गाय-भैंस के थनैला रोग से परेशान हैं तो यह वीडियो देखें

Diti Bajpai | Dec 10, 2018, 06:45 IST

लखनऊ। खराब प्रंबधन की वजह से दुधारू पशुओं में थनैला रोग एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। इस रोग से पशु की जान को कोई खतरा नहीं होता है लेकिन पशु अनुपयोगी हो जाता है, जिससे पशुपालक को काफी नुकसान होता है।



थनैला बीमारी के बारे में लखनऊ जिले के गुडम्बा के पशुचिकित्सक अधिकारी डॉ ए.के. द्विवेदी बताते हैं, ''थनैला मुख्य रूप से दुधारू पशुओं के थन की बीमारी है। इस बीमारी से ग्रसित पशु का जो दूध होता है उसका रंग और प्रकृति बदल जाती है। थन में सूजन, दूध निकालने का रास्ता एक दम बारीक हो जाता है और साथ में दूध में छिछड़े, दूध फट के आना, मवाद आना या पस आना जैसा होने लगता है।''





थनैला रोग एक जीवाणु जनित रोग है। यह रोग ज्यादातर दुधारू पशु गाय, भैंस, बकरी को होता है। जब मौसम में नमी अधिक होती है तब इस बीमारी का प्रकोप और भी बढ़ जाता है। इस बीमारी से भारतवर्ष में 60 प्रतिशत गाये, भैंसे और बकरी पीड़ित है। यही नहीं इसके कारण दुग्ध उत्पादकों को कई हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है। अगर बाड़े (जहां पशु को रखा जाता है।) की साफ-सफाई की जाए तो इस बीमारी से पशुपालक को आर्थिक नुकसान से रोका जा सकता है।



इस बीमारी के लक्षणों के बारे में डॉ द्विवेदी बताते हैं, ''इस बीमारी का मुख्य कारण खराब प्रंबधन है। इसलिए पशुपालक को पशु बाड़े की नियमित रूप से साफ-सफाई करनी चाहिए। दूध निकालने से पहले और बाद में थन को लाल दवा से साफ करके उसे सूती कपड़े से पोछे।'' अपनी बात को जारी रखते हुए डॉ द्विवेदी बताते हैं,'' पशु का बाड़ा गीला न हो। जब पशु का दूध निकाले तो उसे 15 से 20 मिनट तक खड़ा रखें। पशुपालक के दूध निकालते समय नाखून न हो और हाथों को अच्छी तरह से साफ किया हो।



इन कारणों से होता से यह रोग

  • थनों में चोट लगने।
  • थन पर गोबर और यूरिन कीचड़ का संक्रमण होने पर।
  • दूध दोहने के समय अच्छी तरह साफ-सफाई का न होना।
  • फर्श की अच्छी तरह साफ सफाई का न होना।
  • पूरी तरह से दूध का न निकलना।

साभार: इंटरनेट



इस बीमारी से बचाव

  • पशु के बाड़े और उसके आसपास साफ-सफाई।
  • पशुओं का आवास हवादार होना चाहिए।
  • फर्श सूखा एवं साफ होना चाहिये
  • नियमित रूप से थनों की साफ-सफाई
  • एक पशु का दूध निकालने के बाद पशुपालक को अपने हाथ अच्छी तरह से धोने चाहिए।
  • पशु के थनों का समय-समय पर देखते रहना चाहिये। उनमें कोई गांठ या दूध में थक्के तो नहीं दिख रहे। अगर ऐसा हो तो तुरंत पशुचिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

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