Goat-Based Integrated Farming System: जलभराव इलाकों में खेती का नया रास्ता खोल रहा ये प्रयोग
Divendra Singh | Jan 19, 2026, 14:47 IST
बिहार के जलभराव वाले गाँवों में ICAR द्वारा विकसित बकरी आधारित एकीकृत खेती प्रणाली किसानों के लिए नई उम्मीद बन रही है। इस मॉडल में बकरी पालन, मछली उत्पादन, फसल और बागवानी को जोड़कर एक ही खेत से सालभर आमदनी का रास्ता खोला गया है।
गाँव की कच्ची गलियों में चलते हुए जब आप ऋषिकेश कुमार घर पहुंचते हैं, तो वहाँ बकरियों की आवाज़ें सबसे पहले आपका स्वागत करती हैं। 27 साल के ऋषिकेश के परिवार में बकरी पालन कोई नया काम नहीं है। उनके दादा भी बकरी पालते थे, पिता भी इसी सहारे घर चलाते रहे। लेकिन यह काम कभी कमाई नहीं बन पाया था। बीमारी, सही चारे की कमी, बाजार की जानकारी का अभाव और पारंपरिक तरीकों पर निर्भरता ने बकरी पालन को सिर्फ गुजारे का साधन बनाकर छोड़ दिया था। कई बार तो नुकसान इतना होता कि पूरा परिवार कर्ज में डूबने की कगार पर पहुंच जाता।
बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के कररिया बैरागी गाँव ऋषिकेश खुद बताते हैं, "पहले वे बस परंपरा निभा रहे थे। बकरियों को क्या खिलाना है, किस मौसम में कौन सा चारा देना चाहिए, बीमारी की पहचान कैसे करनी है, सही वजन पर बाजार में कब बेचनी है, इन सब बातों की उन्हें कोई पक्की जानकारी नहीं थी। नतीजा यह होता था कि कभी बकरियां बीमार पड़ जातीं, कभी कम वजन के कारण सही दाम नहीं मिलता और कई बार तो पूरी मेहनत बेकार चली जाती।"
लेकिन पिछले कुछ सालों में उनके जीवन की दिशा बदल गई है। आज उनके घर में बकरियां सिर्फ जानवर नहीं हैं, बल्कि परिवार की आर्थिक सुरक्षा की रीढ़ बन चुकी हैं।
इस बदलाव की वजह बना ICAR के महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी द्वारा विकसित Goat-Based Integrated Farming System यानी बकरी आधारित एकीकृत खेती प्रणाली। यह मॉडल सिर्फ बकरी पालन सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे खेत, पानी, पशु और फसल को एक-दूसरे से जोड़कर एक ऐसा सिस्टम तैयार करता है, जिसमें हर संसाधन दूसरे संसाधन को ताकत देता है।
कररिया गांव में ऋषिकेश अकेले नहीं हैं जिनकी जिंदगी बदली है। गांव के हरिहर दास भी इसी मॉडल से जुड़े हैं। वे अब बकरी पालन के साथ-साथ मछली पालन और खेती भी कर रहे हैं। पहले उनकी आमदनी साल में एक-दो बार ही होती थी, जब फसल कटती थी। अब पूरे साल कम। कभी बकरी बेचकर पैसा आता है, कभी तालाब से मछली बिकती है और कभी सब्जियों से रोज़ की कमाई हो जाती है।
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संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पी.के. भारती बताते हैं, "उत्तर बिहार के जिलों की सबसे बड़ी समस्या जलभराव है। यहां जुलाई से अक्टूबर तक कई इलाके पानी में डूबे रहते हैं। खेत महीनों तक खाली पड़े रहते हैं, जिससे किसान बेरोजगार हो जाते हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह स्थिति और भी मुश्किल हो जाती है। इसी हकीकत को ध्यान में रखकर वैज्ञानिकों ने इस मॉडल को डिजाइन किया है, ताकि जलभराव को नुकसान नहीं, बल्कि संसाधन में बदला जा सके।"
