बुंदेलखंड: ललितपुर में बारिश से फसलें बर्बाद, कई किसान मजबूरी में कर गए पलायन

इस बार की दिवाली किसानों के लिए सूनी गुजरी, दीवाली के लिए लोग घर वापस आते हैं लेकिन किसानों की घर की चौखट सूनी रह गयी.

ललितपुर । इस बार की दिवाली किसानों के लिए सूनी गुजरी। दीवाली के लिए दूर देश से लोग घर वापस आते हैं लेकिन इस बार किसानों की घर की चौखट सूनी रह गयी। किसानों की मुंडेरों पर दिए की रौशनी और बच्चों के खिलखिलाते चेहरों पर पानी फिर गया।

मराठवाड़ा विदर्भ, बुंदेलखंड की जमीन पानी को तरसती रहती है और किसान पानी और बारिश की दुआ मांगते-मांगते थक कर जाते हैं, लेकिन इस बार ऐसी बारिश हुई है कि किसानों की मेहनत पर पानी फिर गया है।

यूपी के हिस्से वाले बुंदेलखंड के कई जिलों में इस बार भारी बारिश से उड़द की फसल की जो बर्बादी हुई और उससे एक किसान को जो नुकसान हुआ उस बारे में ललितपुर की शारदा सहरिया से बेहतर कोई नहीं बता सकता। दिवाली के त्यौहार पर जहां परदेश में रोज़ी रोटी के लिए बसे लोगों के वापस आने की राह तकी जाती है वहीँ शारदा सहरिया के घर से चार लोग सहित गाँव के करीब एक सैकड़ा लोग मजदूरी करने परदेश चले गए। शारदा सहरिया की तरह बाकी परिवारों की ललितपुर जनपद से पूर्व-उत्तर दिशा महरौनी तहसील के अजान गाँव के लोगों ने इस बार सूनी दीपावली मनायी।

भारी बारिश से बदहाल हुई उड़द की फसल के बारे में बताते हुए सहरिया (24 वर्ष) कहती हैं," त्योहार के इंतजार में कोई नही रूका मुहल्ले में हर घर से लोग गये, तो कईयों घरों से ताले लगाकर! मेरे घर से सास, दो देवर, एक देवरानी मजदूरी करने गये! बरसा लगी रही कतकी (खरीब) उड़द में कुछ नही निकला मजदूरी मिलती नहीं? परदेश से मजदूरी करके खेत वो पायेगे! अगर मजदूरी को नही जाते तो खेती ऐसी ही पडी रहेगी!"

सहरिया इस दुःख को झेलने वाली अकेली नहीं है. यहीं एक 60 साल ले प्रताप भी हैं जो कि अपने घर के चार बच्चों को खेती छोड़ कर बाहर मजदूरी करने जाते देखने को मजबूर हैं। 60 साल की उम्र में जब खुद बुजुर्ग को देखभाल की जरुरत होती है वो अपने बच्चों के बच्चों की देखभाल करने में लगे हैं, आखिर रोजी रोटी का जो सवाल है।

अपनी पीड़ा बताते हुए प्रताप कहते हैं,"पहले सूखा से मरे अब बसकारे (बरसात) से! उड़द में फफूदी लग गई, बीज तक नही निकला उसी को देखकर बैठे रहेगे तो क्या खायेंगे, कहाँ जाये! नुकसान को देखकर गाँव के लोग परदेश मजदूरी को निकल गये।"

गाँव से खेती छोड़ मजदूरी जरने को मजबूर लोगों के खाली पड़े घर और उनकी बदहाल हालत को चीख-चीख कर बयान करते ये खामोश ताले वाकई आपको सोचने को मजबूर कर देंगे। ऐसे ही किसी घर के ताले को दिखाते हुए प्रताप कहते हैं,"दीपावली पर काहे के दीपक खरीदे पाला आकोती लेने के लिए पैसे नहीं हैं, दीपावली कैसे हो सब ताले लगाकर निकल गये, लगभग सौ सवा सौ लोग बाल बच्चे बूढे आदमन नो छोड गये ! काहे से खेती हो, पाँच दाने गेहूँ को बोने को नही हैं! खाद, बीज, पानी को पैसे भी नहीं हैं। गेहूँ की बोनी काहे से हो, अगर मजदूर नही लौटे तो फसल भी नही बुबेगी।

