प्रवासी मजदूरों के संकट के समय मदद के लिए आगे आया बिहार का यह एनआरआई युवा

आसिफ कमाल अपनी संस्था के माध्यम से करीब 1000 प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक पहुंचा चुके हैं और 10,000 से अधिक जरूरतमंद परिवारों को राशन-पानी मुहैया कराया है। यह काम बदस्तूर जारी है।

Daya SagarDaya Sagar   18 Jun 2020 8:17 AM GMT

"मुझे पता है कि गरीब और अंडर प्रिविलेज्ड होना क्या होता है। मैं नहीं चाहता कि जो मैंने अपने बचपन में जो सहा, आगे की पीढ़ी भी सहे, इसलिए उनके लिए मैं कुछ करना चाहता हूं। मुझे पता है मैं सबके लिए ऐसा नहीं कर सकता, लेकिन अपने क्षेत्र के लिए एक ईमानदार प्रयास तो कर ही सकता हूं।"

यह कहना है बिहार के सुपौल जिले के रहने वाले आसिफ कमाल का जो दुबई स्थित एक मल्टीनेशनल कंपनी अल्तुराश ग्रुप के प्रमुख हैं। आसिफ दुबई और दिल्ली के डीएलएफ मॉल में आर्ट गैलरी चलाते हैं। बचपन में गरीबी को बहुत नजदीक से देखने वाले आसिफ ने अपने संघर्षों के दम पर कला और व्यवसाय की दुनिया में अपना नाम कमाया है। उनकी कंपनी भी बहुत अच्छा कर रही है। लेकिन वह अपने निजी जीवन में इस दौलत और शोहरत से संतुष्ट नहीं थे। वह हमेशा से अपने क्षेत्र के वंचित और गरीब लोगों की मदद और सेवा करना चाहते थे।

कोरोना महामारी के कारण हुए लॉकडाउन में उन्हें यह मौका भी मिला, जब यूपी-बिहार के लाखों प्रवासी मजदूर देश के अलग-अलग महानगरों में फंस गए और पैदल ही अपनी घरों की तरफ बढ़ने लगे थे। इस दौरान आसिफ कमाल ने अपनी संस्था 'आसिफ कमाल फाउंडेशन' के माध्यम से दिल्ली एनसीआर में फंसे सुपौल और पूर्णिया जिले के सैकड़ों प्रवासी मजदूरों को बसों के द्वारा उनके गांव भेजा। इस दौरान मजदूरों की यात्रा के साथ-साथ उनके खाने-पानी का भी उचित प्रबंध किया गया।


आसिफ कमाल और उनकी संस्था दिल्ली, तमिलनाडु, पंजाब और राजस्थान में फंसे बिहार के प्रवासी मजदूरों को राशन-पानी उपलब्ध कराकर उनकी लगातार मदद कर रही है। इसके अलावा वह अपने जिले सुपौल में भी इस महामारी और लॉकडाउन के कठिन समय में जरूरतमंद लोगों को राशन, दवा और अन्य जरूरी सामान मुहैया करा रहे हैं। वह अब तक 10,000 से अधिक परिवारों तक राशन पहुंचा चुके हैं और यह काम बदस्तूर जारी है। कई जरूरतमंदों के खातों में उनकी संस्था द्वारा नकद पैसा भी भेजा गया है।

अपने इन प्रयासों के बारे में आसिफ कमाल बताते हैं, "मैं नहीं चाहता कि मैंने अपने कठिन दिनों में जिन मुश्किलों का सामना किया, उससे और लोग भी गुजरें। अब अगर मैं लोगों की मदद करने में सक्षम हो गया हूं तो मैं कर रहा हूं। मैं इसे 'मदद' नहीं बल्कि 'सेवा' मानता हूं। मैंने अपने क्षेत्र के लोगों से जो पाया है, उसे वापिस लौटा रहा हूं।"


आसिफ कमाल का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता है। उनके पिता गांव के ही पोस्ट ऑफिस में डाकिया हैं। सरकारी स्कूल से पढ़ाई करने वाले आसिफ बारहवीं करने के बाद बिहार से दिल्ली आ गए। वहां उन्होंने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी भी की, ताकि दिल्ली में खर्चा चल सके। आसिफ तब के दिनों को याद करते हुए बताते हैं, "मैंने पहली नौकरी शॉपर्स स्टॉप में एक सेल्समैन की की थी, जहां शोरूम में मैं चश्मे बेचता था। तब मुझे 4000 रूपये एक महीने के मिलते थे। इसी में अपना गुजारा करता था। इसके बाद मैंने काल सेंटर में भी नौकरी की।"

