सिंचाई के लिए पानी की चिंता के मायने, अब तक अच्छी बारिश लेकिन गर्मियों के पानी सुरक्षित है क्या?

पिछले साल ठीक-ठीक मानसून के बाद भी कुछ ही महीनों में आधा देश सूखे की चपेट में आ गया था। शायद इस बात को भारतीय नीतिकार भी अब समझने लगे हैं। उन्हें समझ में आने लगा है कि अच्छी बारिश पानी को लेकर निश्चिन्तता नहीं ला पा रही है।

Suvigya JainSuvigya Jain   11 Sep 2019 9:21 AM GMT

सिंचाई के लिए पानी की चिंता के मायने, अब तक अच्छी बारिश लेकिन गर्मियों के पानी सुरक्षित है क्या?

मानसून के 120 दिनों में 100 दिन गुजर चुके हैं। मौसम विभाग बता रहा है कि इस साल अब तक अच्छी बारिश हुई है। देश के कई हिस्से तो पिछले एक महीने में बाढ़ से जूझते दिखे, लेकिन यह स्थिति साल के बाकी बचे आठ महीने केलिए पानी की जरूरत को लेकर निश्चिन्त होने की बिल्कुल नहीं है क्योंकि पिछले साल का अनुभव हमारे पास है।

पिछले साल अच्छे मानसून के बाद भी कुछ ही महीनों में आधा देश सूखे की चपेट में आ गया था। शायद इस बात को भारतीय नीतिकार भी अब समझने लगे हैं। उन्हें समझ में आने लगा है कि अच्छी बारिश पानी को लेकर निश्चिन्तिता नहीं ला पा रही है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में तो अच्छी बारिश के साथ जल संचयन क्षमता भी उतनी ही जरूरी हो गई है क्योंकि उसी के सहारे बारिश के चार महीनों के बाद बाकी के आठ महीने खेती-किसानी के लिए पानी की व्यवस्था की जाती है।

यह बयान बहुत कुछ कह रहा है

इसीलिए शायद तीन चौथाई मानसून गुजर जाने के बाद बारिश की स्थिति अच्छी होते हुए भी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर के डायरेक्टर जनरल डॉ. त्रिलोचन महापात्रा ने पिछले हफ्ते देश में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष पानी की उपलब्धता घटते जाने, जल संचयन क्षमता और सिंचाई की समस्या पर एक बयान दिया है। महानिदेशक का यह बयान बहुत कुछ कह रहा है।

वैज्ञानिक कृषि जल प्रबंधन विषय पर मीडिया को संबोधित करते हुए डॉ. महापा़त्रा ने बताया कि 1950 से आज तक आबादी के बढ़ जाने से प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 5000 घन मीटर से घट कर 1500 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष ही बची है और हम उसे भी पूरा का पूरा संचयित नहीं कर पा रहे हैं।

इस वक्तव्य में मुख्य जोर भारत में सिंचाई के लिए अव्यवस्थित रूप से खर्च किए जा रहे पानी की समस्या पर था। हालांकि डॉ. महापात्रा के जरिए दी गई इस जानकारी पर गौर किया जाना चाहिए।

आज तक आबादी चार गुनी बढ़ चुकी है

देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पर गाँव कनेक्शन के इसी स्तंभ में एक आलेख लिखा जा चुका है। उसके मुताबिक अगर 1950 से लेकर आज तक आबादी चार गुनी बढ़ गई है तो प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता एक चौथाई यानि लगभग 1300 घनमीटर प्रति व्यक्ति ही मानी जानी चाहिए।

वैसे यह तकनीकी बात जल विज्ञानियों के बीच बहस की होनी चाहिए। इस मामले में और भी पेच हैं। जल विज्ञानी यह भी बताते हैं कि देश की धरती पर बरसने वाला 4000 अरब घन मीटर पानी पूरा का पूरा इस्तेमाल किया ही नहीं जा सकता।

जल विज्ञानी बताते हैं कि देश में सिर्फ 1800 अरब घन मीटर पानी ही उपलब्ध हो पाता है। इतना ही नहीं इस 1800 अरब घन मीटर उपलब्ध पानी में सिर्फ 1107 अरब घन मीटर पानी ही इस्तेमाल करने के लिए उपलब्ध है। इस 1107 अरब घन मीटर पानी को अगर देश की आबादी 133 करोड़ से भाग देते हैं तो प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता आज सिर्फ 832 अरब घन मीटर ही बैठती है। अब क्योंकि मामला विशेषज्ञता का है तो कृषि विशेषज्ञों और जल विज्ञानियों को मिल बैठकर इन आंकड़ों की हकीकत पर चर्चा कर लेना चाहिए।

