पहाड़ों से गायब हो रही बर्फ, हिमालय की बदलती सर्दी और किसानों का बढ़ता संकट
Divendra Singh | Jan 16, 2026, 13:58 IST
हिमालय की सर्दी बदल रही है। जहां कभी बर्फ की मोटी चादर ढकती थी, वहां अब सूखे पहाड़ और वीरान सेब बाग दिखाई दे रहे हैं। हिमाचल, कश्मीर और उत्तराखंड के किसान बर्फ की कमी, घटते चिलिंग ऑवर और पानी संकट से जूझ रहे हैं।
हर साल जनवरी-फरवरी का समय हिमालयी इलाकों में एक खास पहचान लेकर आता था। सेब के बागों पर जमी सफेद चादर, डालियों पर टिकी बर्फ और खेतों के चारों तरफ फैली ठंड की खामोशी। यही बर्फ इन इलाकों के किसानों के लिए केवल मौसम नहीं, बल्कि आने वाली फसल की गारंटी होती थी। लेकिन इस साल यह तस्वीर अचानक बदल गई है। सेब के बाग सूने हैं, पहाड़ भूरे और पथरीले दिख रहे हैं और किसानों की आँखों में अनिश्चितता साफ झलक रही है।
हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िले के रत्नारी गाँव के किसान अमन सिंह ठाकुर बताते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा सर्दी का मौसम पहले कभी नहीं देखा। वे कहते हैं, "हर साल इस समय तक पूरा इलाका बर्फ से ढक जाता था। सेब के पेड़ों की डालियां झुक जाती थीं और खेतों में मोटी परत जम जाती थी। लेकिन इस बार जनवरी बीतने को है और एक बार भी बर्फ नहीं गिरी।"
अमन बताते हैं कि सेब की फसल को “चिलिंग ऑवर” यानी एक निश्चित समय तक ठंड की जरूरत होती है। यही ठंड पेड़ को अगले मौसम में फूल और फल देने के लिए तैयार करती है। अगर यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई तो आने वाले सीजन में उत्पादन सीधे प्रभावित होगा।
अमन सिंह की चिंता अकेले उनकी नहीं है। हिमाचल, कश्मीर और उत्तराखंड के हजारों किसान इस सर्दी खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। पहाड़ों में रहने वाले किसान मौसम को कैलेंडर से नहीं, बल्कि प्रकृति के संकेतों से समझते हैं। बर्फ गिरने का समय, ठंड की अवधि और पिघलने की रफ्तार, यही उनके कृषि चक्र की असली घड़ी होती है। लेकिन इस साल यह प्राकृतिक घड़ी जैसे रुक गई है।
शिमला से लगभग 551 दूर जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। यहां के किसान सुहैब जॉन भट बताते हैं, "पहले इस समय तक आसपास की चोटियां पूरी तरह सफेद हो जाती थीं। दूर तक केवल बर्फ नजर आती थी। इस बार पहाड़ नंगे दिख रहे हैं।"
ये भी पढ़ें: हिमाचल में मौसम की बेरुखी, रबी सीज़न में सूखा बना किसानों की बड़ी परेशानी
"अगर बर्फ नहीं गिरी तो ठंड टिकेगी नहीं, और अगर ठंड नहीं रही तो सेब के पेड़ अपनी जैविक प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाएंगे। इसका सीधा असर फूलों की संख्या, फल के आकार और उत्पादन पर पड़ेगा, "सुहैब ने आगे कहा।
सुहैब को एक और डर सता रहा है पानी का संकट। वे बताते हैं कि बर्फ केवल ठंड नहीं देती, बल्कि धीरे-धीरे पिघलकर जमीन में नमी पहुंचाती है। यही नमी ग्राउंड वाटर को रिचार्ज करती है और गर्मियों में सिंचाई का आधार बनती है। अगर बर्फ नहीं गिरी तो आने वाले महीनों में खेतों को पानी देना और भी मुश्किल हो जाएगा।
पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी इलाकों में यह बदलाव लगातार तेज होता जा रहा है। वैज्ञानिक इसे “हाइड्रोलॉजिकल ड्रॉट” यानी बर्फ आधारित सूखा कह रहे हैं। इसका मतलब यह है कि बारिश भले कभी-कभी हो जाए, लेकिन बर्फ का वह भंडार नहीं बन रहा, जो नदियों और जल स्रोतों को साल भर जिंदा रखता था।