यह मॉडल खास तौर पर छोटे किसानों के लिए बनाया गया है। जिनके पास एक एकड़ या उससे भी कम ज़मीन है, वे भी इसे आसानी से अपना सकते हैं। ICAR द्वारा तैयार लेआउट के अनुसार इस सिस्टम को लगभग 4000 वर्ग मीटर क्षेत्र में दो तरीकों से विकसित किया गया है। पहले मॉडल में बकरी, फसल और बागवानी को जोड़ा गया है। दूसरे मॉडल में इसके साथ मछली पालन भी शामिल किया गया है। दोनों ही मॉडलों में खेत को इस तरह बांटा गया है कि कोई हिस्सा बेकार न रहे।
बकरी के लिए ऊंचे प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित शेड बनाए जाते हैं ताकि जलभराव में भी पशु सुरक्षित रहें। खेत के एक हिस्से में हरा चारा उगाया जाता है, जिससे बाहर से महंगा चारा खरीदने की जरूरत खत्म हो जाती है। मुख्य खेत क्षेत्र में धान, गेहूं, मक्का और दलहन जैसी जरूरी फसलें लगाई जाती हैं ताकि परिवार की खाद्य सुरक्षा बनी रहे। बागवानी और सब्ज़ी वाले हिस्से में टमाटर, बैंगन, भिंडी, लौकी, पपीता और नींबू जैसी नकद फसलें उगाई जाती हैं, जो रोज़ की आमदनी का जरिया बनती हैं। जिन खेतों में पानी लंबे समय तक भरा रहता है, वहां तालाब बनाकर मछली पालन किया जाता है।
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इस पूरे सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत है “रिसाइक्लिंग आधारित खेती।” बकरी का गोबर जैविक खाद बनकर खेत में जाता है। फसल के अवशेष बकरी के चारे में इस्तेमाल होते हैं। तालाब का पोषक पानी खेतों की सिंचाई में काम आता है। सब्जियों के बचे हिस्से फिर से खाद या पशु आहार बन जाते हैं। इससे रासायनिक खाद की जरूरत घटती है, मिट्टी की सेहत सुधरती है और खेती की लागत लगातार कम होती जाती है।
बकरी इस मॉडल की रीढ़ है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जलभराव और छोटे खेतों वाले इलाकों में बकरी सबसे उपयुक्त पशु है। कम जगह में पलने वाली, जल्दी प्रजनन करने वाली और कम खर्च में ज्यादा लाभ देने वाली यह पशु प्रणाली किसानों को तुरंत नकदी देती है। जरूरत पड़ने पर किसान बकरी बेचकर घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई या खेती का निवेश निकाल सकता है। यही वजह है कि इस मॉडल में एक एकड़ ज़मीन पर 16 से 20 बकरियां आराम से पालने की व्यवस्था की गई है।
जहां पहले जलभराव किसानों के लिए अभिशाप था, अब वही पानी मछली पालन और सिंचाई का आधार बन रहा है। तालाब से मिलने वाली मछली बाजार में अच्छा दाम दिलाती है। साथ ही गर्मी के मौसम में यही पानी खेतों के लिए जीवनरेखा बनता है। इससे किसान सूखे की स्थिति में भी फसल बचा पाते हैं।
ICAR के ट्रायल और फील्ड अनुभव बताते हैं कि इस मॉडल से किसानों की आय 2 से 2.5 गुना तक बढ़ी है। लाभ-लागत अनुपात लगभग 2.40 तक पहुंचा है, यानी किसान का लगाया हर एक रुपया ढाई रुपये तक वापस आ रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि किसान अब एक ही फसल पर निर्भर नहीं है। जोखिम बंट गया है। अगर धान खराब हुआ, तो बकरी और मछली से कमाई बनी रहती है। अगर सब्जी की कीमत गिरी, तो अनाज और पशुपालन सहारा बन जाते हैं।
इस मॉडल का असर सिर्फ आमदनी तक सीमित नहीं है। गाँव में रोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं। महिलाएं बकरी पालन और खाद निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। युवा मछली पालन और मार्केटिंग से जुड़ रहे हैं। इससे पलायन की मजबूरी भी कम हो रही है।