आसिफ ने पढ़ाई के बाद अपना खुद का एक व्यवसाय चालू किया और खाड़ी व अफ्रीकी देशों से बर्तन का व्यापार करने लगे। इस दौरान उन्हें कुछ ऐसे लोग मिले जो कला और संस्कृति में बहुत रूचि रखते थे। आसिफ को भी लगा वह इस क्षेत्र में कुछ अच्छा कर सकते हैं, इसलिए उन्होंने पहले दुबई और फिर दिल्ली में अपनी आर्ट गैलरी खोल ली। लगातार 10 सालों के संघर्ष के बाद आसिफ ने अपने आप को इस क्षेत्र में स्थापित कर लिया है।

लेकिन कहते हैं ना जीवन अपना चक्कर पूरा करती है। आसिफ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। दुबई पहुंच जाने के बाद आसिफ फिर से अपने घर सुपौल लौटाना चाहते थे ताकि वे अपने लोगों की बुनियादी सुविधाओं, रोटी-कपड़ा-मकान और शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार जैसी जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकें। इसके लिए उन्होंने अपना एक विस्तृत रोडमैप तैयार किया था, जिसमें एक ही कैम्पस में वह एक सस्ता शैक्षणिक संस्थान, एक चैरिटी अस्पताल और रोजगार के लिए खादी उद्योग शुरू करना चाहते थे। वह इसी साल से इस काम की शुरूआत करना चाहते थे लेकिन कोरोना ने उनके इस सपने पर अल्पविराम लगा दिया।

हालांकि वह इस संचित ऊर्जा को व्यर्थ नहीं होने देना चाहते थे, इसलिए आसिफ और उनकी टीम ने कोरोना लॉकडाउन में फंसे मजदूरों और जरूरतमंद लोगों को मदद पहुंचाने का निर्णय लिया। आसिफ बताते हैं कि शुरूआत में उन्हें थोड़ी मुश्किलें आईं क्योंकि लॉकडाउन के कारण कोई भी मूवमेंट आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने दिल्ली एनसीआर और सुपौल स्थित स्थानीय अधिकारियों से अपना इरादा बताया और सहायता कार्यों में प्रशासनिक मदद देने की अपील की। धीरे-धीरे उनके इस काम में मदद के लिए लिए कई हाथ भी खड़े हुए हैं, जिनमें जन अधिकार पार्टी के मुखिया पप्पू यादव और और जेवर, नोएडा से बीजेपी विधायक धीरेंद्र सिंह का नाम शामिल है।

एक किस्सा साझा करते हुए आसिफ बताते हैं कि जब उनकी टीम उनके गृहजनपद के प्रवासी मजदूरों को 15 बसों से लेकर दिल्ली के सीलमपुर से बिहार जा रही थी, तो नोएडा-दिल्ली बॉर्डर पर उनकी बस को पुलिस द्वारा रोक दिया गया। इसके बाद उन्होंने ट्वीटर पर स्थानीय विधायक धीरेंद्र सिंह से मदद की अपील की। आसिफ कहते हैं कि रात में ही धीरेंद्र सिंह ने मामले को संज्ञान में लिया और भोर होते ही सभी बसें आगे के लिए रवाना हुई।

आसिफ बताते हैं कि उनके इस कार्य में सोशल मीडिया के जरिये भी काफी मदद मिली। "कई लोगों ने सोशल मीडिया के जरिये मदद मांगी और उनको मदद पहुंचाया गया। कई लोग सोशल मीडिया के जरिये खुद मदद के लिए आगे आएं और हमसे जुड़ना चाहा। इसके अलावा दुबई से भी कई साथियों ने सोशल मीडिया के जरिये गुहार लगाई जो दुबई से भारत आना चाहते थे। उन्हें भी मदद पहुंचाई गई और वे अब भारत में अपने घरों पर हैं," वह बताते हैं।

आगे के रोडमैप के बारे में पूछने पर आसिफ कहते हैं कि कोरोना काल के बाद वह अपने सपने और लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहते हैं, जिसे वह दुबई और दिल्ली की जिंदगी छोड़कर पूरा करने आए हैं। उन्होंने बताया कि इसके अलावा अगर उनके क्षेत्र में हर साल की तरह इस साल भी बाढ़ आता है, तो उस प्राकृतिक आपदा में भी पूरी टीम आम लोगों का सहयोग करेगी। राजनीति में आने के सवाल पर वह कहते हैं कि अभी उनका ऐसा कोई मकसद नहीं है और वह अभी सिर्फ लोगों की सेवा करना चाहते हैं।

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