प्याज के बाद अब दाल की कीमतों ने बिगाड़ा बजट, उधर सरकार की दाल आयात नीति के खिलाफ खड़े हुए कई देश

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   15 Nov 2019 10:45 AM GMT

प्याज के बाद अब दाल की कीमतों ने बिगाड़ा बजट, उधर सरकार की दाल आयात नीति के खिलाफ खड़े हुए कई देश

प्याज, टमाटर के बाद अब दाल की कीमतें आसमान छू रही हैं। 15 नवंबर तक दाल की कीमतों में 10 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। थोक बाजार में एक किलो अरहर दाल (तुअर दाल) की कीमत 100 रुपए तो उड़द दाल की कीमत 140 रुपए प्रति किलो के ऊपर पहुंच चुकी है। इस बढ़ती कीमत को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने तुअर दाल के आयात की समय सीमा तो बढ़ाई है लेकिन कई देश सरकार की दाल आयात नीति का विरोध भी कर रहे हैं।

केंद्र सरकार ने तुअर दाल आयात करने की समस सीमा 31 अक्टूबर तक की थी जिसे फिर बढ़ाकर 15 नवंबर तक कर दिया। सरकार ने पहले सभी व्यापारियों को आदेश दिया था कि वे विदेशों से अक्टूबर तक ही दाल देश में लाएं। सरकार अब खुद दाल नहीं खरीदती। दाल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी को देखते हुए आयात की समय सीमा बढ़ा दी गई। हालांकि ऑल इंडिया दाल मिल एसोसिएशन का कहना है कि समय सीमा 31 दिसंबर तक होनी चाहिए।

एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल कहते हैं, " दाल की कीमतें पिछले एक महीने में 10 फीसदी तक बढ़ी हैं। दिल्ली में तुअर दाल की कीमत 100 रुपए के ऊपर हो गई है। ऊधर पंजाब, कोलकाता अरै मुंबई में भी खुदरा कीमत 100 से 102 रुपए तक पहुंच गई है। ऐसे में हो सकता है कि आयात सीमा बढ़ाये जाने से कीमतों में कमी आये।"

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पिछले एक महीने के दौरान तुअर दाल के अलावा चना, उड़द, मूंग और मसूर जैसी दालों की कीमतें 5-10 फीसदी तक बढ़ गई हैं। सरकार ने अरहर दाल के आयात के लिए 4 लाख टन (40 लाख कुंतल) और मूंग और उड़द की दाल की दाल के आयात के लिए 1.5-1.5 लाख टन (15-15 लाख कुंतल) का कोटा आवंटित किया था। इसके अलावा भारत और मोजांबिक के बीच हुए एक समझौते के तहत 1.75 लाख टन अतिरिक्त अरहर मोजांबिक से आएगी।

मध्य प्रदेश इंदौर के दाल व्यापारी राजेश सिंघल कहते हैं, " दाल की कीमतें अभी और बढ़ेंगी। मध्य प्रदेश सहित कई दूसरे प्रदेशों में भारी बारिश की वजह से दाल की फसल प्रभावित हुई है। ऐसे में ऐसी उम्मीद कम है कि आयात सीमा बढ़ाने से दाल की कीमत बढ़ेगी।"

मध्य प्रदेश में लगातार 40 दिनों तक हुई बारिश के बाद उड़द और मूंग की फसल पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी है। महाराष्ट्र तुअर दाल का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। वहां भी पिछले महीने से बारिश हो रही है।

कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट की मानें तो फसल सीजन 2018-19 (जुलाई से जून) में दालों की कुल पैदावार 234 लाख टन (2340 कुंतल) हुई थी। जबकि खपत 240 लाख टन से ज्यादा रही। मौजूदा खरीफ सीजन की बात करें तो सरकार ने अनुमान जताया है कि वर्ष 2019-20 में दाल की पैदावार 82.2 लाख टन (822 कुंतल) होगी ये वर्ष 2018 में हुई 92.2 लाख टन (922 कुंतल) की अपेक्षा कम है।

दिल्ली की सबसे बड़ी अनाज मंडी नया बाजार के दाल व्यापारी नरेंद्र गुप्ता बताते हैं, " एक हफ्ते पहले जिस उड़द दाल की कीमत 115 रुपए थी वो अब 140 रुपए प्रति किलो पहुंच गई है। काली उड़द 95 से 125 से तुअर दाल 100 रुपए है।" यह थोक बाजार की कीमत है।