पूर्वी चंपारण में सफल होने के बाद वैज्ञानिक मानते हैं कि यह मॉडल सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधुबनी, कोसी क्षेत्र और असम-बंगाल के जलभराव इलाकों में भी अपनाया जा सकता है। जहां पानी समस्या है, वहां यह मॉडल समाधान बन सकता है।
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बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के कररिया बैरागी गाँव ऋषिकेश खुद बताते हैं, "पहले वे बस परंपरा निभा रहे थे। बकरियों को क्या खिलाना है, किस मौसम में कौन सा चारा देना चाहिए, बीमारी की पहचान कैसे करनी है, सही वजन पर बाजार में कब बेचनी है, इन सब बातों की उन्हें कोई पक्की जानकारी नहीं थी। नतीजा यह होता था कि कभी बकरियां बीमार पड़ जातीं, कभी कम वजन के कारण सही दाम नहीं मिलता और कई बार तो पूरी मेहनत बेकार चली जाती।"
लेकिन पिछले कुछ सालों में उनके जीवन की दिशा बदल गई है। आज उनके घर में बकरियां सिर्फ जानवर नहीं हैं, बल्कि परिवार की आर्थिक सुरक्षा की रीढ़ बन चुकी हैं।
चारे की बर्बादी रोकने के लिए पशुपालकों को फीडिंग सिस्टम उपलब्ध कराए गए हैं।
इस बदलाव की वजह बना ICAR के महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी द्वारा विकसित Goat-Based Integrated Farming System यानी बकरी आधारित एकीकृत खेती प्रणाली। यह मॉडल सिर्फ बकरी पालन सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे खेत, पानी, पशु और फसल को एक-दूसरे से जोड़कर एक ऐसा सिस्टम तैयार करता है, जिसमें हर संसाधन दूसरे संसाधन को ताकत देता है।
कररिया गांव में ऋषिकेश अकेले नहीं हैं जिनकी जिंदगी बदली है। गांव के हरिहर दास भी इसी मॉडल से जुड़े हैं। वे अब बकरी पालन के साथ-साथ मछली पालन और खेती भी कर रहे हैं। पहले उनकी आमदनी साल में एक-दो बार ही होती थी, जब फसल कटती थी। अब पूरे साल कम। कभी बकरी बेचकर पैसा आता है, कभी तालाब से मछली बिकती है और कभी सब्जियों से रोज़ की कमाई हो जाती है।
ये भी पढ़ें: कम लागत में ज़्यादा मुनाफा चाहिए तो आपके काम की है ब्लैक बंगाल बकरी
संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पी.के. भारती बताते हैं, "उत्तर बिहार के जिलों की सबसे बड़ी समस्या जलभराव है। यहां जुलाई से अक्टूबर तक कई इलाके पानी में डूबे रहते हैं। खेत महीनों तक खाली पड़े रहते हैं, जिससे किसान बेरोजगार हो जाते हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह स्थिति और भी मुश्किल हो जाती है। इसी हकीकत को ध्यान में रखकर वैज्ञानिकों ने इस मॉडल को डिजाइन किया है, ताकि जलभराव को नुकसान नहीं, बल्कि संसाधन में बदला जा सके।"
बकरी, मछली और खेती का मॉडल।
यह मॉडल खास तौर पर छोटे किसानों के लिए बनाया गया है। जिनके पास एक एकड़ या उससे भी कम ज़मीन है, वे भी इसे आसानी से अपना सकते हैं। ICAR द्वारा तैयार लेआउट के अनुसार इस सिस्टम को लगभग 4000 वर्ग मीटर क्षेत्र में दो तरीकों से विकसित किया गया है। पहले मॉडल में बकरी, फसल और बागवानी को जोड़ा गया है। दूसरे मॉडल में इसके साथ मछली पालन भी शामिल किया गया है। दोनों ही मॉडलों में खेत को इस तरह बांटा गया है कि कोई हिस्सा बेकार न रहे।
