढ़ जाते हैं। खेत में फसल लहलहाती है तो नज़र पौधों पर जाती है, मिट्टी पर नहीं। जबकि इसी मिट्टी के भीतर एक पूरी दुनिया लगातार काम करती रहती है। सूक्ष्मजीव, केंचुए और दूसरे जीव जैविक पदार्थों को तोड़ने, पोषक तत्वों के चक्र को चलाने और मिट्टी की संरचना बनाए रखने में मदद करते हैं। स्वस्थ मिट्टी पानी को सोखने और छानने, कार्बन को संचित करने, जैव विविधता को सहारा देने और लोगों की आजीविका बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। एफएओ (FAO) के मुताबिक़, दुनिया में पैदा होने वाले हमारे 95% से ज़्यादा भोजन का आधार स्वस्थ मिट्टी है।
लेकिन जिस मिट्टी पर हमारी खेती और भोजन की व्यवस्था टिकी है, वही अब बढ़ते दबाव में है। एफएओ की नई वैश्विक रिपोर्ट ‘स्टेटस ऑफ द वर्ल्ड्स सॉइल रिसोर्सेज़ 2026’ के मुताबिक़, दुनिया के कई हिस्सों में मिट्टी का क्षरण जारी है, जबकि उसे बचाने वाले टिकाऊ तरीक़ों को अपनाने की रफ़्तार ज़रूरत के मुताबिक़ नहीं बढ़ी है। 2015 से 2025 के बीच के वैज्ञानिक शोध और 75 देशों की विशेषज्ञता पर आधारित इस आकलन में मिट्टी के कटाव को सबसे गंभीर ख़तरा बताया गया है। इसके साथ जैविक कार्बन की कमी, पोषक तत्वों का ग़लत प्रबंधन, जैव विविधता का नुकसान, लवणता, प्रदूषण और शहरीकरण के कारण मिट्टी के सील होने जैसी समस्याएँ भी सामने आई हैं।
मिट्टी का कटाव खेती के लिए गंभीर समस्या है। तेज़ बारिश और हवा के साथ खेत की ऊपरी उपजाऊ परत बह या उड़ सकती है। इसी परत में जैविक पदार्थ और फसल के लिए ज़रूरी पोषक तत्व बड़ी मात्रा में मौजूद होते हैं। एफएओ के आकलन में मिट्टी का कटाव दुनिया की मिट्टी के लिए सबसे गंभीर और आपस में जुड़ा हुआ ख़तरा है। जिन 7 वैश्विक क्षेत्रों का आकलन किया गया, उनमें 81% आकलनों में कटाव प्रबंधन को ख़राब या बहुत ख़राब माना गया। वहीं 65% आकलनों में 2015 के बाद स्थिति बिगड़ने की बात सामने आई। कटाव का असर सिर्फ़ मिट्टी के बह जाने तक सीमित नहीं रहता। इससे मिट्टी की पानी रोकने की क्षमता, जैविक पदार्थ और पोषक तत्वों का संतुलन प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि एफएओ मिट्टी से जुड़े ख़तरों को एक-दूसरे से जुड़ी समस्याओं के रूप में देखने पर ज़ोर देता है।
मिट्टी की सेहत का मतलब सिर्फ़ उसमें मौजूद रासायनिक पोषक तत्वों से नहीं है। इसके भीतर बैक्टीरिया, फंगस, आर्किया, प्रोटोज़ोआ, नेमाटोड, केंचुए और कई दूसरे जीव रहते हैं। ये जैविक पदार्थों के विघटन और पोषक तत्वों के चक्र जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं में अहम योगदान देते हैं। एफएओ की 2020 की ‘स्टेट ऑफ नॉलेज ऑफ सॉइल बायोडायवर्सिटी’ रिपोर्ट ने भी मिट्टी की जैव विविधता के महत्व को रेखांकित किया था। 2026 के नए वैश्विक आकलन में मिट्टी की जैव विविधता का नुकसान भी प्रमुख मिट्टी संबंधी ख़तरों में शामिल है।
मिट्टी को बचाने के लिए दुनिया के पास कई प्रभावी उपाय हैं। कम जुताई, फसल विविधीकरण, कवर क्रॉप, जैविक पदार्थों का इस्तेमाल, फसल अवशेषों को खेत में बनाए रखना, मेड़बंदी और पोषक तत्वों का बेहतर प्रबंधन मिट्टी की सेहत बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। कृषि-वनीकरण भी ऐसा ही एक उपाय है। फिर भी इन्हें बड़े पैमाने पर अपनाने की रफ़्तार धीमी है। एफएओ के मुताबिक़, आधे से ज़्यादा क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय आकलनों में टिकाऊ मिट्टी प्रबंधन के तरीक़ों को अपनाने का स्तर कम या बहुत कम पाया गया। 2015 के बाद 58% आकलनों में स्थिति बिगड़ी, जबकि करीब 10% में सुधार दर्ज हुआ।
खेती का तरीक़ा बदलना किसान के लिए सिर्फ़ इच्छा का सवाल नहीं है। इसमें लागत, जोखिम, जानकारी, बाज़ार और मौसम जैसे कई पहलू जुड़े होते हैं। इसलिए टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए केवल सलाह देना पर्याप्त नहीं होगा। एफएओ ने बेहतर प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, वित्तीय मदद, सुरक्षित भूमि अधिकार और बेहतर बाज़ार व्यवस्था की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। साथ ही मिट्टी से जुड़े क़ानून और नीतियों को मज़बूत करने, मिट्टी की निगरानी और डेटा व्यवस्था सुधारने तथा टिकाऊ प्रबंधन अपनाने वालों को प्रोत्साहन देने की सिफ़ारिश की है।