दाल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं, इस बारे में वे बताते हैं, " सरकार पे बाहर से आने वाली दालों पर रोक लगा रखी है। दालों का आयात न के बराबर हो रहा है जबकि खपत बढ़ती जा रही है। इस बार कुछ पैदावार भी घटी है। ऐसे में दाल की कीमत और बढ़ेगी ही।

आयात नीति के खिलाफ डब्ल्यूटीओ से शिकायत

वर्ष 2015 में तुअर दाल की कीमत 200 रुपए किलो तक पहुंच गई थी। हंगामे के बीच सरकार को दुनिया भर से दालें मंगवानी पड़ी थीं। कीमतों पर काबू पाने के लिए और आगे स्थिति अनियंत्रित न हो, इसके लिए 20 लाख टन दाल का बफर स्टॉक बनाने का फैसला किया गया था। इसके बाद से दालों के उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुई। फिर सरकार ने कुछ दालों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया या और कुछ पर आयात शुल्क बढ़ा दिया। इस समय चना पर 60 फीसदी जबकि मसूर पर 30 फीसदी आयात शुल्क लागू है जिससे इन दोनों दलहनों के आयात में पिछले कुछ वर्षों कमी आई है।

इस बारे में इंडिया पल्सेज एंड ग्रेंस एसोसिऐशन के उपाध्यक्ष विमल कोठारी बताते हैं, " कई ऐसे देश हैं जो भारत को निर्यात करने के लिए दालों की खेती करते हैं। ऐसे में अब भारत की आयात नीति से उन्हें नुकसान हो रहा है। अब म्यांमार को देख लीजिए, वहां से हम उड़द खरीदते हैं जो पूरी तरह से बैन किया जा चुका है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया की दाल की खेती भारत पर निर्भर है। ऐसे में इन देशों ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत की शिकायत की है। कनाडा, आस्ट्रेलिया, रूस और अमेरिका इस पर बात करना चाहते हैं।"

डब्ल्यूटीओ में शिकायत कॉपी

एपीडा की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013-14 में भारत ने 3.4 मिलियन टन दालों का आयात किया था। वर्ष 2014-15 में इसमें बढ़ोतरी हुई और कुल आयात 4.4 मिलियन टन हुआ। वर्ष 2015-16 में 5.6 मिलियन टन, 2016-17 में 6.3 मिलियन टन दाल आयात हुआ। फिर वर्ष 2017-18 में इसमें थोड़ी कमी आई और यह 5.4 मिलियन टन पर आ गया। वर्ष 2018-19 में दालों का आयात पिछले साल की अपेक्षा आधी हो गई और यह 2.4 मिलियन टन पर आ गया। वर्ष 2019-20 में दालों का आयात अभी तक 1.1 मिलियन टन तक हो चुका है। इस साल बारिश के कारण फसलें खराब हुई हैं, ऐसे में आयात और बढ़ सकता है।

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" पहले भारत 60 लाख टन से ज्यादा दालों का आयात करता था जोकि अब घटकर 15-20 लाख टन तक पहुंच गया है। इससे भारतीय किसानों को फायदा है। लेकिन इस साल बारिश के कारण दाल की फसलों को काफी नुकसान हुआ है। ऐसे में दालों का आयात बढ़ाना होगा।" विमल कोठारी आगे बताते हैं।

ऑल इंडिया दाल एसोसिएसन के अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल कहते हैं, " भारत में पिछले साल दाल का उत्पादन भले ही कम रहा लेकिन अब स्थिति बदली है। दालों का उत्पादन वर्ष 2014-15 में 171.5 लाख टन और 2015-16 में 163.2 लाख टन था। तब खपत के हिसाब पैदावार बहुत कम थी। इसीलिए उस समय तुअर दाल की कीमत 200 रुपए प्रति किलो से ज्यादा पहुंच गई थी। इसके बाद से वर्ष 2016-17 में 231 लाख टन जबकि 2017-18 में 254 लाख टन दालों का उत्पादन हुआ। ये आंकड़ें सरकार के हैं। ऐसे में जाहिर सी बात है कि जब हमारा उत्पादन बढ़ेगा तो बाहर से दाल क्यों मंगाएंगे।"

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