Toda Embroidery: नीलगिरी की पहाड़ियों से फैशन शो तक, टोडा महिलाओं की कढ़ाई बनी पहचान
Gaon Connection | Feb 10, 2026, 17:20 IST
तमिलनाडु की नीलगिरी पहाड़ियों में रहने वाला टोडा आदिवासी समाज अपनी पारंपरिक कढ़ाई के जरिए संस्कृति और प्रकृति के बीच संतुलित जीवन की मिसाल पेश कर रहा है। सफेद कपड़े पर लाल और काले धागों से की जाने वाली यह महीन कढ़ाई सिर्फ कला नहीं, बल्कि उनकी पहचान, इतिहास और जीवन दर्शन का हिस्सा है। पीढ़ी दर पीढ़ी चलती यह परंपरा आज आजीविका का साधन भी बन रही है और सस्टेनेबल फैशन की दुनिया में एक प्रेरणा बनकर उभर रही है।
इन पहाड़ियों के छोटे-छोटे गाँवों में जब आप सुबह के समय पहुँचते हैं, तो आपको दूर से ही सफेद कपड़े पर लाल और काले धागों की महीन कढ़ाई करती महिलाएँ दिखाई देंगी। उनके हाथ तेज़ी से चलते हैं, लेकिन चेहरे पर किसी तरह की जल्दबाज़ी नहीं होती। उनके लिए यह काम सिर्फ रोज़ी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है, एक ऐसी परंपरा, जो पीढ़ियों से चली आ रही है।
ये है तमिलनाडु के कोयंबटूर ज़िले की खूबसूरत नीलगिरी पहाड़ी पर बसा टोडा आदिवासियों का गाँव, जो न जाने कितने बरसों से अपनी कला को सहेजे हुए है।
टोडा समाज की यह कढ़ाई देखने में जितनी खूबसूरत लगती है, उतनी ही गहरी कहानी अपने भीतर समेटे हुए है। सफेद सूती कपड़े पर लाल और काले धागों से बनाई गई ज्यामितीय आकृतियाँ दरअसल प्रकृति, पहाड़ों, जानवरों और उनके रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी होती हैं। यह सिर्फ डिजाइन नहीं, बल्कि उनकी दुनिया का नक्शा है।
नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित जया मुत्थु, अपने हाथों में सुई और धागा थामे मुस्कुराते हुए कहती हैं, “हमने यह काम अपनी माँ और दादी से सीखा है। बचपन से देखते आए हैं कि घर की महिलाएँ ऐसे ही कपड़े बनाती थीं। अब हम भी अपनी बेटियों को सिखा रहे हैं।”
टोडा समाज का जीवन हमेशा से प्रकृति के बेहद करीब रहा है। कभी यह समुदाय अपनी भैंसों के साथ इन पहाड़ियों में आया और फिर यहीं बस गया। उनका खानपान, त्योहार, गीत-संगीत और पहनावा, सब कुछ प्रकृति से जुड़ा हुआ है। यही जुड़ाव उनकी कढ़ाई में भी दिखाई देता है।
यै भी पढ़ें: हाइब्रिड की दौड़ में अकेली खड़ी आदिवासी किसान, बचा रहीं पारंपरिक बीज
यह कढ़ाईदार कपड़े सिर्फ पहनने के लिए नहीं होते, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी होते हैं। किसी शादी, त्योहार या खास अवसर पर यही पारंपरिक वस्त्र पहने जाते हैं। गाँव में चलते-फिरते लोग भी अक्सर इन्हीं कपड़ों में दिखाई देते हैं, जैसे हर धागा उनकी पहचान का हिस्सा हो।
समय के साथ दुनिया बदलती गई, लेकिन टोडा समाज ने अपनी इस कला को नहीं छोड़ा। हालांकि, बदलती अर्थव्यवस्था और बाजार की मांग ने उनके सामने चुनौतियाँ भी खड़ी कीं। पहले यह कढ़ाई सिर्फ अपने समुदाय के लिए बनाई जाती थी, लेकिन अब यही कला उनकी आजीविका का साधन भी बन रही है।