कृषि क्षेत्र की भूमिका पर दिलाया ध्यान

भारत में पानी की समस्या से निपटने के लिए डॉ. महापात्रा ने कृषि क्षेत्र की भूमिका पर ध्यान दिलाया है। इस समय भारत में 85 फीसदी जल संसाधन कृषि के लिए इस्तेमाल हो रहा हैं। भूजल का 70 फीसदी भी सिर्फ सिंचाई कार्यों के लिए उलीचा जा रहा है। जाहिर है महानिदेशक सिंचाई के लिए पानी को किफायत से खर्च करने की तरफ इशारा कर रहे हैं।

डॉ. महापात्रा ने अपने वक्तव्य में सिंचाई के लिए तैयार की गई क्षमता और सिंचाई के लिए इस्तेमाल हो रहे पानी के बीच की दूरी के बढ़ते जाने की बात पर जोर दिया है। साल दर साल सिंचाई के लिए पानी की आपूर्ति और खेती के लिए पानी की मांग के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। इसका कारण नहरों के प्रबंधन में कमी को भी बताया गया है।

डॉ. महापात्रा के मुताबिक पानी का असमान वितरण, पानी की मांग और आपूर्ति में फर्क, जल भराव, सिंचाई के कारण मिट्टी की क्षारीयता बढ़ना आदि कुछ समस्याएं हैं जो भारत में सिंचाई की व्यवस्था के दुरुस्त होने में बाधक हैं।

स्पष्ट सुझाव या साफ कार्य योजना अभी नहीं

सिंचाई के लिए पानी की कमी को दूर करने के लिए एक बार फिर वैकल्पिक खेती की बात महानिदेशक ने दोहराई है। डॉ. महापात्रा ने दोहराया कि ज्यादा पानी की खपत वाली फसलों को छोड़ कम पानी में उगने वाली फसलों की ओर किसानों को मुड़ना पड़ेगा।

हालांकि बाजार और मांग के नजरिए से किसान दूसरी कौन सी फसलें उगाएं इस के लिए कोई स्पष्ट सुझाव या साफ कार्य योजना अभी नहीं बताई गई है। हाँ, यह जरूर कहा गया है कि किसानो को सही फसल के चुनाव और कम पानी वाली खेती करने के लिए प्रशिक्षित करने के लिए अनुसंधान के कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा 500 कृषि मेले और कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी।

इसी के साथ 'मोर क्रॉप पर ड्राप'के लक्ष्य के साथ सूक्ष्म सिंचाई के कार्यक्रम चलाये जाने की बात भी उनके संबोधन का हिस्सा थी। इस संबोधन में जल प्रबंधन के नजरिए से भी कई बातें थीं। आईसीएआर सरकार के साथ मिल कर स्टेट स्पेसिफिक एक्शन प्लान यानी राज्यों के लिए विशेष कार्य योजना बनाने का काम करने जा रहा है जिसके तहत क्षेत्रीय स्तर पर पानी की मांग और आपूर्ति के वैज्ञानिक अनुमान लगाने का काम किया जाएगा।

सैद्धांतिक तौर पर कही जाएगी सही पहल

हर क्षेत्र के लिए पानी का सालाना बजट बनाने की बात भी इस कार्य योजना का हिस्सा है। सुनने में यह बात जरूर महत्वाकांक्षी लगती है लेकिन सैद्धांतिक तौर पर सही पहल कही जाएगी। मगर पानी की बजटिंग और रेगुलेशन जैसे इतने बड़े कार्यक्रम के क्रियान्वन के लिए जिस स्तर पर आधारभूत ढांचे और प्रशिक्षित जल विज्ञानियों और प्रबंधकों की जरूरत पड़ेगी उसके लिए कोई तैयारी हाल फिलहाल देश में नजर नहीं आ रही है।

कुल मिला कर लगता यही है कि पानी को लेकर सरकारी संस्थाओं की चिंता बढ़ गई है और इसका समाधान यही सोचा जा रहा है कि पानी का इस्तेमाल करने वालों को किफायत की समझाइश दी जाए। अगर देश में वर्षा जल के अधिकतम संचय की बात भी जोड़ दी जाती तो और बेहतर होता।

(लेखिका प्रबंधन प्रौद्योगिकी की विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रनोर हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

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