हाइब्रिड की दौड़ में अकेली खड़ी आदिवासी किसान, बचा रहीं पारंपरिक बीज

Gaon Connection | Feb 06, 2026, 13:07 IST
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आदिवासी किसान सुंदरियाबाई ने उस समय देसी बीज बचाने की शुरुआत की, जब पूरा गाँव हाइब्रिड बीजों की ओर दौड़ रहा था। आज उनके पास 150 पारंपरिक किस्मों का बीज बैंक है, जो सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की खाद्य सुरक्षा और खेती की पहचान को भी सहेज रहा है।
बीजों की संरक्षक, डिंडोरी की सुंदरियाबाई।
जब दुनिया एक दिशा में दौड़ रही हो, जब हर कोई एक ही रास्ता चुन रहा हो, तब अपने विश्वास और अपनी जड़ों को थामे रखना आसान नहीं होता। यह काम वही लोग कर पाते हैं, जिनके भीतर मिट्टी से जुड़ा साहस और दूर तक देखने वाली दृष्टि होती है। भारत के गाँवों में ऐसे ही अनगिनत नायक-नायिकाएँ हैं, जो भीड़ से अलग चलकर आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बना रहे हैं। मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के खपरीपानी गाँव की आदिवासी किसान सुंदरियाबाई भी ऐसी ही एक नायिका हैं।

एक समय था जब पूरे इलाके में हाइब्रिड बीजों का चलन तेज़ी से बढ़ रहा था। किसान ज़्यादा उत्पादन और जल्दी कमाई के लालच में पारंपरिक बीजों को छोड़ते जा रहे थे। गाँवों में एक होड़ सी लग गई थी, किसके पास नया बीज है, किसकी फसल ज़्यादा है। लेकिन सुंदरियाबाई इस दौड़ को दूर से देख रही थीं। उन्हें लग रहा था कि अगर यही चलता रहा, तो आने वाले समय में देसी किस्में पूरी तरह गायब हो जाएँगी। और जब बीज ही नहीं बचेंगे, तो खेती का भविष्य कैसा होगा? यही सवाल उनके मन में गूंजता रहा, और इसी सवाल ने उन्हें एक अनोखे रास्ते पर चलने की ताकत दी।

धारा के विपरीत चली सुंदरियाबाई, 150 देसी बीजों से बचा रहीं खेती का भविष्य।
धारा के विपरीत चली सुंदरियाबाई, 150 देसी बीजों से बचा रहीं खेती का भविष्य।


सुंदरिया बाई कहती हैं, "हमारा बीज आगे बढ़ते रहना चाहिए, आने वाले समय में परेशानी आ सकती है, ऐसे ही मेरे दिमाग में आया, इसलिए मैंने बीज इकट्ठा करना शुरू किया, ताकि हमारा बीज ऐसे ही बढ़ता रहे। अभी दस कोठी बनायी है, जिसमें हर तरह के बीज रखें हैं।"

उन्होंने तय किया कि अगर कोई नहीं करेगा, तो वे खुद इस काम की शुरुआत करेंगी। कोदो, कुटकी, सावा, ज्वार, मक्का, धान, एक-एक बीज में उन्होंने सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी पहचान और अपने भविष्य को देखा। आज उनके पास करीब 150 देसी किस्मों के बीज सुरक्षित हैं। यह कोई वैज्ञानिक प्रयोगशाला नहीं, बल्कि एक आदिवासी किसान का घर है, जहाँ मिट्टी के बर्तनों, बोरियों और दीवारों पर टंगी बालियों में भारत की खेती का भविष्य सहेजा गया है।

आज सुंदरियाबाई सिर्फ बीज बचाने वाली किसान नहीं रहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन चुकी हैं।
आज सुंदरियाबाई सिर्फ बीज बचाने वाली किसान नहीं रहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन चुकी हैं।