कुछ साल पहले इस कढ़ाई को भौगोलिक संकेत (GI) टैग मिला, जिससे इसे एक विशेष पहचान मिली। इससे न केवल इस कला को संरक्षण मिला, बल्कि बाजार में भी इसकी मांग बढ़ी। अब यह कढ़ाई स्थानीय बाजारों से निकलकर बड़े शहरों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुँच रही है।
यै भी पढ़ें: जब रूबी पारीक ने गाँव को बना दिया जैविक खेती का स्कूल
लेकिन इसके बावजूद चुनौतियाँ खत्म नहीं हुई हैं। मशीनों से बनने वाले सस्ते कपड़ों के दौर में हाथ से बनी इस कढ़ाई की कीमत अधिक होती है। कई बार खरीदार सस्ती चीज़ों की ओर चले जाते हैं और ऐसे में इन कारीगर महिलाओं की मेहनत का सही मूल्य नहीं मिल पाता।
गाँव के एक बुजुर्ग अरोडू कुट्टन कहते हैं, “अगर लोग हमारे बनाए कपड़े खरीदेंगे, तभी हमारी कला जिंदा रहेगी। नहीं तो धीरे-धीरे यह सब खत्म हो जाएगा।”
आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में यह कला एक नए मोड़ पर खड़ी है। अब इन महिलाओं के बनाए कपड़े ऑनलाइन बिकने लगे हैं। कुछ संगठनों और डिजाइनरों ने भी इनके साथ काम शुरू किया है, जिससे उनकी कला को नए बाजार मिल रहे हैं।
लेकिन असली सवाल यही है, क्या हम इस कला को सिर्फ देखने और सराहने तक सीमित रखेंगे, या इसे बचाने में भी हिस्सा लेंगे?
टोडा कढ़ाई हमें सिर्फ एक खूबसूरत कपड़ा नहीं देती, बल्कि यह सिखाती है कि जीवन को धीमे, संतुलित और प्रकृति के साथ कैसे जिया जा सकता है। यह हमें बताती है कि परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं, बस ज़रूरत है समझ और समर्थन की।
नीलगिरी की इन पहाड़ियों में आज भी महिलाएँ सुई-धागे से कहानियाँ बुन रही हैं। हर टांका एक याद है, हर डिजाइन एक परंपरा, और हर कपड़ा एक पूरी संस्कृति की पहचान।
यै भी पढ़ें: बकरी के दूध से साबून बनाकर एक महिला की सोच ने बदली सैकड़ों ज़िंदगियाँ
ये है तमिलनाडु के कोयंबटूर ज़िले की खूबसूरत नीलगिरी पहाड़ी पर बसा टोडा आदिवासियों का गाँव, जो न जाने कितने बरसों से अपनी कला को सहेजे हुए है।
टोडा समाज की यह कढ़ाई देखने में जितनी खूबसूरत लगती है, उतनी ही गहरी कहानी अपने भीतर समेटे हुए है। सफेद सूती कपड़े पर लाल और काले धागों से बनाई गई ज्यामितीय आकृतियाँ दरअसल प्रकृति, पहाड़ों, जानवरों और उनके रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी होती हैं। यह सिर्फ डिजाइन नहीं, बल्कि उनकी दुनिया का नक्शा है।
नीलगिरी की टोडा कला की अनोखी दुनिया
नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित जया मुत्थु, अपने हाथों में सुई और धागा थामे मुस्कुराते हुए कहती हैं, “हमने यह काम अपनी माँ और दादी से सीखा है। बचपन से देखते आए हैं कि घर की महिलाएँ ऐसे ही कपड़े बनाती थीं। अब हम भी अपनी बेटियों को सिखा रहे हैं।”
टोडा समाज का जीवन हमेशा से प्रकृति के बेहद करीब रहा है। कभी यह समुदाय अपनी भैंसों के साथ इन पहाड़ियों में आया और फिर यहीं बस गया। उनका खानपान, त्योहार, गीत-संगीत और पहनावा, सब कुछ प्रकृति से जुड़ा हुआ है। यही जुड़ाव उनकी कढ़ाई में भी दिखाई देता है।
