इस समय आलू की फसल में लग सकता है झुलसा रोग, ऐसे करें प्रबंधन

इस समय आलू की फसल में लग सकता है झुलसा रोग, ऐसे करें प्रबंधन

लखनऊ। तापमान गिरने और लगातार मौसम में बदलाव से इस समय आलू की फसल में कई तरह के लोग लग जाते हैं, अगर समय रहते इनका प्रबंधन न किया गया तो आलू किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

इस बारे में केंद्रीय आलू अनुसंधान केन्द्र, मोदी पुरम के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. अनुज भटनागर बताते हैं, "अभी तो आलू की फसल में कोई रोग लगने की जानकारी नहीं आयी है, लेकिन आने वाले समय में रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन बादल होने पर आलू की फसल में फंगस का इंफेक्शन होने की संभावना बढ़ जाती है, जो झुलसा रोग का प्रमुख कारण होता है। जैसे ही बादल आए तुरंत दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।"


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वो आगे बताते हैं, "इस समय किसानों को चाहिए कि खेत में नमी बनाए रखें और शाम के समय अगर कहीं पर कोहरा दिखायी दे तो शाम के समय घास-फूस इकट्ठा करके आग चलाकर धुआ करना चाहिए।"

इस समय भारत दुनिया में आलू के रकबे के आधार पर चौथे और उत्पादन के आधार पर पांचवें स्थान पर है। आलू की फसल को झुलसा रोगों से सब से ज्यादा नुकसान होता है।

झुलसा रोग दो तरह के होते हैं, अगेती झुलसा और पछेती झुलसा। अगेती झुलसा दिसंबर महीने की शुरुआत में लगता है, जबकि पछेती झुलसा दिसंबर के अंत से जनवरी के शुरूआत में लग सकता है। इस समय आलू की फसल में पछेती झुलसा रोग लग सकता है।

अगेती झुलसा में पत्तियों की सतह पर छोटे-छोटे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं, जिनमें बाद में चक्रदार रेखाएं दिखाई देती है। रोग के प्रभाव से आलू छोटे व कम बनते हैं।

पछेती झुलसा आलू के लिए ज्यादा नुकसानदायक होता है। वातावरण में बदलाव से होने वाले रोग के कारण चार से छह दिन में ही फसल बिल्कुल नष्ट हो जाती है। बीमारी में पत्तों के ऊपर काले-काले चकत्तों के रूप दिखाई देते हैं जो बाद में बढ़ जाते हैं।

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झारखंड, हरियाणा, कर्नाटक, आसाम, पंजाब, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश प्रमुख आलू उत्पादक राज्य हैं।

कृषि विज्ञान केन्द्र अमेठी के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रवि प्रकाश मौर्या बताते हैं, "आलू की फसल में पछेती झुलसा रोग लगने की सम्भावना ज्यादा रहती है। जिन्होंने फफूंदनाशक दवा का छिड़काव नहीं किया है या जिन खेतों में झुलसा बीमारी नहीं हुई है, उन सभी को सलाह है कि मैंकोजेब युक्त फफूंदनाशक 0.2 प्रतिशत की दर से यानि दो किग्रा. दवा 1000 लीटर पानी में एक हेक्टेयर के हिसाब छिड़काव करें।

जिन खेतों में बीमारी के लक्षण दिखने लगे हों उनमें साइमोइक्सेनील मैनकोजेब का 03 किग्रा 1000 लीटर में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। इसी प्रकार फेनोमेडोन मैनकोजेब 03 किग्रा 1000 लीटर में घोलकर एक हेक्टेयर पर छिड़काव करना है अथवा डाई मेथामार्फ एक किग्रा मैनकोजेब दो किग्रा 1000 लीटर में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी जाती है। बार-बार फफूदनाशक का छिड़काव न करें।



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आलू की फसल के प्रमुख कीट और उसका नियंत्रण

चेंपा-कीट के प्रौढ़ व बच्चे दोनों की पत्तों से रस चूसकर व विषाणु रोग फैला कर हानि पहुंचाते हैं। पत्ते पीले होकर मुड़ जाते हैं।

हरा तेला-आलू का यह मुख्य कीट है। कीट के हरे रंग के शिशु व प्रौढ़ कोमल पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं। पत्तियां पीली पड़कर मुड़ जाती हैं और अंत में किनारों से सूख जाती हैं। फसल बौनी रह जाती है तथा जली हुई दिखाई देती है।

रोकथाम-चेंपा व हरा तेला की रोकथाम के लिए 300 मिली. डाइमेथोएट (रोगोर) 30 ईसी या आक्सीडिमेटान मिथाइल (मैटासिस्टाक्स) 25 ईसी को 200-300 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार दूसरा छिड़काव 10-12 दिन के अंतर पर करें।

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