राजनीति

एससी - एसटी एक्ट : 17 फीसदी दलित वोटर, लोकसभा की आरक्षित 131 सीटें और सियासत

नई दिल्ली/लखनऊ। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निरोधक कानून यानि एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद खड़े सड़क से लेकर संसद तक हंगामा मचा। भारत बंद के साथ सियासत भी तेज हो गई।

सबसे पहले आपको बता दें मामला क्या था, जिसके चलते देश के कई हिस्सों में 2 अप्रैल को दलितों ने सड़क पर उतरकर भारत बंद का ऐलान कर अपनी चिंताएं जताईं। 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के बाद एससी-एसटी कानून के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। साथ ही, ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत को भी मंजूरी दे दी थी।

हंगामे और राजनीतिक हंगामे के बीच भारत बंद के ठीक एक दिन बाद यानि 3 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट फिर इस मामले में सुनवाई करते अपने ही फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि उनका मंशा कानून को कमजोर करना नहीं बल्कि निर्दोष लोगों के हितों की रक्षा करना है।

दलितों का आरोप था है एक्ट में बदलाव करके सरकार और कुछ राजनीतिक दल आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं बल्कि ये उनके खिलाफ साजिश और अधिकारों में कटौती है। राजनीतिक पार्टियों ने इसे अपने लिए मौके की तरह इस्तेमाल किया और करने की कोशिश में है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कर्नाटक में कहा कि दलितों को भारतीय समाज के सबसे निचले स्तर पर रखना आरएएस और बीजेपी के डीएनए में है।”

दलितों की सियासत करने वाली बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने कहा, “बाबा साहेब अंबेडकर के अथक प्रयासों से जो अधिकार पिछड़े और दलित वर्ग को मिले थे, बीजेपी उन्हें छीनना चाहती है।” वहीं आरोप पर पलटवार भी उसी वेग के साथ हो रहे हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दलित समूहों की तरफ से बुलाए गए भारत बंद में हुई हिंसा और मौतों के लिए कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को जिम्मेदार ठहराया।

एससी-एसटी एक्ट पर पहली बार बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “जितना सम्मान हमने बाबा साहेब अंबेडकर का किया उतना किसी ने नहीं किया। हमारी सरकार तो बाबा साहेब के दिखाए रास्ते पर चल रही है। अत्यंत गरीब लोगों के लिए काम करना हमारा मिशन है।” इस दौरान उन्होंने कांग्रेस पर कांग्रेस पर हमला भी बोला।

लोकसभा की 545 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इन 131 आरक्षित सीटों में से 67 सीटें भाजपा के पास हैं। कांग्रेस के पास 13 सीटे हैं। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस के पास 12, अन्नाद्रमुक और बीजद के पास सात-सात सीटें हैं।

आरोप प्रत्यारोप और सियासत एकाएक क्यों बढ़ी इसे समझने के लिए देश में दलितों की जनसंख्या और उनके वोट प्रतिशत को समझना होगा। लोकसभा में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए 131 सीटें आरक्षित हैं तथा देश की कुल मतदाताओं की इन वर्गों की 20 फीसदी से अधिक है। इसमें भी दलित मतदाता करीब 17 फीसदी हैं। साल 2019 के लोकसभा एवं उससे पहले मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ एवं कुछ अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के साथ खड़ा दिखने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है।

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लोकसभा की 545 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इन 131 आरक्षित सीटों में से 67 सीटें भाजपा के पास हैं। कांग्रेस के पास 13 सीटे हैं। भारत बंद का सबसे ज्यादा उन्हीं राज्यों में देखा गया जहां कुछ महीनों में चुनाव होने वाले हैं।

केंद्र सरकार ने इस मामले में पुर्नविचार याचिका डालते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विचार की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। मामला संसद में गूंजा। संसद के दोनों सदनों में अप्रैल के पहले हफ्ते में हंगामे जारी रहे। इस दौरान सरकार ने दलितों के खिलाफ अपराधों को लेकर आंकड़े बताते हुए अपना पक्ष रखा।

लोकसभा में भगीरथ प्रसाद के लिखित उत्तर में गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर ने बताया ये जानकारी दी। उन्होंने कहा कि वर्ष 2012, 2013, 2014, 2015 और 2016 में दलितों के खिलाफ अपराध के कुल 192577 मामले दर्ज किए गए। इनमें 70 फीसदी से अधिक मामलों में आरोप पत्र दाखिल हुए जिसमें करीब 25 फीसदी मामलों में दोष सद्धि हुआ।

हिंसक प्रदर्शनों में सरकारी संपत्ति को नुकसान के अलावा आंदोलनों में 11 लोगों की मौत हो गई थी। भारत बंद सोशल मीडिया पर भी छाया रहा। हिंसा और मौत लोकर लोगों में नाराजगी देखी गई तो सरकार की मंशा पर भी सवाल उठे। एक धड़े दलित समुदाय को बरगलाने और उनको वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किए जाने के भी आरोप लगाए। सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई 12 अप्रैल को होगी।