HKH स्नो अपडेट 2025 के अनुसार हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में मौसमी बर्फ का टिकाव सामान्य से 23.6 प्रतिशत कम दर्ज किया गया है। यह पिछले 23 वर्षों में सबसे निचला स्तर है। चिंता की बात यह है कि यह गिरावट लगातार तीसरे साल देखी जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग दो अरब लोगों की जल सुरक्षा इससे जुड़ी हुई है।
ICIMOD की रिपोर्ट बताती है कि इस पूरे क्षेत्र की 12 प्रमुख नदियों, जिनमें सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र शामिल हैं, के कुल वार्षिक जल प्रवाह का लगभग एक-चौथाई हिस्सा बर्फ के पिघलने से आता है। जब बर्फ कम होगी, तो नदियों का प्राकृतिक प्रवाह भी कमजोर होगा। इसका सीधा असर खेतों की सिंचाई, पीने के पानी और बिजली उत्पादन पर पड़ेगा।
हिमालयी राज्यों में सेब केवल एक फ़सल नहीं है। यह पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। हिमाचल और कश्मीर के हजारों परिवारों की साल भर की आमदनी इसी एक फसल पर टिकी होती है। सेब के मौसम में मजदूरी से लेकर ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग, कोल्ड स्टोरेज और मंडियों तक पूरा तंत्र चलता है। जब उत्पादन घटता है तो उसका असर केवल किसानों पर नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण बाजार पर पड़ता है।
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APEDA के आंकड़ें भी इस गिरावट की कहानी बयां करते हैं। साल 2022-23 में जम्मू-कश्मीर में करीब 21.46 लाख मीट्रिक टन और हिमाचल प्रदेश में लगभग 6.72 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन हुआ था। लेकिन 2023-24 में यह घटकर जम्मू-कश्मीर में 20.64 लाख और हिमाचल में केवल 5.06 लाख मीट्रिक टन रह गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह गिरावट सीधे तौर पर बदलते मौसम से जुड़ी है।
सेब जैसे शीतोष्ण फलों को सर्दियों में एक निश्चित समय तक ठंड की जरूरत होती है। यही ठंड पेड़ को आराम की अवस्था में भेजती है और वसंत में नए फूल और फल बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। जब यह चक्र टूटता है तो फूल कम आते हैं, फल छोटे रह जाते हैं और गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है। यह नुकसान केवल उत्पादन का नहीं होता, बल्कि किसानों की साल भर की कमाई को हिला देता है।
बर्फ और बारिश की कमी का असर केवल बागवानी तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के भुयांसारी गांव के किसान विमल नौटियाल बताते हैं, "हम बारिश का इंतजार करते रहे ताकि गेहूं की बुवाई कर सकें। लेकिन जब लंबे समय तक बारिश नहीं हुई तो मजबूरी में सूखी जमीन में बीज डाल दिए।" उन्हें उम्मीद थी कि शायद कुछ नमी मिल जाए, लेकिन बीज अंकुरित ही नहीं हो पाए। पूरा खेत सूखा पड़ा है।
विमल आगे बताते हैं, "पहाड़ों की खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर होती है। यहां नहरों का जाल नहीं है। जब आसमान रूठता है तो किसान के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। इस बार न सिर्फ बर्फ नहीं गिरी, बल्कि सर्दियों की बारिश भी लगभग गायब रही।"
मौसम विभाग के आंकड़े इस बदलाव को साफ दिखाते हैं। साल 2021 में हिमालयी इलाकों में सर्दियों के दौरान 3 से 4 फीट तक बर्फबारी दर्ज की गई थी। 2022 में यह घटकर 1 से 2 फीट रह गई। 2023 से 2025 के बीच बर्फबारी सिमटकर केवल 3 इंच से 1 इंच तक पहुंच गई। और 2026 के मौजूदा सीजन में कई इलाकों में अब तक शून्य बर्फबारी दर्ज हुई है।