सुंदरियाबाई अपने बीजों को “गुल्लक” कहती हैं, एक ऐसी गुल्लक जिसमें पैसा नहीं, बल्कि भविष्य जमा है। जैसे बच्चे अपनी छोटी-छोटी बचत से गुल्लक भरते हैं, वैसे ही उन्होंने सालों की मेहनत से इस बीज बैंक को तैयार किया है। उनका कहना है कि अगर बीज खत्म हो गए, तो सिर्फ खेत नहीं सूखेंगे, बल्कि हमारे खाने के स्वाद, हमारी परंपराएँ और हमारी पहचान भी खो जाएँगी।

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शुरुआत आसान नहीं थी। गाँव के लोग पूछते थे, “बीज बचाकर करोगी क्या?” उन्हें लगता था कि यह समय की बर्बादी है। लेकिन सुंदरियाबाई को जवाब देने की नहीं, काम करने की आदत थी। उन्होंने बीजों को सिर्फ इकट्ठा नहीं किया, बल्कि हर साल उन्हें बोया, उगाया और फिर से सुरक्षित रखा। क्योंकि बीज को जिंदा रखने का एक ही तरीका है, उसे मिट्टी में वापस लौटाना।

इस सफर में उनके पति पीतांबर खरवार उनका सहारा बने। दोनों ने मिलकर खेतों में मेहनत की, बीजों को बचाया और धीरे-धीरे अपने छोटे से प्रयास को एक आंदोलन में बदल दिया। आज उनके घर के पास बनी दस कोठियों में अलग-अलग किस्मों के बीज सुरक्षित रखे हैं।

इस सफर में उनके पति पीतांबर खरवार उनका सहारा बने।
इस सफर में उनके पति पीतांबर खरवार उनका सहारा बने।


समय के साथ उनके काम का असर दिखने लगा। पहले जो किसान उन्हें अजीब नज़रों से देखते थे, वही अब उनसे बीज लेने आने लगे। आसपास के गाँवों के लोग उनका पता पूछते हैं, उनसे सीखते हैं और अपने खेतों में देसी बीज बोने लगे हैं। कई किसानों की उपज भी बढ़ी है। जहाँ पहले पाँच क्विंटल उत्पादन होता था, वहाँ अब दस से पंद्रह क्विंटल तक फसल मिलने लगी है।

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लेकिन सुंदरियाबाई के लिए सबसे बड़ी खुशी उपज या कमाई नहीं, बल्कि यह है कि लोग फिर से अपने बीजों की ओर लौट रहे हैं। उनका सपना है कि आने वाली पीढ़ियाँ इन बीजों को जिंदा रखें, बाहर से बीज खरीदने की मजबूरी न हो और लोग शुद्ध, पौष्टिक भोजन खा सकें।

वे कहती हैं, “हमारा बीज आगे बढ़ते रहना चाहिए। आने वाले समय में परेशानी आ सकती है, इसलिए मैंने बीज इकट्ठा करना शुरू किया, ताकि ये खत्म न हो जाएँ।”

वे बीजों को समुदाय में बाँटती हैं, किसानों को समझाती हैं और देसी खेती की राह दिखाती हैं।
वे बीजों को समुदाय में बाँटती हैं, किसानों को समझाती हैं और देसी खेती की राह दिखाती हैं।


आज सुंदरियाबाई सिर्फ बीज बचाने वाली किसान नहीं रहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन चुकी हैं। वे बीजों को समुदाय में बाँटती हैं, किसानों को समझाती हैं और देसी खेती की राह दिखाती हैं।

कभी-कभी बदलाव हमेशा बड़े शहरों या बड़ी नीतियों से नहीं आता। कभी-कभी एक छोटी सी झोपड़ी में, मिट्टी के एक घड़े में, चुपचाप भविष्य पनप रहा होता है।

शायद अख़बारों की सुर्खियों में उनका नाम न आए, टीवी पर उनका ज़िक्र कम हो, लेकिन आने वाले समय में जब हम पीछे मुड़कर देखेंगे, तो समझ पाएँगे कि भारत की खेती को बचाने वाले असली प्रहरी कौन थे। वे लोग, जिन्होंने भीड़ से अलग रास्ता चुना, धारा के विपरीत चले और भविष्य के लिए बीज सहेज लिए।

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