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ब्रह्मपुत्र के टापुओं से राष्ट्रीय सम्मान तक: लुइट भैंस को बचाने वाले किसान जितुल बुरागोहेन

Divendra Singh | Jan 15, 2026, 12:44 IST
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असम के लखीमपुर ज़िले के किसान जितुल बुरागोहेन ने दशकों तक पारंपरिक तरीकों से देसी लुइट भैंस नस्ल की आनुवंशिक शुद्धता और अस्तित्व को बचाए रखा। ब्रह्मपुत्र के तटों और टापुओं पर पलने वाली यह नस्ल बाढ़, कम संसाधन और कठिन परिस्थितियों में भी टिकने की क्षमता रखती है। उनके इसी समर्पण को राष्ट्रीय पहचान मिली है।
जैव विविधता की असली रक्षा: जब एक किसान ने देसी भैंस नस्ल को बचा लिया
असम के लखीमपुर ज़िले के घिलामारा क्षेत्र में स्थित सिनाई गोहाई गाँव कोई बड़ा पशुपालन केंद्र नहीं है। यहाँ न तो आधुनिक डेयरियाँ हैं, न चमकदार शेड। लेकिन इसी साधारण से गाँव में रहने वाले किसान जितुल बुरागोहेन ने वह काम किया है, जिसकी अहमियत आज पूरे देश ने मानी है, उन्होंने असम की देसी लुइट भैंस नस्ल को बचाने का बीड़ा उठाया और दशकों तक उसे निभाया।

जितुल बुरागोहेन उन किसानों में से हैं, जिनके लिए पशुपालन केवल रोज़गार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। उन्होंने न तो इस नस्ल को “कम दूध देने वाली” कहकर छोड़ा, न ही बाहरी नस्लों के आकर्षण में इसकी उपेक्षा की। पारंपरिक तरीकों से, सावधानीपूर्वक प्रबंधन और शुद्ध ब्रीडिंग के ज़रिये उन्होंने लुइट भैंस की आनुवंशिक शुद्धता को बनाए रखा। यही वजह है कि आज यह नस्ल केवल किताबों या सरकारी दस्तावेज़ों में नहीं, बल्कि ज़मीन पर ज़िंदा है।

उनके इसी लंबे और निरंतर योगदान के लिए हरियाणा के करनाल स्थित ICAR-नेशनल ब्यूरो ऑफ़ एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज़ (NBAGR) ने उन्हें ब्रीड कंज़र्वेशन अवॉर्ड 2025 से सम्मानित किया है। यह पुरस्कार उन लोगों को दिया जाता है, जो देश की देसी पशु नस्लों को बचाने और आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

लुइट भैंस: नदी, मिट्टी और संस्कृति से जुड़ी नस्ल

लुइट भैंस को “असम की स्वैम्प भैंस” भी कहा जाता है। इसका नाम ब्रह्मपुत्र नदी के स्थानीय नाम “लुइट” से जुड़ा है। सदियों से असम के लोग इस भैंस को नदी के किनारों, तटबंधों और छोटे-छोटे नदी द्वीपों पर पालते आए हैं। स्थानीय भाषा में इन बड़े झुंडों को “खुटी” कहा जाता है, यानी घुमंतू पशुपालन की एक पारंपरिक व्यवस्था।

यह भैंस मुख्य रूप से असम के ऊपरी ब्रह्मपुत्र घाटी के ज़िलों जैसे जोरहाट, शिवसागर, लखीमपुर, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, धेमाजी, गोलाघाट, माजुली और बिश्वनाथ में पाई जाती है। इसके अलावा मणिपुर, मिज़ोरम और नागालैंड के सीमावर्ती इलाक़ों में भी इसके झुंड मिलते हैं।

बाढ़, गरीबी और बदलाव के बीच टिकती देसी नस्ल
बाढ़, गरीबी और बदलाव के बीच टिकती देसी नस्ल


लुइट भैंस देखने में मज़बूत, मध्यम आकार की और कठोर परिस्थितियों में टिकने वाली नस्ल है। इसका रंग आमतौर पर काला होता है, माथा चौड़ा और थोड़ा धँसा हुआ, आँखें उभरी हुई और सींग अर्ध-वृत्ताकार होते हैं, जो दोनों ओर पीछे की तरफ़ मुड़ते हुए ऊपर उठते हैं। इसकी एक ख़ास पहचान इसके पैरों पर घुटने तक सफ़ेद “स्टॉकिंग” जैसी धारियाँ हैं।

कम दूध, लेकिन ज़्यादा मायने

लुइट भैंस बहुत ज़्यादा दूध नहीं देती। औसतन इसका दुग्ध उत्पादन लगभग 449 किलोग्राम प्रति दुग्धकाल होता है। लेकिन इस दूध की असली ताक़त उसकी उच्च वसा मात्रा में है। औसतन 8.5–9 प्रतिशत फैट (कुछ अध्ययनों में 13 प्रतिशत तक) होने की वजह से इसका दूध दही, घी, मलाई और पारंपरिक मिठाइयों के लिए बेहद उपयुक्त माना जाता है।

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असम में त्योहारों के समय खासतौर पर माघ बिहू के दौरान भैंस के दूध और उससे बने उत्पादों की मांग बहुत बढ़ जाती है। यही वजह है कि कम उत्पादन के बावजूद, बड़े झुंडों के ज़रिये किसान अच्छी कुल आमदनी निकाल लेते हैं। यह पूरा सिस्टम लगभग ज़ीरो-इनपुट पर चलता है न महँगा चारा, न भारी ढांचा।

बाढ़ में भी टिकने वाली नस्ल

असम में हर साल आने वाली बाढ़ किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। लेकिन लुइट भैंस इसी चुनौती के बीच विकसित हुई नस्ल है। यह भैंस पानी, कीचड़ और नमी वाले इलाकों में आसानी से रह सकती है। इसी कारण इसे नदी किनारे रहने वाले छोटे और सीमांत किसानों के लिए आदर्श माना जाता है।

2025 में एक अहम मोड़ तब आया, जब ICAR-NBAGR के नेटवर्क प्रोजेक्ट ऑन एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज़, जिसे असम वेटरनरी एंड फिशरी यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ़ वेटरनरी साइंस के एनिमल जेनेटिक्स एंड ब्रीडिंग विभाग ने समन्वित किया, ने लुइट भैंस पर व्यवस्थित अध्ययन किया। इस अध्ययन में यह दर्ज किया गया कि यह नस्ल कम संसाधनों में भी टिकाऊ है, स्थानीय जलवायु के अनुकूल है और बाढ़ जैसी परिस्थितियों में भी जीवित रह सकती है।

इसी शोध के दौरान यह साफ़ हुआ कि ज़मीन पर जितुल बुरागोहेन जैसे किसान इस नस्ल को बचाने में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। प्रोजेक्ट के प्रधान अन्वेषक ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार के लिए आवेदन करने को प्रोत्साहित किया।

जब सम्मान की सूचना मिली, तो बुरागोहेन ने इसे व्यक्तिगत उपलब्धि मानने से इनकार किया। उनका कहना था कि यह सम्मान उन्हें ही नहीं, बल्कि उन सभी किसानों को प्रेरित करेगा, जो देसी नस्लों को बचाने के लिए चुपचाप काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक सहयोग साथ आएँ, तभी ऐसी नस्लें बचाई जा सकती हैं।

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