बारिश का हाल भी कुछ ऐसा ही है। 2021 की सर्दियों में जहाँ लगभग 182 मिमी बारिश हुई थी, वहीं 2024 में यह घटकर 12 मिमी और 2025 में केवल 4 मिमी रह गई। 2026 के मौजूदा मौसम में कई जगहों पर अब तक एक बूंद भी दर्ज नहीं हुई है।
IMD देहरादून के मौसम वैज्ञानिक डॉ. चंदेर सिंह तोमर बताते हैं, "सर्दियों की बारिश और बर्फबारी पश्चिमी विक्षोभ यानी वेस्टर्न डिस्टरबेंस पर निर्भर करती है। पहले दिसंबर के अंत से ही सक्रिय सिस्टम आने लगते थे, लेकिन अब इनकी आवृत्ति और तीव्रता दोनों कम हो गई हैं। बर्फबारी की शुरुआत 30 से 40 दिन तक खिसक चुकी है। पहले एक सीजन में चार से छह मजबूत सिस्टम आते थे, अब यह संख्या घटकर दो से तीन रह गई है। इसका नतीजा यह है कि बर्फबारी में लगभग 70 प्रतिशत तक गिरावट देखी जा रही है।
हिमालय में कम बर्फ गिरने का असर केवल मौजूदा फसल तक सीमित नहीं है। इससे ग्लेशियरों का संतुलन भी बिगड़ रहा है। जब नई बर्फ जमा नहीं होती और पुरानी बर्फ तेजी से पिघलती है, तो ग्लेशियर सिकुड़ने लगते हैं। इसका असर आने वाले वर्षों में नदियों के स्थायी जल स्रोतों पर पड़ेगा। गंगा, यमुना, चिनाब और झेलम जैसी नदियां धीरे-धीरे कमजोर हो सकती हैं।
इस पूरे संकट का सबसे बड़ा भार उन किसानों पर पड़ रहा है, जिनकी जिंदगी पहाड़ों से जुड़ी है। वे न तो मौसम बदल सकते हैं और न ही अपने खेत कहीं और ले जा सकते हैं। उनके पास केवल उम्मीद बचती है कि शायद अगला मौसम कुछ राहत लेकर आए।
लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अब यह संकट अस्थायी नहीं रहा। यह जलवायु परिवर्तन का स्थायी संकेत बनता जा रहा है। हिमालय की बदलती सर्दी केवल बर्फ की कमी की कहानी नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में पानी, खेती और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
आज जब पहाड़ों से बर्फ गायब हो रही है, तब यह सिर्फ एक प्राकृतिक दृश्य का नुकसान नहीं है। यह उन लाखों किसानों की आजीविका, करोड़ों लोगों के पानी और पूरे क्षेत्र की भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा सवाल बन चुका है।
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हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िले के रत्नारी गाँव के किसान अमन सिंह ठाकुर बताते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा सर्दी का मौसम पहले कभी नहीं देखा। वे कहते हैं, "हर साल इस समय तक पूरा इलाका बर्फ से ढक जाता था। सेब के पेड़ों की डालियां झुक जाती थीं और खेतों में मोटी परत जम जाती थी। लेकिन इस बार जनवरी बीतने को है और एक बार भी बर्फ नहीं गिरी।"
अमन बताते हैं कि सेब की फसल को “चिलिंग ऑवर” यानी एक निश्चित समय तक ठंड की जरूरत होती है। यही ठंड पेड़ को अगले मौसम में फूल और फल देने के लिए तैयार करती है। अगर यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई तो आने वाले सीजन में उत्पादन सीधे प्रभावित होगा।
अमन सिंह की चिंता अकेले उनकी नहीं है। हिमाचल, कश्मीर और उत्तराखंड के हजारों किसान इस सर्दी खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। पहाड़ों में रहने वाले किसान मौसम को कैलेंडर से नहीं, बल्कि प्रकृति के संकेतों से समझते हैं। बर्फ गिरने का समय, ठंड की अवधि और पिघलने की रफ्तार, यही उनके कृषि चक्र की असली घड़ी होती है। लेकिन इस साल यह प्राकृतिक घड़ी जैसे रुक गई है।
शिमला से लगभग 551 दूर जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। यहां के किसान सुहैब जॉन भट बताते हैं, "पहले इस समय तक आसपास की चोटियां पूरी तरह सफेद हो जाती थीं। दूर तक केवल बर्फ नजर आती थी। इस बार पहाड़ नंगे दिख रहे हैं।"
