इंजीनियर से किसान तक, एग्रोफॉरेस्ट्री के ज़रिए मिट्टी बचाने निकले सिद्धेश सकोरे
Gaon Connection | Jan 15, 2026, 15:59 IST
खेती का भविष्य क्या होना चाहिए? खेती से आमदनी कैसे बढ़े? और क्या ऐसा कोई रास्ता है जहाँ किसान को मिट्टी भी बचानी न पड़े और पेट भी पालना पड़े, इन सवालों के जवाब अक्सर फाइलों, सेमिनारों और रिपोर्टों में ढूंढे जाते हैं। लेकिन महाराष्ट्र के एक गाँव में ये जवाब खेतों में उग रहे हैं। वहाँ एक युवा किसान न सिर्फ अपने लिए, बल्कि औरों के लिए भी इस तलाश में लगा है कि खेती को फिर से सम्मान, स्थिरता और मुनाफ़ा कैसे लौटाया जाए। इस यात्रा का नाम है एग्रोफॉरेस्ट्री, और इस यात्रा के केंद्र में हैं सिद्धेश सकोरे।
यहाँ आप खेतों की ओर देखते हैं, तो वहाँ आपको पारंपरिक एकल फसल वाली खेती नहीं दिखेगी। यहाँ खेत एक जीवित इकोसिस्टम की तरह नज़र आते हैं ऊपर नीम, सागौन और आम जैसे बड़े पेड़, उनके नीचे केले, अमरूद और पपीते की कतारें, और ज़मीन के पास हल्दी, अदरक और सब्ज़ियाँ। एक ही ज़मीन पर कई परतें, कई फसलें और कई आमदनियाँ। यही है वनशेती या कृषि वानिकी, जिसे सिद्धेश खेती का भविष्य मानते हैं।
महाराष्ट्र के पुणे ज़िले के केंदुर गाँव के सिद्धेश सकोरे का यह सफ़र किसी कल्पना से नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई से शुरू हुआ। उनके पिता चाहते थे कि बेटा इंजीनियर बने। शायद इसलिए कि उन्होंने खेती की अनिश्चितता, घाटा और डर बहुत करीब से देखा था। सिद्धेश इंजीनियर बने भी, लेकिन एक इंटर्नशिप ने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।
इस इंटर्नशिप के दौरान जब करीब पाँच हज़ार किसानों की मिट्टी की जाँच हुई, तो नतीजे चौंकाने वाले थे। मिट्टी ज़हरीली हो चुकी थी, उसकी जैविक ताक़त खत्म हो रही थी। रासायनिक खाद और एकल फसल ने ज़मीन को थका दिया था। उसी दिन सिद्धेश को समझ आया कि उनके पिता खेती से डरते क्यों थे और उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि अगर खेती को बदला नहीं गया, तो किसान का भविष्य और भी कठिन हो जाएगा।
यहीं से जन्म हुआ “एग्रो रेंजर्स” का, एक पहल, एक सोच, एक आंदोलन। सिद्धेश ने ठान लिया कि उनकी ज़िंदगी का काम होगा किसानों की मिट्टी को ठीक करना और खेती को टिकाऊ आमदनी का मॉडल बनाना। वे किसानों को यह सिखाने लगे कि खेत सिर्फ फसल उगाने की जगह नहीं, बल्कि एक पूरा तंत्र हो सकता है जहाँ पेड़, फसल, मिट्टी और इंसान एक-दूसरे को सहारा दें। सिद्धेश कहते हैं, "जब आप ज़मीन को सिर्फ लेने की जगह लौटाना शुरू करते हैं, तो ज़मीन भी आपको कई गुना लौटाती है।"
एग्रोफॉरेस्ट्री का सबसे बड़ा लाभ यही है कि जोखिम बँट जाता है। अगर एक फसल खराब हो जाए, तो दूसरी साथ देती है। सिद्धेश बताते हैं, "साल भर कुछ न कुछ निकलता रहता है फल, लकड़ी, मसाले, सब्ज़ियाँ। इससे किसान को एक ही मौसम या एक ही बाज़ार पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। साथ ही, पेड़ों की मौजूदगी मिट्टी की नमी बनाए रखती है, जैव विविधता लौटाती है और रासायनिक इनपुट की ज़रूरत कम करती है। खेती सिर्फ़ उत्पादन नहीं, पुनर्जीवन बन जाती है।"
ये भी पढ़ें: पेड़ बचाएँगे खेत: कैसे एग्रोफॉरेस्ट्री बदल रही है छोटे किसानों की किस्मत
केंदुर और आसपास के इलाक़ों में सिद्धेश के साथ जुड़ने वाले किसानों का अनुभव भी यही कहता है। पहले वे अपने पुराने तरीक़ों से खेती कर रहे थे, जोखिम ज़्यादा, आमदनी अनिश्चित। लेकिन एग्रो रेंजर्स से जुड़ने के बाद उन्हें समझ आया कि मिश्रित खेती कैसे करनी है, पेड़ों और फसलों को कैसे संतुलन में रखना है और बाज़ार के लिए कैसे तैयारी करनी है। यह बदलाव सिर्फ़ तकनीक का नहीं, सोच का भी है।
इस बदलाव की एक और खास बात है युवाओं और महिलाओं की वापसी। जब खेती को प्रोफ़ेशन की तरह देखा जाता है, जब उसमें योजना, ज्ञान और स्थिर आय दिखती है, तो पढ़े-लिखे युवा भी खेत में उतरते हैं। महिलाएँ भी आगे आती हैं, निर्णय लेती हैं, और खेती को परिवार के बोझ से निकालकर अवसर में बदल देती हैं। सिद्धेश मानते हैं कि जब पढ़े-लिखे लोग खेत में उतरेंगे, तो वे सिर्फ़ अन्न नहीं उगाएँगे वे आशा उगाएँगे।
