यूपी: गले की फांस बना हाइब्रिड धान, रिकवरी घटाने की मांग को लेकर मिलर्स ने बंद की कुटाई

उत्तर प्रदेश में धान खरीद की स्थिति बिगड़ती ही जा रही है। हाइब्रिड धान गले की फांस बन गया है। बढ़ते नुकसान के कारण प्रदेश के मिलर्स सरकारी धान की कुटाई नहीं कर रहे हैं तो इस कारण किसान मंडी में धान नहीं बेच पा रहे। ऐसे में सरकार के सामने खरीद लक्ष्य को पूरा करने की भी चुनौती है।

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   25 Nov 2018 4:51 AM GMT

लखनऊ। जिस हाइब्रिड धान की पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार प्रोत्साहन दे रही है, वही अब किसान, सरकार और मिलर्स के लिए परेशानी का सबब बन गया है। हाइब्रिड धान की वजह से उत्तर प्रदेश के राइस मिलर्स ने धान कूटने से मना कर दिया, जिससे किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ रही है।

उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में एक अक्टूबर से तो कहीं पर एक नवंबर से सरकारी धान खरीद केंद्रों पर धान की खरीद होनी थी। लेकिन एजेंसियों के कर्मचारियों की और मिलर्स की हड़ताल की वजह से 22 नवंबर तक ज्यादातर खरीद केंद्रों पर बोहनी ही नहीं हुई। किसी तरह कर्मचारियों ने तो हड़ताल वापस ले ली, लेकिन मिलर्स अभी भी सरकारी धान की कुटाई नहीं कर रहे हैं।

अब चूंकि मिलर्स कुटाई नहीं कर रहे हैं तो सरकारी क्रय केंद्रों पर खरीदारी भी नहीं हो रही है। उत्तर प्रदेश सरकार के आंकड़े देखेंगे तो अभी तक प्रदेश में धान खरीद का लक्ष्य एक फीसदी भी नहीं पहुंच पाया है। उत्तर प्रदेश की खाद्य एवं रसद विभाग की वेबसाइट तक प्रदेश में 22 नवंबर तक 1578155 मीट्रिक टन धान की खरीद होनी थी, लेकिन अभी तक 120120 मीट्रिक धान ही खरीदा जा सका है। वहीं किसान आरोप लगा रहे हैं कि हमारे धान को हाइब्रिड कहकर लौटा दिया जा रहा है जबकि यह बीज हमें सरकार सही देती है।


मिलर्स का आरोप है कि हाइब्रिड धान से चावल तो ज्यादा निकलता है लेकिन वो टूटता बहुत ज्यादा है। इस बारे में मिलर और राइस मिलर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रवि तिवारी कहते हैं, "सरकार हमसे 67 फीसदी रिवकरी ले रही, ब्रोकेन राइस को निकालर 58 से 60 फीसदी तक ही चावल निकलता है, बाकी की भरपाई हम अपने पास से करते हैं।"

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उत्तर प्रदेश राइस मिलर्स एसोसिएशन के बैनर तले प्रदेशभर के मिलर्स ने 20 नवंबर को लखनऊ में एक दिवसीय धरना भी दिया, जिसके बाद सरकार से हुई बातचीत में उनको आश्वासन दिया गया।

केंद्र सरकार ने इसी साल धान (सामान्य किस्म) का न्यूनतम समर्थन मूल्य 200 रुपए बढ़ाकर 1,750 रुपए प्रति कुंतल और धान (ग्रेड ए) का न्यूनतम समर्थन मूल्य 160 रुपए बढ़ाकर 1,750 रुपए प्रति कुंतल कर दिया था। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने इस साल 50 लाख मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य रखा है।

सरकार मिलर्स से 67 प्रतिशत धान की रिकवरी करती है जिसकी वजह से उन्हें हर साल 12 प्रतिशत का नुकसान हो रहा है, ऐसे स्थिति में वे रिकवरी घटाने की मांग कर रहे हैं।