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"अगर बर्फ नहीं गिरी तो ठंड टिकेगी नहीं, और अगर ठंड नहीं रही तो सेब के पेड़ अपनी जैविक प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाएंगे। इसका सीधा असर फूलों की संख्या, फल के आकार और उत्पादन पर पड़ेगा, "सुहैब ने आगे कहा।
सुहैब को एक और डर सता रहा है पानी का संकट। वे बताते हैं कि बर्फ केवल ठंड नहीं देती, बल्कि धीरे-धीरे पिघलकर जमीन में नमी पहुंचाती है। यही नमी ग्राउंड वाटर को रिचार्ज करती है और गर्मियों में सिंचाई का आधार बनती है। अगर बर्फ नहीं गिरी तो आने वाले महीनों में खेतों को पानी देना और भी मुश्किल हो जाएगा।
पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी इलाकों में यह बदलाव लगातार तेज होता जा रहा है। वैज्ञानिक इसे “हाइड्रोलॉजिकल ड्रॉट” यानी बर्फ आधारित सूखा कह रहे हैं। इसका मतलब यह है कि बारिश भले कभी-कभी हो जाए, लेकिन बर्फ का वह भंडार नहीं बन रहा, जो नदियों और जल स्रोतों को साल भर जिंदा रखता था।
HKH स्नो अपडेट 2025 के अनुसार हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में मौसमी बर्फ का टिकाव सामान्य से 23.6 प्रतिशत कम दर्ज किया गया है। यह पिछले 23 वर्षों में सबसे निचला स्तर है। चिंता की बात यह है कि यह गिरावट लगातार तीसरे साल देखी जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग दो अरब लोगों की जल सुरक्षा इससे जुड़ी हुई है।
नवंबर 2024 से मार्च 2025 के बीच बर्फ की स्थिति में बदलाव (2003–2024 के पुराने आंकड़ों की तुलना में)। Credit: HKH Snow Update 2025
ICIMOD की रिपोर्ट बताती है कि इस पूरे क्षेत्र की 12 प्रमुख नदियों, जिनमें सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र शामिल हैं, के कुल वार्षिक जल प्रवाह का लगभग एक-चौथाई हिस्सा बर्फ के पिघलने से आता है। जब बर्फ कम होगी, तो नदियों का प्राकृतिक प्रवाह भी कमजोर होगा। इसका सीधा असर खेतों की सिंचाई, पीने के पानी और बिजली उत्पादन पर पड़ेगा।
हिमालयी राज्यों में सेब केवल एक फ़सल नहीं है। यह पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। हिमाचल और कश्मीर के हजारों परिवारों की साल भर की आमदनी इसी एक फसल पर टिकी होती है। सेब के मौसम में मजदूरी से लेकर ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग, कोल्ड स्टोरेज और मंडियों तक पूरा तंत्र चलता है। जब उत्पादन घटता है तो उसका असर केवल किसानों पर नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण बाजार पर पड़ता है।
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APEDA के आंकड़ें भी इस गिरावट की कहानी बयां करते हैं। साल 2022-23 में जम्मू-कश्मीर में करीब 21.46 लाख मीट्रिक टन और हिमाचल प्रदेश में लगभग 6.72 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन हुआ था। लेकिन 2023-24 में यह घटकर जम्मू-कश्मीर में 20.64 लाख और हिमाचल में केवल 5.06 लाख मीट्रिक टन रह गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह गिरावट सीधे तौर पर बदलते मौसम से जुड़ी है।
सेब जैसे शीतोष्ण फलों को सर्दियों में एक निश्चित समय तक ठंड की जरूरत होती है। यही ठंड पेड़ को आराम की अवस्था में भेजती है और वसंत में नए फूल और फल बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। जब यह चक्र टूटता है तो फूल कम आते हैं, फल छोटे रह जाते हैं और गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है। यह नुकसान केवल उत्पादन का नहीं होता, बल्कि किसानों की साल भर की कमाई को हिला देता है।
