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कहीं आपकी गेहूं की फ़सल में भी तो नहीं फैल रहा रतुआ रोग, समय रहते करें प्रबंधन

Gaon Connection | Jan 17, 2026, 14:40 IST
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जनवरी-फरवरी के दौरान गेहूं की फसल पर रतुआ रोग का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। इसी को देखते हुए ICAR–भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान ने रबी 2025–26 के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है। विशेषज्ञों ने किसानों को नियमित निगरानी, समय पर फफूंदनाशी छिड़काव और संतुलित खेती अपनाने की सलाह दी है, ताकि उत्पादन में भारी नुकसान से बचा जा सके।
गेहूं में रतुआ रोग का खतरा बढ़ा: ICAR की चेतावनी और किसानों के लिए जरूरी बचाव उपाय।
जनवरी से मार्च का समय गेहूं की फसल के लिए सबसे संवेदनशील माना जाता है। इसी अवधि में तापमान, नमी और ओस की मौजूदगी रतुआ (Rust) रोग के फैलाव के लिए अनुकूल वातावरण बनाती है। इसी को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR), करनाल ने रबी मौसम 2025–26 के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है। इसमें किसानों को सतर्क रहने, नियमित निगरानी करने और समय पर नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी गई है।

रतुआ रोग कोई नया खतरा नहीं है, लेकिन जलवायु बदलाव के कारण अब यह तेजी से फैलने लगा है। हल्की सर्दी, ज्यादा ओस, कोहरा और अचानक तापमान बढ़ना, ये सभी परिस्थितियां रतुआ के बीजाणुओं को सक्रिय कर देती हैं। अगर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो यह रोग 30 से 50 प्रतिशत तक उपज घटा सकता है।

क्या है गेहूं का रतुआ रोग और क्यों खतरनाक है?

रतुआ एक फफूंद जनित रोग है, जो पत्तियों, तनों और बालियों पर पीले, भूरे या काले रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देता है। यह पौधे की भोजन बनाने की प्रक्रिया को कमजोर करता है, जिससे दाना ठीक से भर नहीं पाता। नतीजा यह होता है कि बालियां हल्की रह जाती हैं और उत्पादन घट जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में पीला रतुआ (Yellow Rust) और भूरा रतुआ (Brown Rust) सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। जनवरी–फरवरी में पीला रतुआ अधिक सक्रिय होता है, जबकि फरवरी–मार्च में भूरा रतुआ तेजी से फैल सकता है।

खेत की सफाई, संतुलित खाद प्रबंधन और सिंचाई का सही समय भी उतना ही जरूरी है।
खेत की सफाई, संतुलित खाद प्रबंधन और सिंचाई का सही समय भी उतना ही जरूरी है।


ICAR की सबसे बड़ी सलाह: नियमित निगरानी ज़रूरी

एडवाइजरी में सबसे ज्यादा जोर खेत की लगातार निगरानी पर दिया गया है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे सप्ताह में कम से कम दो बार अपनी फसल की जांच करें। सुबह के समय, जब ओस होती है, उस समय पत्तियों पर हल्के पीले या भूरे धब्बे दिखाई दें तो तुरंत सावधान हो जाएं।

किसानों को यह भी बताया गया है कि खेत के किनारों, निचली पत्तियों और घने हिस्सों में पहले रोग दिखाई देता है। इसलिए केवल ऊपर से देखने के बजाय पौधों के बीच जाकर निरीक्षण करना जरूरी है।

रोग दिखते ही देर न करें: तुरंत छिड़काव करें

ICAR की सलाह के अनुसार, जैसे ही रतुआ के लक्षण दिखें, उसी समय फफूंदनाशी दवाओं का छिड़काव करना सबसे प्रभावी तरीका है। अगर 40–45 दिन की फसल अवस्था में ही रोग पकड़ में आ जाए, तो नुकसान काफी हद तक रोका जा सकता है।

विशेषज्ञों ने कुछ प्रभावी दवाओं की सिफारिश की है, जैसे

•प्रोपिकोनाजोल 25 EC

•टेबुकोनाजोल 25 EC

•हेक्साकोनाजोल 5 EC

•ट्रायडेमेफॉन

इन दवाओं को निर्धारित मात्रा में 150 से 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। छिड़काव सुबह या शाम के समय करना बेहतर माना गया है, ताकि दवा पौधों पर ठीक से असर कर सके।

केवल दवा ही नहीं, खेत प्रबंधन भी जरूरी

रतुआ नियंत्रण केवल दवा से नहीं होता। एडवाइजरी में साफ कहा गया है कि खेत की सफाई, संतुलित खाद प्रबंधन और सिंचाई का सही समय भी उतना ही जरूरी है।

अधिक नाइट्रोजन खाद देने से पौधे बहुत कोमल हो जाते हैं, जिससे रोग जल्दी फैलता है। इसलिए किसानों को सलाह दी गई है कि संतुलित उर्वरक का प्रयोग करें और जरूरत से ज्यादा यूरिया न डालें।

सिंचाई करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि खेत में लंबे समय तक नमी न बनी रहे। अत्यधिक नमी रतुआ के लिए सबसे अनुकूल वातावरण बनाती है।

प्रतिरोधी किस्मों का महत्व

ICAR ने किसानों को यह भी सुझाव दिया है कि भविष्य में गेहूं की ऐसी किस्में अपनाएं जो रतुआ रोग के प्रति सहनशील या प्रतिरोधी हों। कई नए किस्में विकसित की गई हैं जो कम तापमान और बदलते मौसम में भी बेहतर प्रदर्शन करती हैं।

प्रतिरोधी किस्में अपनाने से किसानों का दवा पर खर्च कम होता है और उत्पादन अधिक सुरक्षित रहता है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में रतुआ का बढ़ता खतरा

विशेषज्ञ मानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में रतुआ के प्रकोप की तीव्रता बढ़ने का बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। सर्दियों का छोटा होना, अचानक गर्मी आना और कोहरे की बढ़ती अवधि ये सभी रतुआ के जीवन चक्र को तेज कर रहे हैं।

यही वजह है कि अब वैज्ञानिक केवल इलाज नहीं, बल्कि “अर्ली वार्निंग सिस्टम” और निगरानी नेटवर्क पर जोर दे रहे हैं। कई राज्यों में खेत स्तर पर निगरानी टीमें बनाई जा रही हैं ताकि शुरुआती अवस्था में ही रोग की सूचना मिल सके।

किसानों के लिए सबसे जरूरी संदेश

ICAR की यह एडवाइजरी साफ संदेश देती है कि रतुआ को हल्के में लेना भारी नुकसान का कारण बन सकता है। अगर किसान समय पर निगरानी करें, सही दवा का सही मात्रा में छिड़काव करें और संतुलित खेती अपनाएं, तो इस बीमारी से फसल को काफी हद तक बचाया जा सकता है।

गेहूं देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है। करोड़ों किसानों की आमदनी इसी फसल पर निर्भर है। इसलिए रतुआ रोग से लड़ाई सिर्फ एक बीमारी से लड़ाई नहीं, बल्कि किसान की आजीविका और देश की खाद्य सुरक्षा की रक्षा भी है।

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