श्रीविधि से धान की खेती से कम लागत में ज्यादा मुनाफा

श्रीविधि से धान की खेती से कम लागत में ज्यादा मुनाफागाँव कनेक्शन

लखनऊ। धान की नर्सरी के लिए ये सही समय है। इस समय किसान उन्नत तकनीक को अपना कर कम बीज में नर्सरी तैयार कर सकते हैं। किसान को चाहिए कि मानसून आने तक खेत में धान की रोपाई हो जाए, जिससे बारिश का पूरा लाभ मिल सके। गोरखपुर कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. संजीव कुमार बताते हैं, “मई के आखिरी हफ्ते से ही धान की नर्सरी की तैयारी शुरु कर देनी चाहिए।”

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नर्सरी की नई विधियों से कम बीज में ज्यादा उपज पाई जा सकती है। इसके लिए किसानों को अभी से ही तैयारी शुरु कर देनी चाहिए।” वो आगे बताते हैं, “श्रीविधि से किसानों को कई लाभ मिलते हैं, बीज कम लगते हैं, एक एकड़ में दो किलो ही बीज लगता है और पानी भी कम लगता है। इस विधि में मजदूर भी कम लगते हैं। परंपरागत तरीके की अपेक्षा खाद एवं दवा कम लगती है, प्रति पौधे कल्ले की संख्या और बालियों में दानों की संख्या ज्यादा होती है, दानों का वजन और उपज दो गुना ज्यादा होती है।”

श्रीविधि से यूपी के फैजाबाद में लहलहाई गई फसल। फाइल फोटो

श्री विधि से धान की नर्सरी तैयार करने का तरीका

बीजोपचार विधि: एक एकड़ जमीन के लिए दो किलोग्राम बीज लें। तैरते हुए बीजों को निकाल कर फेंक दें क्योंकि वो खराब हैं। स्वस्थ बीजों से नमक को हटाने के लिए साफ पानी से धोएं। कार्बेन्डाजाईम से बीज को उपचारित करें।

नर्सरी की तैयारी: जमीन से चार इंच ऊंची नर्सरी तैयार करें, जिसके चारों ओर नाली हो। नर्सरी में गोबर की खाद अथवा केंचुआ खाद डाल कर भुरभुरा बनाएं। नर्सरी की सिंचाई करें। सिंचाई के बाद उनमें बीज का छिड़काव करें।खेती की तैयारी: खेती की तैयारी परंपरागत तरीके से की जाती है, केवल इतना ध्यान रखा जाता है कि ज़मीन समतल हो। पौध रोपण के 12 से 24 घंटे पूर्व खेत की तैयारी करके एक से तीन सेमी से ज्यादा पानी खेत में नहीं रखा जाता है। पौधा रोपण से पहले खेत में 10 गुणा 10 इंच की दूरी पर निशान लगाया जाता है। पौधे के बीच उचित लाइन बना ली जाती है। इससे निशान बनाने में आसानी होती है। निशान लगाने का काम पौधा रोपण से छह घंटे पूर्व किया जाता है।

नर्सरी में पौधा उठाने का तरीका

इसके तहत 15 दिनों के पौधे को रोपा जाता है, जब पौधे में दो पत्तियां निकल आती हैं। नर्सरी से पौधों को निकालते समय इस बात की सावधानी रखी जाती है कि पौधों के तने व जड़ के साथ लगा बीज न टूटे व एक-एक पौधा आसानी से अलग करना चाहिए और पौधे को एक घंटे के अंदर लगाना चाहिए।

खेत में रोपाई करना: पौधा रोपण के समय हाथ के अंगूठे एवं वर्तनी अंगुली का प्रयोग किया जाता है। खेत में डाले गए निशान की प्रत्येक चौकड़ी पर एक पौधा रोपा जाता है। नर्सरी से निकाले पौधे की मिट्टी धोए बिना लगाएं और धान के बीज सहित पौधे को ज्यादा गहराई पर रोपण नहीं किया जाता है।

खरपतवार का नियंत्रण : इस विधि में खरपतवार नियंत्रण के लिए हाथ से चलाए जाने वाले वीडर का इस्तेमाल किया जाता है। वीडर चलने से खेत की मिट्टी हल्की हो जाती है और उसमें हवा का आवागमन ज्यादा हो जाता है। इसके अतिरिक्त खेतों में पानी न भरने देने की स्थिति में खरपतवार उगने को उपयुक्त वातावरण मिलता है।

सिंचाई एवं जल प्रबंधन

इस विधि में खेत में पौध रोपण के बाद इतनी ही सिंचाई की जाती है जिससे पौधों में नमी बनी रहे। परंपरागत विधि की तरह खेत में पानी भर कर रखने की आवश्यकता नहीं होती है।

रोग व कीट प्रबंधन

इस विधि में रोग और कीटों का प्रकोप कम होता है, क्योंकि एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी ज्यादा होती है। जैविक खाद का उपयोग भी इसमें सहायक है। कई प्राकृतिक तरीके और जैविक कीटनाशक भी कीट प्रबंधन के लिए उपयोग किए जाते हैं।

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