लेकिन अगर मिलर्स की मांगें नहीं मानी जातीं तो क्या होगा, ये अब सबसे बड़ा सवाल है। इस बारे में उत्तर प्रदेश राइस मिलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष उमेश चंद्र गांव कनेक्शन से कहते हैं, "अभी तो सरकार ने हमसे कुछ दिनों की मोहलत मांगी है। लेकिन अगर हमारी मांगें नहीं मानी जातीं तो पहले प्रदेश भर में क्रमिक हड़ताल करेंगे, उसके बाद आमरण अनशन की ओर रुख करेंगे।"


उमेश आगे कहते हैं, "भारतीय खाद्य निगम के मानक के अनुसार धान की रिकवरी करीब 52-55 प्रतिशत तक आती है। सब मिलाकर करीब 58 से 60 फीसदी पहुंच जाती है। लेकिन सरकार मिलर्स से 67 प्रतिशत धान की रिकवरी करती है। इस हिसाब से मिलर्स को हर साल 12 प्रतिशत का नुकसान हो रहा है, ऐसे में रिकवरी की मात्रा घटनी चाहिए।"

सीधे शब्दों में आपको इसका मतलब समझाएं तो यह होगा सरकार अगर मिलों को 100 किलो धान देती है तो उनसे 67 किलो चावल मांगती है, जबकि इतने धान में बहुत ज्यादा 60 किलो से ज्यादा चावल नहीं निकलता। ये 60 किलो वो चावल होता है जो फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के मानकों के अनुरूप होता हैं। केंद्र सरकार की मीलिंग नीतियों के अनुसार फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ग्रेड ए और बी के तहत 25 और 16 फीसदी से ज्यादा टूटे चावल की खरीद नहीं करता जबकि भारत में मौजूदा धान की किस्मों का चावल 40 से 50 फीसदी टूट जाता है। ऐसे में सात किलो की भरपाई मिलर्स कर रहे हैं।

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वर्ष 2016-17 की खरीद के आंकड़ों के हिसाब से केंद्र सरकार धान का एमएसपी बढ़ाकर पहले से ही 11 हजार करोड़ रुपए का बोझ उठा रही है, ऐसे में अगर मिलर्स की बात मानकर रिकवरी घटाती है तो उस पर बोझ और बढ़ेगा।

उत्तर प्रदेश राइस मिलर्स एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार 1990 में प्रदेश में 15000 राइस मिलें थीं, लेकिन बढ़ते नुकसान की वजह से ये संख्या अब 1480 पर पहुंच गई है। उमेश बताते हैं कि 1990 में मिलों को धान कूटने के लिए एक कुंतल पर 10 रुपए मिलता था, आज भी यही दर है।

इससे पहले क्या पहले मिलर्स को नुकसान नहीं होता था, इस बारे में उमेश कहते हैं, "हाइब्रिड धान की वजह से यह परेशानी बढ़ी है क्योंकि हाइब्रिड धान टूटता बहुत है। पहले जब देसी बीजों से खेती होती थी तब रिकवरी ज्यादा मिलता था।"

राइस मिलर्स की हड़ताल की वजह से खरीद केंद्रों पर ही इकट्ठा है धान। (फोटो- मिथिलेश)

इंडस्ट्री इस्टीमेट डॉट कॉम के आंकड़ों की मानें तो इस साल उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 2500 हजार हेक्टेयर में हाइब्रिड धान की खेती की गई। इसके बाद बिहार में 1050, झारखंड में 733, छत्तीसगढ़ में 633, हरियाणा में 313, मध्य प्रदेश में 283, ओडिशा में 250, गुजरात में 225, पंजाब में 175, असम में 142, महाराष्ट्र में 104, वेस्ट बंगाल में 67, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के 25 हजार हेक्टेयर में हाइब्रिड धान रोपा गया।

