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आंध्र प्रदेश: कैंसर से नाना की मौत के बाद जैविक खेती करने वाले किसान का 'दर्द' लाखों किसान की कहानी है

आंध्र प्रदेश में जैविक खेती करने वाले एक किसान को अपने उत्पाद बेचने में दिक्कत आ रही है। गांव कनेक्शन किसान श्रीधर, जैविक उत्पादों और किसानों के लिए काम करने वाली संस्थाओं से बात कर ये जानने की कोशिश की समस्या कहां है? और कैसे श्रीधर को मार्केट मिल सकती है...

Arvind ShuklaArvind Shukla   2 May 2020 12:47 PM GMT

आंध्र प्रदेश: कैंसर से नाना की मौत के बाद जैविक खेती करने वाले किसान का

कॉरपोरेट की नौकरी छोड़कर अपने खेतों में जैविक खेती करने वाले दक्षिण भारत के किसान श्रीधर वेनीगल्ला बहुत परेशान हैं, क्योंकि उनकी मेहनत और खून-पसीने की कमाई का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा बिचौलिए ले जाते हैं। गाय आधारित खेती करने वाले श्रीधर ऐसी राह बनाना चाहते हैं जो पढ़े लिखे युवाओं के लिए एक मॉडल बन सके जो उच्च शिक्षित होने के बावजूद खेती करना चाहते हैं।

"मेरा गांव कावेरी नदी के इलाके में हैं। मिट्टी इनती उपजाऊ है कि हर तरह की खेती होती है, लेकिन ज्यादातर किसान रासायनिक खेती करते हैं। मैंने 5 साल पहले बिना किसी रासायनिक खाद, कीट और खरपतावार नाशक के खेती शुरू की, खेत में सब कुछ पैदा होता है लेकिन मुझे उसे बेचने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। मैं चाहता हूं कि कोई ऐसी राह निकले कि मुझे भी मुनाफा हो और मेरे जैसे दूसरे किसान इस तरह की खेती करें।" श्रीधर वेनीगल्ला फोन पर गांव कनेक्शन को बताते हैं।

15 साल कॉरपोरेट में नौकरी करने के बाद किसान बने श्रीधर वेनीगल्ला का गांव दोनेपुड़ी आंध्र प्रदेश में विजयवाड़ा से 50 किलोमीटर दूर गुंटूर जिले में कोल्लूर मंडल में आता है। ये इलाका कावेरी नदी की घाटी में पड़ता है। अपनी 18 एकड़ जमीन में श्रीधर धान, चना, धनिया, सरसों, केला, हल्दी, चना, मिर्च, मक्का, पॉपकॉर्न, ज्वार, और अदरक जैसी करीब दर्जन फसलें उगाते हैं। ये सारी फसलें वो गोबर, गोमूत्र और जैविक तरीकों जीवामृत, जैविक कीटनाशकों की मदद से उगाते हैं।

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आंध्र प्रदेश के किसान श्रीधर के खेत में बिकने के लिए तैयार ड्रम स्टिक (मोरिंगा की फलियां)।

लाखों की नौकरी छोड़कर खेत की राह पकड़ने वाले श्रीधर के किसान बनने की वजह भारत के करोड़ों लोगों की सेहत से जुड़ी है।

करीब 15 साल पहले में मेरे नाना की कैंसर से मौत हो गई। जिससे मैं बहुत दुख हुआ। नौकरी छोड़कर मैंने सिर्फ एक साल ये पता लगाने, पढऩे में बिताया कि उन्हें कैंसर कैसे हुआ, जिसकी एक वजह रायायनिक खेती और मिलावटी खाना नजर आई। जिसके बाद मैंने ये तय किया कि मैं ऐसी खेती करूंगा जिसमें ये चीजें हों ही नहीं। इसके कुछ साल बाद मैंने करीब शहर की नौकरी छोड़ खेती करने लौट आया।"

वो आगे बताते हैं, "मैंने कभी खेती नहीं की थी, और पेस्टीसाइड, हर्बी साइड (खरपतवारनासक जैसे ग्लाईफोसेट) डालना नहीं था तो मेरा बहुत पैसा खर्च हुआ। मोटे तौर पर कहूं तो मेरे करीब एक करोड़ रुपए खेती में इनवेस्ट हो चुके होंगे, लेकिन मैंने कीटनाशक को हाथ नहीं लगाया। हां ये भी है कि मेरे खेतों में जो पैदा होता है अब वो बिकने लगा है लेकिन मुझे उसका भाव काफी कम मिलता है।'