बर्फ और बारिश की कमी का असर केवल बागवानी तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के भुयांसारी गांव के किसान विमल नौटियाल बताते हैं, "हम बारिश का इंतजार करते रहे ताकि गेहूं की बुवाई कर सकें। लेकिन जब लंबे समय तक बारिश नहीं हुई तो मजबूरी में सूखी जमीन में बीज डाल दिए।" उन्हें उम्मीद थी कि शायद कुछ नमी मिल जाए, लेकिन बीज अंकुरित ही नहीं हो पाए। पूरा खेत सूखा पड़ा है।
उत्तराखंड में बारिश न होने से सूखे पड़े खेत। फोटो: विमल नौटियाल
विमल आगे बताते हैं, "पहाड़ों की खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर होती है। यहां नहरों का जाल नहीं है। जब आसमान रूठता है तो किसान के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। इस बार न सिर्फ बर्फ नहीं गिरी, बल्कि सर्दियों की बारिश भी लगभग गायब रही।"
मौसम विभाग के आंकड़े इस बदलाव को साफ दिखाते हैं। साल 2021 में हिमालयी इलाकों में सर्दियों के दौरान 3 से 4 फीट तक बर्फबारी दर्ज की गई थी। 2022 में यह घटकर 1 से 2 फीट रह गई। 2023 से 2025 के बीच बर्फबारी सिमटकर केवल 3 इंच से 1 इंच तक पहुंच गई। और 2026 के मौजूदा सीजन में कई इलाकों में अब तक शून्य बर्फबारी दर्ज हुई है।
बारिश का हाल भी कुछ ऐसा ही है। 2021 की सर्दियों में जहाँ लगभग 182 मिमी बारिश हुई थी, वहीं 2024 में यह घटकर 12 मिमी और 2025 में केवल 4 मिमी रह गई। 2026 के मौजूदा मौसम में कई जगहों पर अब तक एक बूंद भी दर्ज नहीं हुई है।
IMD देहरादून के मौसम वैज्ञानिक डॉ. चंदेर सिंह तोमर बताते हैं, "सर्दियों की बारिश और बर्फबारी पश्चिमी विक्षोभ यानी वेस्टर्न डिस्टरबेंस पर निर्भर करती है। पहले दिसंबर के अंत से ही सक्रिय सिस्टम आने लगते थे, लेकिन अब इनकी आवृत्ति और तीव्रता दोनों कम हो गई हैं। बर्फबारी की शुरुआत 30 से 40 दिन तक खिसक चुकी है। पहले एक सीजन में चार से छह मजबूत सिस्टम आते थे, अब यह संख्या घटकर दो से तीन रह गई है। इसका नतीजा यह है कि बर्फबारी में लगभग 70 प्रतिशत तक गिरावट देखी जा रही है।
हिमालय में कम बर्फ गिरने का असर केवल मौजूदा फसल तक सीमित नहीं है। इससे ग्लेशियरों का संतुलन भी बिगड़ रहा है। जब नई बर्फ जमा नहीं होती और पुरानी बर्फ तेजी से पिघलती है, तो ग्लेशियर सिकुड़ने लगते हैं। इसका असर आने वाले वर्षों में नदियों के स्थायी जल स्रोतों पर पड़ेगा। गंगा, यमुना, चिनाब और झेलम जैसी नदियां धीरे-धीरे कमजोर हो सकती हैं।
इस पूरे संकट का सबसे बड़ा भार उन किसानों पर पड़ रहा है, जिनकी जिंदगी पहाड़ों से जुड़ी है। वे न तो मौसम बदल सकते हैं और न ही अपने खेत कहीं और ले जा सकते हैं। उनके पास केवल उम्मीद बचती है कि शायद अगला मौसम कुछ राहत लेकर आए।
लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अब यह संकट अस्थायी नहीं रहा। यह जलवायु परिवर्तन का स्थायी संकेत बनता जा रहा है। हिमालय की बदलती सर्दी केवल बर्फ की कमी की कहानी नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में पानी, खेती और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
आज जब पहाड़ों से बर्फ गायब हो रही है, तब यह सिर्फ एक प्राकृतिक दृश्य का नुकसान नहीं है। यह उन लाखों किसानों की आजीविका, करोड़ों लोगों के पानी और पूरे क्षेत्र की भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा सवाल बन चुका है।
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