आज सिद्धेश सकोरे की पहचान सिर्फ़ एक किसान की नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की है जो खेती को भविष्य से जोड़ रहा है। वे मानते हैं कि खेती अब सिर्फ़ गुज़ारे का ज़रिया नहीं रहनी चाहिए। यह कमाई, इज़्ज़त और बदलाव का रास्ता बन सकती है अगर हम ज़मीन को समझें, उसे समय दें और उसके साथ मिलकर काम करें। उनकी कहानी इस बात का सबूत है कि खेती में लौटना पीछे जाना नहीं है; सही सोच के साथ यह आगे बढ़ने का सबसे मज़बूत रास्ता हो सकता है।
ये भी पढ़ें: साल के आख़िर में वे किसान जिन्होंने खेती का भविष्य गढ़ा
महाराष्ट्र के पुणे ज़िले के केंदुर गाँव के सिद्धेश सकोरे का यह सफ़र किसी कल्पना से नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई से शुरू हुआ। उनके पिता चाहते थे कि बेटा इंजीनियर बने। शायद इसलिए कि उन्होंने खेती की अनिश्चितता, घाटा और डर बहुत करीब से देखा था। सिद्धेश इंजीनियर बने भी, लेकिन एक इंटर्नशिप ने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।
इस इंटर्नशिप के दौरान जब करीब पाँच हज़ार किसानों की मिट्टी की जाँच हुई, तो नतीजे चौंकाने वाले थे। मिट्टी ज़हरीली हो चुकी थी, उसकी जैविक ताक़त खत्म हो रही थी। रासायनिक खाद और एकल फसल ने ज़मीन को थका दिया था। उसी दिन सिद्धेश को समझ आया कि उनके पिता खेती से डरते क्यों थे और उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि अगर खेती को बदला नहीं गया, तो किसान का भविष्य और भी कठिन हो जाएगा।
जब पढ़े-लिखे युवा खेत में उतरते हैं, तो किस्मत बदलती ही है।
यहीं से जन्म हुआ “एग्रो रेंजर्स” का, एक पहल, एक सोच, एक आंदोलन। सिद्धेश ने ठान लिया कि उनकी ज़िंदगी का काम होगा किसानों की मिट्टी को ठीक करना और खेती को टिकाऊ आमदनी का मॉडल बनाना। वे किसानों को यह सिखाने लगे कि खेत सिर्फ फसल उगाने की जगह नहीं, बल्कि एक पूरा तंत्र हो सकता है जहाँ पेड़, फसल, मिट्टी और इंसान एक-दूसरे को सहारा दें। सिद्धेश कहते हैं, "जब आप ज़मीन को सिर्फ लेने की जगह लौटाना शुरू करते हैं, तो ज़मीन भी आपको कई गुना लौटाती है।"
एग्रोफॉरेस्ट्री का सबसे बड़ा लाभ यही है कि जोखिम बँट जाता है। अगर एक फसल खराब हो जाए, तो दूसरी साथ देती है। सिद्धेश बताते हैं, "साल भर कुछ न कुछ निकलता रहता है फल, लकड़ी, मसाले, सब्ज़ियाँ। इससे किसान को एक ही मौसम या एक ही बाज़ार पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। साथ ही, पेड़ों की मौजूदगी मिट्टी की नमी बनाए रखती है, जैव विविधता लौटाती है और रासायनिक इनपुट की ज़रूरत कम करती है। खेती सिर्फ़ उत्पादन नहीं, पुनर्जीवन बन जाती है।"
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केंदुर और आसपास के इलाक़ों में सिद्धेश के साथ जुड़ने वाले किसानों का अनुभव भी यही कहता है। पहले वे अपने पुराने तरीक़ों से खेती कर रहे थे, जोखिम ज़्यादा, आमदनी अनिश्चित। लेकिन एग्रो रेंजर्स से जुड़ने के बाद उन्हें समझ आया कि मिश्रित खेती कैसे करनी है, पेड़ों और फसलों को कैसे संतुलन में रखना है और बाज़ार के लिए कैसे तैयारी करनी है। यह बदलाव सिर्फ़ तकनीक का नहीं, सोच का भी है।
जहाँ खेत बन गया पूरा इकोसिस्टम, महाराष्ट्र ही नहीं दूसरे राज्यों से भी किसान सीखने आते हैं।
इस बदलाव की एक और खास बात है युवाओं और महिलाओं की वापसी। जब खेती को प्रोफ़ेशन की तरह देखा जाता है, जब उसमें योजना, ज्ञान और स्थिर आय दिखती है, तो पढ़े-लिखे युवा भी खेत में उतरते हैं। महिलाएँ भी आगे आती हैं, निर्णय लेती हैं, और खेती को परिवार के बोझ से निकालकर अवसर में बदल देती हैं। सिद्धेश मानते हैं कि जब पढ़े-लिखे लोग खेत में उतरेंगे, तो वे सिर्फ़ अन्न नहीं उगाएँगे वे आशा उगाएँगे।
आज सिद्धेश सकोरे की पहचान सिर्फ़ एक किसान की नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की है जो खेती को भविष्य से जोड़ रहा है। वे मानते हैं कि खेती अब सिर्फ़ गुज़ारे का ज़रिया नहीं रहनी चाहिए। यह कमाई, इज़्ज़त और बदलाव का रास्ता बन सकती है अगर हम ज़मीन को समझें, उसे समय दें और उसके साथ मिलकर काम करें। उनकी कहानी इस बात का सबूत है कि खेती में लौटना पीछे जाना नहीं है; सही सोच के साथ यह आगे बढ़ने का सबसे मज़बूत रास्ता हो सकता है।
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