होटल मैनेजमेंट में डिग्री हासिल करने वाले श्रीधर ने खेती में पसीना तो बहाया ही खेती को समझने और नए आइडिया विकसित करने के लिए इंटरनेट की खाक छानी खूब पढ़ाई की। वो पद्मश्री सुभाष पालेकर की शून्य लागत प्राकृतिक खेती से प्रभावित हैं। अब वो खेतों में मल्च, इंटरक्रॉप, बहुफसली, जैसी खेती की पद्दियां अपना रहे हैं। जिससे लागत तो कम हुई लेकिन समस्या अभी बाजार है।

श्रीधर कहते हैं, "बीज बोने से लेकर उसके बेचने तक काम मुझे खुद को करना पड़ता है। आसपास के कई गांवों के किसान खुद मेरे यहां जैविक चीजें लेने आते हैं। मुझे अपने खेत की उपज बेचने में कई बार 6 महीने से सालभर तक लग जाते हैं। इसीलिए मैं चाहता हूं कि कोई ऐसी व्यवस्था बन जाए, कि मैं लोगों तक अपने जैविक, बिना मिलावट वाला खाद्य पादर्थ पहुंचा सकूं। अगर कोई राह दिखाते तो मैं एक प्रोसेसिंग यूनिट भी लगा सकता हूं लेकिन ये सब कैसे होगा मुझे कोई राह दिखाने वाला चाहिए।"

श्रीधर के मुताबिक उनके लगातार खेती में घाटा होते देख उनके देश विदेश में रहने वाले कई मित्रों ने आर्थिक मदद की पेशकश की लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं, क्योंकि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में वो एक आम किसान के लिए कृषि में मुनाफा वाले राह बनाने चाहते हैं।

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अपने खेत की जुताई करते किसान Sridhar Venigalla

किसान अपनी फसल के लिए कैसे अच्छे उपभोक्ता तलाशे, कैसे ऐसे किसान अपने लिए मार्केट तलाश करें, इन सवालों के लिए साथ गांव कनेक्शन ने हार्वेटिंग फार्मर नेटवर्क के फाउंडर और सीईओ रुचित गर्ग से बात की।

"जैसे किसान को उपभोक्ता की तलाश रहती है, वैसे ही ग्राहक और इससे जुड़े काम करने वाले लोगों को भी किसान की तलाश रहती है। लेकिन इन दिनों के बीच कोई संवाद नहीं है, कोई लिंक नहीं हैं। हर्वेटिंग फार्मर नेटवर्क यही करने की कोशिश कर रहा है। पिछले 2 वर्षों से ज्यादा समय में हमारे साथ 10 लाख किसान जुड़े हैं।" रुचित कहते हैं।

रुचित गर्ग लॉकडाउन के दौरान हजारों किसानों की मुफ्त में उनके उत्पाद बेचने में मदद कर रहे हैं।

श्रीधर को सलाह देते हुए रुचित कहते हैं, "वो पढ़े लिखे हैं, जैविक तरीकों से खेती कर रहे तो उनके लिए मार्केटिंग की बड़ी समस्या नहीं होनी चाहिए थी, उन्हें इंटरर्नेट पर ग्राहक तलासने चाहिए जो इन जैविक और मिलावट रहित आटा, दाल चावल और दूसरे उत्पादों के लिए ज्यादा दाम देने को तैयार हैं। लेकिन जरुरी है कि वो इस दौरान अपने जैविक खेतों के लिए सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया भी पूरा करवा लें, प्रमाणीकरण होने के बाद फसल बेचना काफी आसान हो जाता है।"

धान की नर्सरी।

पिछले कुछ वर्षों से लिविंग विदाउद मेडिसिन की मुहिम चला रही और 5000 से ज्यादा कृषि उद्ममियों ( agri entrepreneur) भूमिजा से जुड़ी गुरग्राम की गौरी सिरीन ऐसे किसानों को अपने आसपास के कस्बों, शहरों में ग्राहक तलासने की सलाह देती हैं।

"भारत में स्वस्थ जीवन शैली और खानपान को लेकर लोगों की रुझान तेजी से बढ़ा है। लोग अच्छे रेट पर उत्पाद खरीदने को तैयार हैं। लेकिन कई बार किसान ऐसे लोग तक नहीं पहुंच पाते जिसको उस सामान की जरुरत है, ऐसे में किसान को चाहिए वो अपने आसपास की कॉलोनियों में संगठनों, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिशन से बात कर वहां अपने उत्पाद पहुंचाएं, ऐसे कई उद्ममी भी हैं जो ऐसे किसानों से उत्पाद खरीदकर बाजार में बेचते हैं उनसे भी संपर्क किया जा सकता है।" गौरी आगे कहती हैं।

किसान श्रीधर के जैविक धान की फसल (फाइल फोटो) सभी फोटो साभार

किसान श्रीधर का संपर्क- 888651323

फार्मर हार्वेंस्टि नेटवर्क- 9501822210

गौरी सीरीन से यहां संपर्क करें- https://bhumijaa.org/bhumijaa-founder-team/



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