भारत में भी मिट्टी की सेहत को केवल रासायनिक पोषक तत्वों के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। दिल्ली स्थित सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की 2026 की रिपोर्ट ‘इम्प्रूविंग सॉइल बायोलॉजिकल हेल्थ: द रोल ऑफ बायोलॉजिकल कंपोनेंट्स एंड मॉनिटरिंग अप्रोचेज़’ मिट्टी की जैविक सेहत को नियमित राष्ट्रीय निगरानी का हिस्सा बनाने की ज़रूरत बताती है। सीएसई के मुताबिक़, भारत की मिट्टी पर उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित इस्तेमाल, गहन रसायन-आधारित खेती और ऊपरी मिट्टी के कटाव जैसे दबाव हैं। इसलिए यह देखना भी ज़रूरी है कि मिट्टी के भीतर मौजूद सूक्ष्मजीवों और दूसरे जीवों की स्थिति कैसी है।
मिट्टी की ख़राब होती सेहत का असर केवल खेत में खड़ी फसल तक सीमित नहीं रहता। मिट्टी पानी के नियमन, जैव विविधता, जलवायु और ग्रामीण आजीविका से भी जुड़ी है। ऐसे में मिट्टी का संकट सीधे भोजन और जीवन से जुड़ा सवाल बन जाता है। अगर उपजाऊ ऊपरी परत लगातार बहती रही, जैविक पदार्थ घटता गया या मिट्टी के भीतर का जैविक जीवन कमज़ोर हुआ, तो खेत की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित हो सकती है। इन समस्याओं के साथ पोषक तत्वों का असंतुलन और प्रदूषण दबाव को और बढ़ा सकते हैं।
एफएओ की रिपोर्ट सिर्फ़ चेतावनी नहीं देती, बल्कि यह भी बताती है कि समाधान मौजूद हैं। वैज्ञानिक जानकारी और मिट्टी से जुड़े आँकड़ों को समझने की क्षमता पहले से बेहतर हुई है। अब ज़रूरत है कि ये समाधान रिपोर्टों और नीतियों तक सीमित न रहें, बल्कि किसान के खेत तक पहुँचें।
लेकिन जिस मिट्टी पर हमारी खेती और भोजन की व्यवस्था टिकी है, वही अब बढ़ते दबाव में है। एफएओ की नई वैश्विक रिपोर्ट ‘स्टेटस ऑफ द वर्ल्ड्स सॉइल रिसोर्सेज़ 2026’ के मुताबिक़, दुनिया के कई हिस्सों में मिट्टी का क्षरण जारी है, जबकि उसे बचाने वाले टिकाऊ तरीक़ों को अपनाने की रफ़्तार ज़रूरत के मुताबिक़ नहीं बढ़ी है। 2015 से 2025 के बीच के वैज्ञानिक शोध और 75 देशों की विशेषज्ञता पर आधारित इस आकलन में मिट्टी के कटाव को सबसे गंभीर ख़तरा बताया गया है। इसके साथ जैविक कार्बन की कमी, पोषक तत्वों का ग़लत प्रबंधन, जैव विविधता का नुकसान, लवणता, प्रदूषण और शहरीकरण के कारण मिट्टी के सील होने जैसी समस्याएँ भी सामने आई हैं।
मिट्टी की ऊपरी परत हट रही है, तो समझिए खेत की ताक़त भी जा रही है
खेत की मिट्टी के अंदर पूरी ‘ज़िंदगी’ काम करती है
उपाय मौजूद हैं, लेकिन अपनाने की रफ़्तार धीमी
खेती का तरीक़ा बदलना किसान के लिए सिर्फ़ इच्छा का सवाल नहीं है। इसमें लागत, जोखिम, जानकारी, बाज़ार और मौसम जैसे कई पहलू जुड़े होते हैं। इसलिए टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए केवल सलाह देना पर्याप्त नहीं होगा। एफएओ ने बेहतर प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, वित्तीय मदद, सुरक्षित भूमि अधिकार और बेहतर बाज़ार व्यवस्था की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। साथ ही मिट्टी से जुड़े क़ानून और नीतियों को मज़बूत करने, मिट्टी की निगरानी और डेटा व्यवस्था सुधारने तथा टिकाऊ प्रबंधन अपनाने वालों को प्रोत्साहन देने की सिफ़ारिश की है।
भारत में भी मिट्टी के भीतर की सेहत पर चिंता
मिट्टी की सेहत बिगड़ी तो असर घर तक पहुँचेगा
एफएओ की रिपोर्ट सिर्फ़ चेतावनी नहीं देती, बल्कि यह भी बताती है कि समाधान मौजूद हैं। वैज्ञानिक जानकारी और मिट्टी से जुड़े आँकड़ों को समझने की क्षमता पहले से बेहतर हुई है। अब ज़रूरत है कि ये समाधान रिपोर्टों और नीतियों तक सीमित न रहें, बल्कि किसान के खेत तक पहुँचें।