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गांव कनेक्शन में छपी प्रवासी मजदूर की दर्द भरी दास्तां को पढ़ 19 वर्षीय छात्रा ने मदद के लिए जुटाए 42,000 रुपये, रुपये पाकर प्रवासी बोला- आसान हुई राह

Kirti Shukla | May 15, 2021, 07:12 IST
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दिल्ली से मुजफ्फरपुर, बिहार के लिए ऑटो से निकले सुरेश कुमार से गांव कनेक्शन की मुलाकात यूपी के सीतापुर में हुई थी और उसके बाद उनकी कहानी गांव कनेक्शन में प्रकाशित हुई। सुरेश कुमार की कहानी से प्रेरित होकर अशोका विश्वविद्यालय, सोनीपत, हरियाणा की छात्रा अंशिका झाम्ब ने क्राउड फंडिंग के जरिए इकट्ठा हुए रुपये सुरेश को देकर उनकी मुश्किलें कम करने की कोशिश की।
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सीतापुर (उत्तर प्रदेश)। पिछले महीने 19 अप्रैल को जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने राज्य में एक सप्ताह के लॉकडाउन की घोषणा की, तब मुजफ्फरपुर, बिहार के रहने वाले सुरेश कुमार ने पिछले लॉकडाउन की बुरी यादों के दोबारा सच होने के अंदेशे के चलते तुरंत अपना सामान बांधा और दिल्ली से 1,000 किलोमीटर से अधिक दूरी पर स्थित मुजफ्फरपुर के लिए अपने ऑटो से रवाना हो लिए। फिलहाल 19 मई को शुरू हुआ लॉकडाउन अब 17 मई तक बढ़ा दिया गया है।

गांव कनेक्शन की सुरेश कुमार से मुलाकात उत्तर प्रदेश में सीतापुर के पास एनएच-24 (राष्ट्रीय राजमार्ग) पर एक पेड़ के नीचे आराम करने के दौरान हुई थी। सीतापुर तक उन्होंने 426 किलोमीटर की दूरी तय कर ली थी। सुरेश कुमार के पैर लगातार ऑटो चलाते-चलाते सूज गए थे और हाथ लाल थे। सुरेश कुमार ने गांव कनेक्शन को बताया था कि वह घर पहुंचने के लिए तो उत्सुक हैं, लेकिन उन्हें अपने आटो के लिए गए कर्ज के बकाया की भी चिंता है।

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ऑटो रिक्शा से दिल्ली से बिहार जाते वक्त सुरेश कुमार की पत्नी और बेटा।

सुरेश कुमार ने ऑटो रिक्शा खरीदने के लिए कर्ज लिया था। बाद में लॉकडाउन के दौरान जब वह तीन महीने से दिल्ली में फंसे तो उन्हें गुजारे के लिए अपनी पत्नी के गहने भी बेचने पड़े थे।

गांव कनेक्शन में प्रकाशित हुई सुरेश कुमार की दर्द भरी दास्तां से प्रेरित होकर मुंबई में रह रही अशोका विश्वविद्यालय, सोनीपत, हरियाणा की 19 वर्षीय छात्रा अंशिका झाम्ब ने तीन बच्चों के पिता सुरेश की मदद के लिए क्राउडफंडिंग के जरिए 42,000 रुपये इकट्ठा किए।

मुजफ्फरपुर के बड़का गांव निवासी सुरेश ने गांव कनेक्शन को बताया, "जब गांव कनेक्शन ने मेरी दयनीय स्थिति को अपनी वेबसाइट पर जगह दी तो मुझे मुंबई में एक मैडम का फोन आया, उन्होंने पूछा कि क्या वह उनकी मदद कर सकती हैं।"

"उन्होंने मुझे 42 हजार रुपये भेजे। अब, मैं अपने लोन की तीनों किस्तों का भुगतान आसानी से कर पाऊंगा", सुरेश ने खुशी से कहा। उन्होंने कहा, "इन हालातों में मेरी मदद करने के लिए मैं मीडिया प्लेटफॉर्म और मैडम का हमेशा आभारी रहूंगा।"

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सुरेश कुमार की कहानी से प्रेरित होकर अशोका विश्वविद्यालय, सोनीपत, हरियाणा की छात्रा अंशिका झाम्ब ने क्राउड फंडिंग के जरिए इकट्ठा हुए रुपये सुरेश को देकर उनकी मुश्किलें कम करने की कोशिश की।

जब गाँव कनेक्शन ने झाम्ब से संपर्क किया, तो उन्होंने बताया, "मैंने ट्विटर पर यह विडियो देखा तो मैं सुरेश कुमार के संघर्ष और उनके परिवार की 1000 किमी की ऑटो रिक्शा से यात्रा से प्रभावित हुई। मैंने तुरंत गांव कनेक्शन से संपर्क किया और सुरेश कुमार की मदद के लिए क्राउडफंडिंग शुरू कर दी," झाम्ब ने आगे कहा।

झाम्ब ने 42,000 रुपये जुटाए और सुरेश कुमार को भेज दिए, जो अभी भी अच्छे काम के इंतजार में हैं और गांव में ही ऑटो चलाकर दिनभर में 50-100 रुपये कमा लेते हैं।

सुरेश ने गांव कनेक्शन को बताया कि 2018 में उसने एक ऑटो-रिक्शा खरीदने के लिए 5.5 लाख रुपये का कर्ज लिया था. उन्होंने कहा, "पिछले साल तालाबंदी के दौरान मैं तीन महीने तक दिल्ली में फंसा रहा। मुझे शहर में अपना किराया चुकाने और अपने ऑटो की किश्त चुकाने के लिए गांव में अपनी जमीन और अपनी पत्नी के गहने बेचने पड़े थे।"

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सुरेश कुमार अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बिहार के अपने गाँव में। उन्होंने कहा, "इससे पहले कि मैं अपने रिक्शा के लोन की किस्त और दूसरे कर्जे चुका पाता, तब तक दूसरे लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई।"

इसलिए, जैसे ही सीएम केजरीवाल ने 19 अप्रैल की सुबह एक सप्ताह के लॉकडाउन की घोषणा की, तब सुरेश कुमार ने घर जाने में ही समझदारी समझी। मुख्यमंत्री के आश्वासन और प्रवासी कामगारों से शहर नहीं छोड़ने की अपील के बावजूद, सुरेश ने अपना फैसला नहीं बदला। उन्हें खुशी है कि उन्होंने तुरंत शहर छोड़ दिया, क्योंकि तीन सप्ताह से अधिक समय हो गया है और दिल्ली में अभी भी लॉकडाउन लगा है।

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