यै भी पढ़ें: हाइब्रिड की दौड़ में अकेली खड़ी आदिवासी किसान, बचा रहीं पारंपरिक बीज
यह कढ़ाईदार कपड़े सिर्फ पहनने के लिए नहीं होते, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी होते हैं। किसी शादी, त्योहार या खास अवसर पर यही पारंपरिक वस्त्र पहने जाते हैं। गाँव में चलते-फिरते लोग भी अक्सर इन्हीं कपड़ों में दिखाई देते हैं, जैसे हर धागा उनकी पहचान का हिस्सा हो।
टोडा कढ़ाई को नीलगिरी पहाड़ी गाँव से दुनिया तक पहुँचाने के लिए जया मुत्थू को नारी शक्ति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।
समय के साथ दुनिया बदलती गई, लेकिन टोडा समाज ने अपनी इस कला को नहीं छोड़ा। हालांकि, बदलती अर्थव्यवस्था और बाजार की मांग ने उनके सामने चुनौतियाँ भी खड़ी कीं। पहले यह कढ़ाई सिर्फ अपने समुदाय के लिए बनाई जाती थी, लेकिन अब यही कला उनकी आजीविका का साधन भी बन रही है।
कुछ साल पहले इस कढ़ाई को भौगोलिक संकेत (GI) टैग मिला, जिससे इसे एक विशेष पहचान मिली। इससे न केवल इस कला को संरक्षण मिला, बल्कि बाजार में भी इसकी मांग बढ़ी। अब यह कढ़ाई स्थानीय बाजारों से निकलकर बड़े शहरों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुँच रही है।
यै भी पढ़ें: जब रूबी पारीक ने गाँव को बना दिया जैविक खेती का स्कूल
लेकिन इसके बावजूद चुनौतियाँ खत्म नहीं हुई हैं। मशीनों से बनने वाले सस्ते कपड़ों के दौर में हाथ से बनी इस कढ़ाई की कीमत अधिक होती है। कई बार खरीदार सस्ती चीज़ों की ओर चले जाते हैं और ऐसे में इन कारीगर महिलाओं की मेहनत का सही मूल्य नहीं मिल पाता।
टोडा कढ़ाई से जीवित है एक पूरी संस्कृति।
गाँव के एक बुजुर्ग अरोडू कुट्टन कहते हैं, “अगर लोग हमारे बनाए कपड़े खरीदेंगे, तभी हमारी कला जिंदा रहेगी। नहीं तो धीरे-धीरे यह सब खत्म हो जाएगा।”
आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में यह कला एक नए मोड़ पर खड़ी है। अब इन महिलाओं के बनाए कपड़े ऑनलाइन बिकने लगे हैं। कुछ संगठनों और डिजाइनरों ने भी इनके साथ काम शुरू किया है, जिससे उनकी कला को नए बाजार मिल रहे हैं।
लेकिन असली सवाल यही है, क्या हम इस कला को सिर्फ देखने और सराहने तक सीमित रखेंगे, या इसे बचाने में भी हिस्सा लेंगे?
टोडा कढ़ाई हमें सिर्फ एक खूबसूरत कपड़ा नहीं देती, बल्कि यह सिखाती है कि जीवन को धीमे, संतुलित और प्रकृति के साथ कैसे जिया जा सकता है। यह हमें बताती है कि परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं, बस ज़रूरत है समझ और समर्थन की।
नीलगिरी की इन पहाड़ियों में आज भी महिलाएँ सुई-धागे से कहानियाँ बुन रही हैं। हर टांका एक याद है, हर डिजाइन एक परंपरा, और हर कपड़ा एक पूरी संस्कृति की पहचान।
यै भी पढ़ें: बकरी के दूध से साबून बनाकर एक महिला की सोच ने बदली सैकड़ों ज़िंदगियाँ