पश्चिम एशिया संकट से खाद आपूर्ति पर मंड़राया संकट! किसानों की लागत बढ़ने का डर, PAU के वैज्ञानिकों की चेतावनी

Gaon Connection | Apr 30, 2026, 11:39 IST
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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से भारत की उर्वरक आपूर्ति पर खतरा मंडरा रहा है। पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि आयातित उर्वरकों पर निर्भरता खरीफ सीजन में समस्या पैदा कर सकती है। किसानों को संतुलित खेती और जैविक खाद के इस्तेमाल की सलाह दी गई है। इससे लागत कम होगी और मिट्टी की सेहत सुधरेगी।
खाद आपूर्ति पर संकट
खाद आपूर्ति पर संकट
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के बीच पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU) के विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि भारत की आयातित उर्वरकों पर भारी निर्भरता खरीफ सीजन से पहले आपूर्ति पर दबाव पैदा कर सकती है। 'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में 31.68 लाख हेक्टेयर धान की खेती के लिए करीब 7.3 लाख टन यूरिया, DAP, MOP और LNG जैसे आयातित संसाधनों की जरूरत होती है, जिससे यह क्षेत्र खास तौर पर प्रभावित हो सकता है।

आयात पर निर्भरता बनी बड़ी चुनौती

PAU के मृदा विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. राजीव सिक्का और अनुसंधान निदेशक डॉ. एएस धत्त ने बताया कि भारत अभी भी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG), यूरिया, डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) और म्यूरिएट ऑफ पोटाश (MOP) जैसे उर्वरकों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। ऐसे में भू-राजनीतिक तनाव और कीमतों में उतार-चढ़ाव से कृषि क्षेत्र सीधे प्रभावित हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, उर्वरकों की आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकती है और किसानों की लागत बढ़ा सकती है।

असंतुलित खाद उपयोग से मिट्टी को नुकसान

विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में उर्वरकों का उपयोग अब भी नाइट्रोजन, खासकर यूरिया, पर अधिक निर्भर है, जिससे पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है और मिट्टी की सेहत पर दीर्घकालिक असर पड़ रहा है। PAU की सिफारिश के अनुसार धान के लिए प्रति एकड़ दो बोरी यूरिया पर्याप्त है, लेकिन किसान अक्सर तीन से चार बोरी तक इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे लागत और पर्यावरणीय बोझ दोनों बढ़ रहे हैं।

विकल्प अपनाने और संतुलित खेती की सलाह

वैज्ञानिकों ने रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए संतुलित और जरूरत आधारित पोषण प्रबंधन अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि ग्रीष्मकालीन मूंग, माश और अन्य दलहनी फसलें कम नाइट्रोजन में भी अच्छी होती हैं और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं। इसके अलावा ढैंचा और सनहेम्प जैसी फसलों से ग्रीन मैन्योरिंग कर नाइट्रोजन की 50% जरूरत पूरी की जा सकती है। विशेषज्ञों ने खेत की खाद, कम्पोस्ट और फसल अवशेषों के उपयोग के साथ-साथ मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद डालने की सलाह दी है। साथ ही, खरीफ में जहां संभव हो DAP का उपयोग कम करने और रबी सीजन के लिए बचाने को कहा गया है।

लंबी अवधि का समाधान: रासायनिक खाद पर निर्भरता घटाना

हालांकि सरकार ने पर्याप्त उर्वरक भंडार होने का भरोसा दिया है, लेकिन PAU विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान रासायनिक उर्वरकों, खासकर नाइट्रोजन आधारित खाद पर निर्भरता कम करने में ही है। इससे न केवल लागत कम होगी, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता और कृषि की स्थिरता भी बेहतर हो सकेगी।
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