बकरी के लिए ऊंचे प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित शेड बनाए जाते हैं ताकि जलभराव में भी पशु सुरक्षित रहें। खेत के एक हिस्से में हरा चारा उगाया जाता है, जिससे बाहर से महंगा चारा खरीदने की जरूरत खत्म हो जाती है। मुख्य खेत क्षेत्र में धान, गेहूं, मक्का और दलहन जैसी जरूरी फसलें लगाई जाती हैं ताकि परिवार की खाद्य सुरक्षा बनी रहे। बागवानी और सब्ज़ी वाले हिस्से में टमाटर, बैंगन, भिंडी, लौकी, पपीता और नींबू जैसी नकद फसलें उगाई जाती हैं, जो रोज़ की आमदनी का जरिया बनती हैं। जिन खेतों में पानी लंबे समय तक भरा रहता है, वहां तालाब बनाकर मछली पालन किया जाता है।
ये भी पढ़ें: Goat Farming: 5 Star जैसा बकरी फ़ार्म, जहाँ बकरियाँ पीती हैं RO का पानी, पढ़ें पूरी स्टोरी
इस पूरे सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत है “रिसाइक्लिंग आधारित खेती।” बकरी का गोबर जैविक खाद बनकर खेत में जाता है। फसल के अवशेष बकरी के चारे में इस्तेमाल होते हैं। तालाब का पोषक पानी खेतों की सिंचाई में काम आता है। सब्जियों के बचे हिस्से फिर से खाद या पशु आहार बन जाते हैं। इससे रासायनिक खाद की जरूरत घटती है, मिट्टी की सेहत सुधरती है और खेती की लागत लगातार कम होती जाती है।
बकरी इस मॉडल की रीढ़ है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जलभराव और छोटे खेतों वाले इलाकों में बकरी सबसे उपयुक्त पशु है। कम जगह में पलने वाली, जल्दी प्रजनन करने वाली और कम खर्च में ज्यादा लाभ देने वाली यह पशु प्रणाली किसानों को तुरंत नकदी देती है। जरूरत पड़ने पर किसान बकरी बेचकर घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई या खेती का निवेश निकाल सकता है। यही वजह है कि इस मॉडल में एक एकड़ ज़मीन पर 16 से 20 बकरियां आराम से पालने की व्यवस्था की गई है।
अब तो दूर-दूर से लोग बकरी आधारित एकीकृत खेती प्रणाली देखने आते हैं।
जहां पहले जलभराव किसानों के लिए अभिशाप था, अब वही पानी मछली पालन और सिंचाई का आधार बन रहा है। तालाब से मिलने वाली मछली बाजार में अच्छा दाम दिलाती है। साथ ही गर्मी के मौसम में यही पानी खेतों के लिए जीवनरेखा बनता है। इससे किसान सूखे की स्थिति में भी फसल बचा पाते हैं।
ICAR के ट्रायल और फील्ड अनुभव बताते हैं कि इस मॉडल से किसानों की आय 2 से 2.5 गुना तक बढ़ी है। लाभ-लागत अनुपात लगभग 2.40 तक पहुंचा है, यानी किसान का लगाया हर एक रुपया ढाई रुपये तक वापस आ रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि किसान अब एक ही फसल पर निर्भर नहीं है। जोखिम बंट गया है। अगर धान खराब हुआ, तो बकरी और मछली से कमाई बनी रहती है। अगर सब्जी की कीमत गिरी, तो अनाज और पशुपालन सहारा बन जाते हैं।
इस मॉडल का असर सिर्फ आमदनी तक सीमित नहीं है। गाँव में रोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं। महिलाएं बकरी पालन और खाद निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। युवा मछली पालन और मार्केटिंग से जुड़ रहे हैं। इससे पलायन की मजबूरी भी कम हो रही है।
पूर्वी चंपारण में सफल होने के बाद वैज्ञानिक मानते हैं कि यह मॉडल सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधुबनी, कोसी क्षेत्र और असम-बंगाल के जलभराव इलाकों में भी अपनाया जा सकता है। जहां पानी समस्या है, वहां यह मॉडल समाधान बन सकता है।
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