मुथरा में ट्रेन रोककर प्रदर्शन करते लोग।
फोटो: एजेंसी

एसएसटी विवाद : लोकसभा की 131 आरक्षित सीटें और 17 फीसदी दलित वोटरों पर नजर

नई दिल्ली (भाषा)। देश में दलित और आदिवासी सामाजिक-आर्थिक रूप से भले ही कमजोर माने जाते हों, लेकिन उनकी सियासी हैसियत इतनी बड़ी है कि देश का कोई भी राजनीतिक दल उनको नजरअंदाज नहीं कर सकता । अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निरोधक कानून पर उच्चतम न्यायालय के हालिया फैसले के बाद खड़े हुए राजनीतिक बवाल से इस बात पर फिर से मुहर लगी है।

लोकसभा में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए 131 सीटें आरक्षित हैं तथा देश की कुल मतदाताओं की इन वर्गों की 20 फीसदी से अधिक है। इसमें भी दलित मतदाता करीब 17 फीसदी हैं।

शायद यही वजह है कि ‘भारत बंद’ का असर उन राज्यों में सबसे ज्यादा देखा गया जहां अगले कुछ महीनों के भीतर चुनाव होने हैं जिनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान शामिल हैं । लोकसभा में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए 131 सीटें आरक्षित हैं तथा देश की कुल मतदाताओं की इन वर्गों की 20 फीसदी से अधिक है। इसमें भी दलित मतदाता करीब 17 फीसदी हैं। साल 2019 के लोकसभा एवं उससे पहले मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ एवं कुछ अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के साथ खड़ा दिखने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है।

लोकसभा की 545 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इन 131 आरक्षित सीटों में से 67 सीटें भाजपा के पास हैं। कांग्रेस के पास 13 सीटे हैं। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस के पास 12, अन्नाद्रमुक और बीजद के पास सात-सात सीटें हैं। भाजपा जहां इस वर्ग पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने का प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों का प्रयास सामाजिक एवं आर्थिक रूप से इस कमजोर वर्ग को अपने साथ लाने का है।

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केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने समाचार एजेंसी भाषा से कहा कि अंबेडकर के सपनों को पूरा करने की मोदी सरकार की अडिग प्रतिबद्धताएं हैं और उसके सारे प्रयासों का उद्देश्य दलितों के जीवन में बदलाव लाना है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में दो बार अंबेडकर को हरवाया और इसके पीछे हल्के बहाने पेश किए कि संसद के केंद्रीय कक्ष में उनका चित्र नहीं लग पाए। कांग्रेस ने अंबेडकर को भारत रत्न नहीं मिलने दिया। मेघवाल ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2015 के माध्यम से राजग सरकार ने वास्तव में कानून के प्रावधानों को मजबूत बनाया था और यह दलित वर्गों के कल्याण की भाजपा की प्रतिबद्धता के अनुरूप था।

कांग्रेस सांसद सुनील जाखड़ ने आरोप लगाया कि भाजपा नीत राजग सरकार के शासनकाल में देश में दलितों एवं समाज के कमजोर वर्ग के लोगों पर हमले बढ़े हैं और सरकार उन्हें सुरक्षा देने में विफल साबित हो रही है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण कानून से जुड़े विषय पर सरकार उच्चतम न्यायालय में ठीक से विषय को नहीं रख सकी जिसका परिणाम हमारे सामने हैं। लोकसभा में खुद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार एससी-एसटी के हितों केलिए प्रतिबद्ध और कानून को कमजोर नहीं किया जाएगा।

चुनावी राजनीति में दलितों और आदिवासियों के सियासी महत्व की वजह से सरकार और भाजपा बार-बार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वह इन वर्गों के हितों के साथ खड़ी है। सरकार पर दलित विरोधी होने के विपक्ष के आरोपों के बीच गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को लोकसभा में कहा कि मोदी सरकार एससी-एसटी के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और एससी-एसटी कानून को कमजोर नहीं किया जाएगा।

विपक्ष के आरोपों पर पलटवार करते हुए भाजपा ने यह दलील भी पेश की है कि उसके पास सर्वाधिक एससी-एसटी सांसद हैं। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के हित के संरक्षण के लिए भाजपा कटिबद्ध है। इन वर्गों के उत्थान के लिए सबसे ज्यादा काम भाजपा ने किए हैं।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इन वर्गों के अधिकारों को मजबूती मिली है। भाजपा की कोशिश है दलितों और आदिवासियों के बीच अपने आधार बचाए रखने के साथ और इसे बढ़ाया जाए। वहीं कभी इस वर्ग पर राजनीतिक रूप से मजबूत पकड़ रखने वाली कांग्रेस अपना आधार फिर वापस पाने को प्रयासरत है। वहीं राहुल गांधी ने कहा, “दलितों को भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखना आरएसएस और भाजपा के डीएनए में है। जो इस सोच को चुनौती देता है कि उसे वे हिंसा से दबाते हैं।” एजेंसी इनपुट के साथ

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