मनरेगा के बारे में बताते हुए प्रताप कहते हैं,"मनरेगा में दो पैसे की मजदूरी नहीं मिली प्रधान से बोला वह हाँ तो कहते हैं पर नहीं लगाते। मनरेगा में काम मिला होता तो हमारे लोगों की दीवाली सूनी नहीं होती, उन्हें पलायन नही करना पड़ता। क्या करें साहब मजबूरी में मजदूरी करने जाना पड़ा, बच्चों को देखकर दुख होता हैं। "

मनरेगा की बात करें तो हर महीने की पहली तारीख को पंचायतों में रोजगार दिवस मनाने का प्रावधान हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि मनरेगा मजदूर अपने एक महीने के लिए काम माँग सके। यहाँ पर पर हालात ये हैं कि रोजगार दिवस मनाने के लिए कर्मचारी रूचि नहीं लेते बल्कि टारगेट के चलते बस खानापूर्ति करते हैं। ऐसे में किसान एक बार फिर खाली हाथ रह जाता है और मजबूरन वो काम की तलाश में शहर की तरफ पलायान करता है।


वित्तीय वर्ष 2019-20 में ललितपुर जनपद में मनरेगा वेबसाइट के अनुसार,"1,69,712 जाँब कार्ड हैं, विगत तीन वर्षो में काम करने वाले एक लाख आठ हजार जाँबकार्ड एक्टिव हैं। इन जाँब कार्डो पर 21 लाख 98 हजार तीन सौ चार मानव दिवस ने काम किया, जिसमें आठ लाख सात हजार उनसठ महिलायें शामिल हैं। काम देने के मामले में 50 प्रतिशत ही मनरेगा चल पायी।" ये स्थिति जिले की 416 ग्राम पंचायतों की हैं।

उड़द बर्बादी के बाद अब कई गाँवों में किसान पलायन को मजबूर हैं। प्रवास सोसाइटी ने आंतरिक समिति की रिपोर्ट के आधार पर बुंदेलखंड के जिलों में बांदा से सात लाख 37 हजार 920, चित्रकूट से तीन लाख 44 हजार 801, महोबा से दो लाख 97 हजार 547, हमीरपुर से चार लाख 17 हजार 489, उरई (जालौन) से पांच लाख 38 हजार 147, झांसी से पांच लाख 58 हजार 377 व ललितपुर से तीन लाख 81 हजार 316 किसान और कामगार आर्थिक तंगी की वजह से महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं।

जिले में खरीब 2019-20 की दलहनी फसल दिनाँक - 30/09/2019 में प्रदर्शित कृषि विभाग के आंकड़े के अनुसार," सर्वाधिक रकवें 1.80965 हेक्टेयर अर्थात (4.46827 लाख एकड़) में किसानों के द्वारा बोयी गई उड़द बर्बादी हो गई, आर्थिक तंगी से किसान हताशा और परेशानी से पलायन करने को मजबूर हुए।

इसी गाँव की सुखवती (45 वर्ष) बताती हैं," छोटे-छोटे बच्चे छोड गये, बहू लड़का बाहर गये कमाने के लिए, परेशानी हैं। उड़द तो काम के नहीं निकलें, पैसे भी हाथ में नहीं हैं! काहे में से खेती करें कहाँ से खाद बीज खरीदें। दूसरों से पैसा लेकर लग्गत लगा रय, फिर द्वारा वो कहाँ से दें, जिससे ले लिया वो गरीब को द्वारा नहीं देगें।"

उड़द की फसल से बदहाल हुए 32साल के हरचरन कहते हैं," अगली फसल की तैयारी के लिए कुछ नही हैं। यहाँ कुछ नही हैं तभी तो बाहर निकल गये वहाँ से मजदूरी करके ले आयेगे खाने पीने लायक वो देगें नहीं तो बच्चो को क्या खिलायेगें!"

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