वहीं सोनभद्र राइस मिलर एसोसिएशन के अध्यक्ष रवि शंकर तिवारी कहते हैं, "इन सबकी जड़ हाइब्रिड बीज है, इससे पैदावार बढ़ती तो जरूर है, लेकिन इसके चावल टूटते बहुत ज्यादा हैं।"

1990 में प्रदेश में 15000 राइस मिलें थीं, लेकिन बढ़ते नुकसान की वजह से ये संख्या अब 1480 पर पहुंच गई है। उमेश बताते हैं कि 1990 में मिलों को धान कूटने के लिए एक कुंतल पर 10 रुपए मिलता था, आज भी यही दर है।

ऐसे में कई किसान यह भी आरोप लगा चुके हैं कि खरीद केंद्रों पर अधिकारी भी चावल ज्यादा टूटने का हवाला देकर धान लेने से मना कर देते हैं। जिला मऊ के ब्लॉक घोषी के माउरभोज गांव के किसाल शिव शंकर यादव बताते हैं, "मैं लगभग 15 बीघे में धान लगाता हूं, लेकिन मैं तो कभी भी एमएसपी पर धान नहीं बेच पाया। जब भी लेकर जाता हूं तो अधिकारी चेक करके बोलते हैं ये टूटता बहुत ज्यादा है, यह यहां नहीं बिकेगा। वही धान मैं बाहर मिलों में बेच देता हूं, पैसे कम मिलते हैं लेकिन मिल तो जाते हैं।"

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इस साल देशभर के 356.83 हेक्टेयर रकबे में धान की रोपाई हुई। इंडस्ट्री इस्टीमेट डॉट कॉम के आंकड़ों के अनुसार इसमें से लगभग 26.6 लाख हेक्टेयर में हाइब्रिड धान रोपा गया। इसमें से 83 फीसदी खेती प्रदेश उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा में की गई। संकर बीज (हाइब्रिड बीज) वे बीज कहलाते हैं जो दो या अधिक पौधों के संकरण (क्रास पालीनेशन) द्वारा उत्पन्न होते हैं। संकरण की प्रक्रिया अत्यंत नियंत्रित व विशिष्ट होती है। इससे पैदावार 10 से 25 फीसदी तक ज्यादा होती है।

जर्मनी की कंपनी बायर के मार्केटिंग हेड अजीत चहल बताते हैं, "देसी किस्म की बीजों से एक एकड़ में 15 कुंतल से ज्यादा धान की पैदावार नहीं होती, जबकि हाइब्रिड किसान इतनी ही जमीन में 25 कुंतल तक पैदावार करता है। ऐसे में किसान ज्यादा पैदावार की तरफ तो भागेगा ही।" इंटरनेशन कंपनी बायर का भारत के हाइब्रिड बीजों के बाजार में 35 फीसदी हिस्सेदारी है। कंपनी का दावा है कि वो हर साल लगभग 38,000 टन हाइब्रिड धान के बीज का कारोबार करती है जिसकी कीमत 250-300 रुपए प्रति किलो है।

खरीद केंद्र पर धान बेचने के लिए अपनी बारी का इंतजार करता किसान। (फोटो- रणविजय)

उत्तर प्रदेश बीज विकास निगम के अतिरिक्त निदेशक (सीड एंड फार्म) डॉ. वीपी सिंह कहते हैं, "किसान खुद ज्यादा पैदावार वाली फसल चाहता है। हम देसी किस्म के बीज भी देते हैं, ऐसे में चुनाव तो किसान को ही करना होता है। देसी बीज से तो अगली बाद भी बुवाई की जा सकती है, लेकिन हाइब्रिड से तो बस एक ही बार बुवाई हो सकती है। किसान हाइब्रिड की 6644, पायनियर 27P31, 27P27, 27P63, शबाना सेवा 127, और एडवांटा 120 किस्मे ज्यादा पसंद करते हैं।"


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